हैदराबाद, उच्चतम न्यायालय ने हैदराबाद के उद्योगपति निम्मगड्डा प्रसाद के खिलाफ संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के एक दीवानी फैसले से उत्पन्न प्रवर्तन कार्यवाही में दलीलें सुनीं और संकेत दिया कि यदि देनदार फैसले को चुनौती देना चाहता है तो पर्याप्त सुरक्षा राशि की आवश्यकता हो सकती है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने दलीलों को आंशिक रूप से सुना और मैट्रिक्स फार्माकॉर्प प्राइवेट लिमिटेड और निम्मागड्डा प्रसाद की ओर से दलीलें सुनने के लिए 25 फरवरी की तारीख तय की। संयुक्त अरब अमीरात की निवेश शाखा रास अल खैमाह निवेश प्राधिकरण (आरएकेआईए) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने कहा कि उनके मुवक्किल यूएई की न्यायिक प्रणाली के हर स्तर पर जीत हासिल करने के बावजूद एक भी रुपया वसूल नही कर पाए हैं। सिंघवी ने कहा कि यह मामला प्रिवी काउंसिल के उस बयान की याद दिलाता है कि भारतीय डिक्री धारक की परेशानियाँ डिक्री जारी होने की तारीख के बाद शुरू होती हैं।
सिंघवी ने आरोप लगाया कि प्रसाद ने अपनी बेटी स्वाति गुणुपति रेड्डी और दामाद प्रणव रेड्डी गुणुपति को शामिल करते हुए 20 कंपनियों का एक जाल बनाया है, ताकि संपत्तियों को कुर्की से बचाया जा सके। आरएकेआईए संयुक्त अरब अमीरात के एक दीवानी फैसले को लागू करवाने की कोशिश कर रही है, जिसमें लगभग 543 करोड़ रुपये मूलधन और ब्याज सहित 643 करोड़ रुपये की मांग की गई है।
यह भी पढ़ें… हाईकोर्ट ने माँगी शिक्षा का अधिकार कानून पर अमलावरी रिपोर्ट
यह मामला आंध्र-प्रदेश में बंदरगाहों और हवाई अड्डे के विकास के लिए 2008 में शुरू किए गए असफल संयुक्त उद्यम वानपिक परियोजना से जुड़ा है। आरएकेआईए का आरोप है कि प्रसाद ने आरएकेआईए के पूर्व सीईओ खाटर मस्साद के साथ मिलकर परियोजना के लिए आवंटित 12 करोड़ अमेरिकी डॉलर का गबन किया।
