आजकल बाजार में एलपीजी सिलेंडर की वैसी ही किल्लत है, जैसी राजनीति में नैतिकता की होती है। युद्ध कहीं भी हो-चाहे दो देशों के बीच या पति-पत्नी के बीच-नुकसान अंततः चूल्हे का ही होता है। अब चूँकि मिसाइलों के धुएँ ने गैस पाइपलाइनों का गला घोंट दिया है, तो समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने फिर से लकड़ी के चूल्हे की महिमा गानी शुरू कर दी है। जब प्रगति के पैर थक जाते हैं, तो वह लौटकर आदिम युग की गोद में बैठ जाती है। आइए, युद्ध के इस पावन काल में लकड़ी के चूल्हे के उन क्रांतिकारी फायदों पर विचार करें, जो आपको सिलेंडर की लाइन में लगने की जलीलियत से बचाएंगे
जिम जाकर हज़ारों फूंकने वालों के लिए लकड़ी का चूल्हा एक वरदान है। लकड़ी काटने के लिए जब आप कुल्हाड़ी चलाएंगे, तो उसे वुड-कटर वर्कआउट कहा जाएगा। जब कुल्हाड़ी लकड़ी पर गिरेगी, तो आपके कंधे का कोलेस्ट्रॉल वैसे ही डरेगा जैसे भ्रष्टाचारी छापे से डरता है। मोटापा घटेगा और आप बिना डाइट किए जीरो फिगर की ओर अग्रसर होंगे। इसी बहाने मंदी के दौर में जहाँ स्टार्टअप डूब रहे हैं, वहीं कुल्हाड़ी बाज़ार में रौनक आएगी। जो लोहार वर्षों से केवल ताले ठीक कर रहे थे, वे अब युद्ध के सौजन्य से आर्म्स सप्लायर बन जाएंगे। यह आत्मनिर्भर भारत की असली तस्वीर होगी-हाथ में कुल्हाड़ी और बगल में लकड़ी का गट्ठा।
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चूल्हे का धुआँ और संघर्ष की याद दिलाता अनुभव
कहते हैं जो धुआं झेल गया, वह दुनिया झेल गया। चूल्हे का धुआं आपकी आंखों में आंसू लाएगा, जिससे आपकी अश्रु-ग्रंथियां साफ होंगी। यह धुआं दरअसल, एक फिल्टर है, जो आपको यह याद दिलाता रहता है कि आप जीवित हैं और संघर्ष कर रहे हैं। बड़े-बड़े रेस्तरां स्मोकी फ्लेवर के नाम पर जेब काटते हैं। चूल्हे पर बनी रोटी में वह धुआं मुफ्त में समाहित होता है। एलपीजी की रोटी तो वैसी ही बेजान होती है जैसे बिना वादों के चुनावी घोषणापत्र। असली स्वाद तो उस राख और धुएं में है, जो फेफड़ों तक पहुँचकर तृप्ति देता है।
मिट्टी का चूल्हा हमें याद दिलाता है कि हम अंततः मिट्टी ही हैं। गैस का चूल्हा तो अहंकार का प्रतीक है – एक बटन दबाया और आग जल गई। मिट्टी के चूल्हे को फूंकनी से मनाना पड़ता है, जैसे किसी रूठे हुए नेता को गठबंधन के लिए मनाया जाता है। सर्दी के दिनों में चूल्हा खाना बनाने के अलावा सेंट्रल हीटिंग का काम भी करता है। पूरा परिवार चूल्हे के इर्द-गिर्द ऐसे बैठता है जैसे किसी घोटाले पर जांच कमेटी बैठी हो।
गैस एजेंसी के मैनेजर को मक्खन लगाने और ब्लैक में सिलेंडर खरीदने की झंझट खत्म। अब आपको बस पड़ोसी के पेड़ पर नजर रखनी है। युद्ध काल में सर्जिकल स्ट्राइक सरहदों के अलावा पड़ोसियों के बागों में भी होगी। चूल्हा जलाना एक साधना है। जिस दिन आप गीली लकड़ी से चूल्हा जला लेंगे, समझ लीजिए आपने जीवन का सबसे कठिन मैनेजमेंट कोर्स पूरा कर लिया। जब आप चूल्हे पर खाना बनाते हैं, तो आप दुनिया को संदेश देते हैं कि तुम मिसाइलें मारो, हम रोटियां सेकेंगे। सिलेंडर की किल्लत दरअसल, एक अवसर है-अपने भीतर के आदिमानव को जगाने का। तो उठिए, कुल्हाड़ी उठाइए और लकड़ी-युग का स्वागत कीजिए।
