पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने पर सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव आयोग ने बहुत ही लचर व ग़ैर-ज़िम्मेदार तरीके से एसआईआर प्रक्रिया को अंजाम दिया है और मनमर्जी करते हुए बहुत से वैध मतदाताओं के नाम भी सूची से हटा दिये हैं। इसलिए पीड़ितों का अपने ह़क के लिए विरोध प्रदर्शन करना जायज़ था, लेकिन न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाना व क़ानून को अपने हाथ में लेने को किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता। उक्त घटना पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख अपनाना एकदम दुरुस्त है।
यह घटना दुस्साहसिक प्रयास है न सिर्फ न्यायिक अधिकारियों पर दबाव बनाने का बल्कि यह इस अदालत के प्राधिकरण को भी चुनौती है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सोची-समझी, सुनियोजित और जान-बूझकर की गई हरकत है न्यायिक अधिकारियों को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से और आपत्तियों के निवारण की जो प्रक्रिया चल रही है, उसे बाधित करने की… यह नागरिक व पुलिस प्रशासन की पूर्ण नाकामी को प्रतिबिम्बित करती है, जहां तक मालदा में क़ानून व्यवस्था की स्थिति का संबंध है।
यह सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी का एक प्रासंगिक अंश है, जिससे मालदा, पश्चिम बंगाल में 1 अप्रैल 2026 को हुई निंदनीय घटना की गंभीरता का स्वत ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इस संदर्भ में क्या ऐक्शन लिया गया है और राजनीतिक पार्टियां इसे किस दृष्टि से देख रही हैं, की समीक्षा करने से पहले आवश्यक है कि संबंधित घटनाक्रम को संक्षेप में समझ लिया जाये।
हंगामा उस समय आरंभ हुआ जब 1 अप्रैल 2026 की शाम को लगभग 4 बजे प्रदर्शनकारी पश्चिम बंगाल के मालदा ज़िले में कालियाचक 2 ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिस के बाहर एकत्र होने लगे। वे गुस्से में थे; क्योंकि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिये गये थे। प्रदर्शनकारियों ने पहले यह मांग की कि दफ्तर के अंदर जो न्यायिक अधिकारी मौजूद हैं, उनसे उनकी मुल़ाकात करायी जाये।
सात न्यायिक अधिकारी अंदर फंसे, तीन महिलाएं शामिल
जब उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी गई तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई। भीड़ ने बिल्डिंग का घेराव कर लिया और सात न्यायिक अधिकारी उसके अंदर ट्रैप हो गये, जिनमें तीन महिलाएं भी थीं। समय गुज़रने के साथ प्रदर्शन तीव्र होता गया। प्रदर्शनकारियों ने नेशनल हाईवे 12 (कोलकाता-सिलीगुड़ी मार्ग) को भी ब्लॉक कर दिया, जिससे ट्रैफिक बाधित हुआ और प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बढ़ता गया।
देर रात में बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी मौके पर पहुंचे, राहत कार्य को अंजाम देने के लिए। जब आधी रात के बाद न्यायिक अधिकारियों को बिल्डिंग से बाहर निकाला गया तो प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर बांस की बल्लियां रखकर उनके वाहनों को रोकने की कोशिश की। वाहनों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास भी किया गया। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठी चार्ज किया और न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला।
इस हंगामे के दौरान अनेक प्रदर्शनकारी चोटिल भी हुए, लेकिन आधिकारिक तौरपर इसकी पुष्टि नहीं की गई। बहरहाल, स्थिति उस समय शांत हुई जब अतिरिक्त जिलाधिकारी (एडीएम) ने मौके पर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों को आश्वस्त किया कि जो वैध मतदाता हैं, उनके नामों को चार दिन के भीतर मतदाता सूची में शामिल करा दिया जायेगा। इस आश्वासन के बाद सड़क पर जो जाम लगाया गया था, उसे भी हटा लिया गया।
मतदाता सूची से नाम हटाने पर आयोग की भूमिका सवालों में
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव आयोग ने बहुत ही लचर व ग़ैर-ज़िम्मेदार तरीके से एसआईआर प्रक्रिया को अंजाम दिया है और मनमर्जी करते हुए बहुत से वैध मतदाताओं के नाम भी सूची से हटा दिये हैं। इसलिए पीड़ितों का अपने ह़क के लिए विरोध प्रदर्शन करना जायज़ था, लेकिन न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाना व क़ानून को अपने हाथ में लेने को किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता।
उक्त घटना पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख अपनाना एकदम दुरुस्त है। अदालत को लगता है कि प्रशासन ने अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया और समय पर उचित कदम नहीं उठाये, नतीजतन राज्य के मुख्य सचिव व डीजीपी को कारण बताओ नोटिस जारी किये गये हैं कि उनके खिलाफ ऐक्शन क्यों न लिया जाये? इस घटना को निंदनीय कहते हुए अदालत ने कहा है कि यह सुनियोजित व प्रेरित प्रतीत होती है ताकि न्यायिक अधिकारियों को हतोत्साहित किया जाये और जो चुनावी प्रक्रिया चल रही है उसे बाधित किया जाये।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह किसी को भी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करने देगा और न ही किसी को क़ानून अपने हाथ में लेने देगा कि न्यायिक अधिकारियों पर मनोवैज्ञानिक हमले किये जाएं। अदालत ने कहा कि ममता बनर्जी की सरकार को चाहिए कि वह चुनाव आयोग को सूचित करके न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु केंद्रीय बलों की तैनाती करे।
चुनाव आयोग ने जांच एनआईए को सौंपी, 18 हिरासत में
इस बीच चुनाव आयोग ने घटना की जांच एनआईए से कराने के आदेश दिये हैं। घटना के संदर्भ में 18 व्यक्तियों को हिरासत में भी लिया गया है, जिनमें आल इंडिया सेक्युलर फ्रंट के मोथाबारी प्रत्याशी भी शामिल है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रदर्शनकारियों की निंदा करते हुए कहा कि वह मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाये जाने के मामले में वही कर बैठे जो बीजेपी उनसे चाहती है कि न्यायिक अधिकारियों का घेराव किया जाये ताकि केंद्र सरकार को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का मौका मिल जाये और चुनाव स्थगित कर दिये जायें।
ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट की बात को एकदम सही ठहराते हुए प्रदर्शनकारियों से कहा, क्या तुम्हें मालूम नहीं कि सीबीआई व एनआईए को जांच के आदेश दे दिये गये हैं? यह बीजेपी का गेम प्लान है। वह चुनाव नहीं चाहती, वह राष्ट्रपति शासन चाहती है। क्या तुम्हें वह चाहिए या तुम्हें शांतिपूर्ण चुनाव चाहिए, जिनके माथ्यम से तृणमूल कांग्रेस वापस सत्ता में आ जाये? मुर्शिदाबाद के सागरदीघी में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए ममता ने कहा, बीजेपी की साज़िश को नाकाम करने का एकमात्र तरीका यह है कि अपने हाथ में क़ानून मत लो। अगर तुम्हें मुझ पर विश्वास है, तो बीजेपी के उकसावे में मत आओ।
ममता ने वायदा किया कि जिन वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काट दिये गये हैं, उनके नाम जल्द जोड़ दिये जायेंगे; क्योंकि इस मुद्दे को हल करने के लिए वह क़ानूनी मदद ले रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि जिनके नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से हटा दिये गये हैं, वे पुनः अप्लाई करें, जिसके लिए ट्रिब्यूनल स्थापित किये गये हैं। अगर तब भी न्याय न मिले तो सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करेगा।
ममता का आरोप: कानून व्यवस्था पर केंद्र का नियंत्रण
ममता बनर्जी का आरोप है कि पश्चिम बंगाल की क़ानून व्यवस्था चुनाव आयोग के हाथ में नहीं है बल्कि उसे केंद्रीय गृह मंत्रालय व राज भवन चला रहा है, इसलिए मुख्य सचिव ने न तो स्थिति को नियंत्रित किया और न ही मालदा की घटना के बारे में उन्होंने व गृह सचिव ने उन्हें सूचित किया। ममता बनर्जी ने मालदा की घटना को साज़िश बताते हुए गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की है।
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जबकि केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आरोप लगाया है कि मालदा की घटना से स्पष्ट है कि ममता बनर्जी व तृणमूल कांग्रेस के शासन में पश्चिम बंगाल में सिस्टम पूरी तरह से टूट गया है। ये आरोप-प्रत्यारोप राजनीतिक दृष्टि से लगाये गये हैं। इनका कोई खास औचित्य नहीं है। यहां समझना सिर्फ दो बातों का है। एक, बड़े पैमाने पर वैध मतदाताओं के नाम वोटर सूची से हटा दिये गये हैं।

यह भूलवश हुआ या जान-बूझकर, इसकी जांच होनी चाहिए। दूसरा यह कि पीड़ित मतदाताओं का अपने हक के लिए आवाज़ उठाना तो सही था, लेकिन उन्हें क़ानून अपने हाथ में लेकर न्यायिक अधिकारियों को बंधक नहीं बनाना चाहिए था। यह अपराध है, जिसकी कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए और साथ ही पुलिस व प्रशासन की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए कि उनकी लापरवाही ने स्थिति को हाथ से निकलने दिया।
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