इच्छा-मृत्यु से संबंधित सभी मामले अदालतों तक नहीं पहुंचते। ज्यादातर अस्पताल के स्तर पर ही समाप्त हो जाते हैं। फिर भी माना जा रहा है कि साल 2011 के बाद से अब तक कई दर्जन याचिकाएं इस संबंध में विभिन्न हाईकोर्ट में आयी थीं और इनमें से अधिकांश मामलों में अदालतों की कड़ी मेडिकल जांच के बाद ही इस तरह की याचिका की अनुमति देती हैं। कई मामलों में तो परिवार ही मामले की जटिलता को देखते हुए आगे नहीं बढ़ते। मगर हरीश राणा के मामले में उनके पिता अशोक राणा पिछले तीन साल से लगातार सुप्रीम कोर्ट में अपनी यह याचिका लेकर मौजूद थे। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबा समय लिया, क्योंकि भारत में अभी तक इच्छा-मृत्यु की इजाजत गैरकानूनी थी और इसमें नैतिक विवाद चल रहा था। हालांकि इस फैसले के बाद अब नैतिक विवाद का मामला खत्म हो जायेगा।
गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा-मृत्यु का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हरीश राणा के पिता अशोक राणा और मां निर्मल राणा पिछले कई सालों से सुप्रीम कोर्ट से यह फैसला सुनाने के लिए बार-बार दस्तक दे रहे थे, लेकिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाने के लिए मना कर दिया, मगर 11 मार्च 2026 को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथ की बेंच ने एम्स को ऐतिहासिक निर्देश दिया कि हरीश राणा के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से हटा लिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि यह प्रक्रिया इस तरह से संपन्न होनी चाहिए कि मरीज की मृत्यु की गरिमा बनी रहे। गौरतलब है कि 13 साल पहले दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। साल 2013 में वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गये या उन्हें किसी ने गिरा दिया, इसकी कभी पुष्टि नहीं हुई, लेकिन गिरने की वजह से उनके पूरे शरीर को लकवा मार गया और वह कोमा में चले गये।
तब से ही वह न कुछ बोल सकते थे और न ही कुछ महसूस करते थे। डॉक्टरों ने हरीश को क्वाड्रिपलेजिया बीमारी से पीड़ित बताया था। इससे मरीज पूरी तरह से फीडिंग ट्यूब यानी खाने-पीने की नली और वेंटीलेटर सपोर्ट पर निर्भर रहता है। इस बीमारी और इस स्थिति से रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं होती। इसके अलावा 13 साल से बिस्तर पर पड़े होने के कारण हरीश के शरीर पर बैड सॉर्स यानी गहरे घाव बन गये थे।
बेटे के इलाज में परिवार आर्थिक और भावनात्मक रूप से टूट गया
उनकी हालत लगातार बद से बदतर होती जा रही थी। यह स्थिति न केवल हरीश के लिए बेहद दर्दनाक बल्कि उनका परिवार भी उनकी इस स्थिति से पूरी तरह से टूट गया। बेटे के इलाज के लिए पिता दिल्ली स्थित अपना मकान बेचकर गाजियाबाद में एक कमरे के फ्लैट में शिफ्ट हुए, फिर भी उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती ही गई। हरीश राणा केस में सुप्रीम कोर्ट ने चार निर्देश दिए। मरीज को दी जा रही चिकित्सा सहायता को वापस लिया या रोका जा सकता है, इस मामले में सामान्यत लागू 30 दिन की पुनर्विचार अवधि को माफ कर दिया गया और एम्स को निर्देश दिया गया कि मरीज को पेबिलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती किया जाए, ताकि धीरे-धीरे इलाज प्रक्रिया पूरी हो सके।
पेबिलिएटिव केयर वह व्यवस्था होती है, जिसमें मरीजों को आराम देने के लिए चिकित्सा व्यवस्था धीरे-धीरे रोकी जाती है। हरीश राणा फिलहाल घर में हैं और उन्हें अस्पताल शिफ्ट किए जाने की पूरी व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक एम्स करेगा और फिर एक विशेष चिकित्सा योजना के तहत उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम से अलग किया जायेगा। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच में जस्टिस पारदीवाला ने फैसला सुनाते वक्त अमेरिकी धर्मगुरु हेनरीवाड पिचर के शब्दों का हवाला देते हुए कहा, ईश्वर मनुष्य से यह नहीं पूछते कि वह जीवन स्वीकार करता है या नहीं, उसे जीवन लेना ही पड़ता है।
इसके साथ उन्होंने विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक हेमलेट की मशहूर पंक्तियों टू बी और नॉट टू बी का भी जिक्र करते हुए कहा कि अदालतों को कई बार इसी तरह के सवालों के संदर्भ में मरने के अधिकार पर भी विचार करना पड़ता है। हालांकि भारत में पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा-मृत्यु की मांग बहुत पहले से हो रही है, लेकिन इसका इतिहास बहुत जटिल रहा है।
भारत में पहली औपचारिक इच्छा-मृत्यु याचिका 2010 में दाखिल
भारत में पहली बार इच्छा-मृत्यु की औपचारिक मांग साल 2010 में सुप्रीम कोर्ट में मुंबई के केईएम अस्पताल की नर्स अरुणा शानबाग के लिए की गई थी, जिन पर साल 1973 में अस्पताल के ही एक कर्मचारी ने यौन हमला करके उसका गला घोंट दिया था। इससे उन्हें गंभीर मस्तिष्क क्षति हुई थी और वह स्थायी रूप से वेजीटेटिव स्टेट यानी अचेत अवस्था में चली गई थीं। लगभग 37 से 42 साल तक बेहोशी की स्थिति में जीवित रहीं।
अरुणा शानबाग के लिए साल 2010 में मशहूर पत्रकार और लेखिका पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी और देश की सर्वोच्च अदालत से अनुरोध किया था कि उन्हें कृत्रिम जीवन रक्षक व्यवस्था से मुक्त कर दिया जाए। क्योंकि वह कभी होश में नहीं आएंगी। यह मांग भारत में पहली ऐसी कानूनी मांग थी, जिसमें किसी व्यक्ति के लिए इच्छा-मृत्यु मांगी गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह मांग स्वीकार नहीं थी, इसे ठुकरा दिया था।
7 मार्च 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने पिंकी विरानी की यह याचना यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि जीवन की पवित्रता की सिद्धांत में इच्छा-मृत्यु जगह नहीं है। तब माननीय अदालत ने यह भी कहा था कि भारतीय संविधान अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार देता है और राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों की जीवन की रक्षा करे। तत्कालीन कानून के मुताबिक किसी की जान लेना इंडियन पीनल कोड की धारा 302 के तहत हत्या का मामला हो सकता था।
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तब तक मरीज के ठीक होने की संभावना पूरी तरह नकारा नहीं गया
क्योंकि आत्महत्या में मदद करना भी अपराध की श्रेणी में आता है। इसलिए सािढय रूप से किसी को मरने में मदद करना कानूनन जोखिमभरा था। यह इसलिए भी था, क्योंकि पिंकी विरानी अरुणा शानबाग की कोई नजदीकी रिश्तेदार नहीं थी, वे उनकी कानूनी अभिभावक या परिवार नहीं थी, अरुणा शानबाग की देखभाल केईएम अस्तपाल की नर्सें कर रही थीं और तब तक मरीज के ठीक होने की संभावना को अस्पताल में पूरी तरह से नकारा नहीं था। जैसे कि हरीश राणा के केस में कहा गया था।
हालांकि अरुणा शानबाग के लिए सुप्रीम कोर्ट के द्वारा इच्छा-मृत्यु याचिका को तो स्वीकार नहीं किया गया, मगर उसी फैसले से एक बड़ा रास्ता भी खुला। जब कोर्ट ने माना कि विशेष परिस्थितियों में पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा-मृत्यु की इजाजत दी जा सकती है। कोर्ट ने अपने तत्कालीन फैसले में कहा था, अगर मरीज स्थायी रूप से अचेत अवस्था में हो, ठीक होने की कोई संभावना न हो तो परिवार हाईकोर्ट से अनुमति लेकर जीवन रक्षक उपकरण हटवा सकता है।
भारत में इच्छा-मृत्यु की पहली कानूनी मान्यता का आधार बनीं। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कॉमन कॉज बनाम भारत सरकार मामले में कहा, सम्मान के साथ मरने का अधिकार भी आर्टिकल 21 का हिस्सा हैं। इस फैसले से दो महत्वपूर्ण बातें हुई पहली तो यह कि पैसिव यूथेनेशिया को वैध माना गया और इसके लिए लिविंग विल यानी पहले से लिखी इच्छा को भी मान्यता दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी
कहने का मतलब यह है कि कोई व्यक्ति पहले ही लिख सकता है कि अगर वह असाध्य अवस्था में चला जाए तो उसे कृत्रिम जीवन के सहारे पर न रखा जाए। इन दोनों ही आधारों का इस्तेमाल करते हुए पहली बार 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने वास्तव में किसी व्यक्ति के लिए जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में फैसला सुनाते हुए कहा है कि मरीज यानी हरीश राणा की हालत अपरिवर्तनीय है और डॉक्टरों की समिति ने इसकी पुष्टि की है। साथ ही परिवार की सहमति भी है, इसलिए जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी जाती है।
हालांकि इस संबंध में कोई सटीक आंकड़ा तो नहीं है, क्योंकि इच्छा-मृत्यु से संबंधित सभी मामले अदालतों तक नहीं पहुंचते। ज्यादातर अस्पताल के स्तर पर ही समाप्त हो जाते हैं। फिर भी माना जा रहा है कि साल 2011 के बाद से अब तक कई दर्जन याचिकाएं इस संबंध में विभिन्न हाईकोर्ट में आयी थीं और इनमें से अधिकांश मामलों में अदालतों की कड़ी मेडिकल जांच के बाद ही इस तरह की याचिका की अनुमति देती हैं।
कई मामलों में तो परिवार ही मामले की जटिलता को देखते हुए आगे नहीं बढ़ते। मगर हरीश राणा के मामले में उनके पिता अशोक राणा पिछले तीन साल से लगातार सुप्रीम कोर्ट में अपनी यह याचिका लेकर मौजूद थे। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबा समय लिया, क्योंकि भारत में अभी तक इच्छा-मृत्यु की इजाजत गैरकानूनी थी और इसमें नैतिक विवाद चल रहा था। हालांकि इस फैसले के बाद अब नैतिक विवाद का मामला खत्म हो जायेगा।
