मोजतबा खामेनेई के बाद भी हल नहीं हुआ ईरान के नये शासन का मसला !

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जो नई खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक ईरान के नये सुप्रीमो मोजतबा हुसैनी खामेनेई पिछले कई दिनों से लगातार कोमा में हैं। बताया जा रहा है कि वह उसी हमले में घायल हुए थे, जिसमें उनके पिता अयातुल्ला खामेनेई मारे गये थे। ब्रितानी सूचना के मुताबिक मोजतबा हुसैनी का एक पैर काटना पड़ा है और उनका लिवर भी डैमेज हो गया है। दूसरी तरफ आज मोजतबा खामेनेई की तरफ से जो मीडिया में बातें आयी हैं, उसके मुताबिक उन्होंने ईरान पर किये गये हर हमले का बदला लेने की बात कही है। अब ये हकीकत है या कोई प्रोपेगंडा, पर यह तो तय है कि मोजतबा खामेनेई के नये सुप्रीमो के रूप में चुन लिए जाने के बाद भी, ईरान में नये शासक का मसला हल नहीं हुआ। सवाल है आखिर यह ऊंट किस करवट बैठेगा, क्योंकि जो चीजें अलग-अलग जगहों पर हो रही हैं, उनके मुताबिक ईरान में बाहरी जंग के साथ-साथ एक जंग शासक प्रमुख होने के लिए भी जारी है।

ईरान में एक प्रत्यक्ष जंग के पीछे एक अप्रत्यक्ष जंग भी जारी है। यह जंग ईरान के भीतर कुछ गुटों के बीच चल रही है। पूर्व शाह के बेटे रज़ा पहलवी से लेकर मुजाहिदीन-ए-खल्क और कुर्द संगठनों तक। इस बहुपक्षीय जंग का भी लक्ष्य कमोबेश वही है, जो अमेरिका का है, ईरान की सत्ता पर कब्ज़ा। ईरान इजराइल और अमेरिकी संघर्ष अनंत काल तक नहीं चलेगा। ट्रंप का ऐलान है कि ईरान से बिना शर्त समर्पण के अलावा कोई समझौता, युद्धविराम वगैरह नहीं होगा।

युद्ध लगातार चला तो कुछ महीनों में खत्म भी होगा। युद्ध के संभावित परिणाम बहुआयामी हो सकते हैं, संभवत इन चार नतीजों में से कोई एक। जो युद्ध को झेल रहे हैं अथवा जो मात्र बाहरी दर्शक हैं वे भले ही अभी परिणामों पर बहुत ध्यान न केंद्रित कर पा रहे हों पर वे धड़े जो इस परोक्ष जंग में शामिल हैं, अपने को ईरानी सत्ता व्यवस्था का हितधारक समझते हैं, वे इन युद्ध प्रसूत परिणामों पर गहरी नजर बनाए हुए हैं। सबको यकीन है कि ट्रंप जैसा नेता ईरान को मात्र सैन्य क्षमता में कमजोर करके युद्ध रोक देने वाला नहीं और वह वेनेजुएला सरीखी सफलता पा जाये यह भी इस मामले में मुमकिन नहीं।

तीसरा परिदृश्य: आंतरिक काउंसिल से नया सर्वोच्च नेता चुनना

युद्ध के नतीजों का पहला परिदृश्य बनता है कि ईरान की सेना और आईआरजीसी बिना शर्त पूर्ण आत्मसमर्पण कर दे और एकजुट विपक्षी गुट रजा पहलवी की अगुवाई में अंतरिम सरकार बनाए। दूसरा, ईरान में आने वाला नया नेतृत्व पूरी तरह आत्मसमर्पण के बजाय परमाणु तथा मिसाइल कार्यक्रमों पर कुछ समझौता करे, अमेरिका पीछे हटकर इजराइल को निगरानी सौंपे कि उल्लंघन पर वह हमले करेगा। तीसरा, शासन अपनी आंतरिक काउंसिल के माध्यम से स्थिति को संभाल ले। ईरान मिसाइल और ड्रोन हमलों से लड़ता रहे और इस बीच एक नया सर्वोच्च नेता चुन ले।

आईआरजीसी सत्ता थाम ले यानी सैन्य शासन हो जाए और वह अमेरिका प्रेरित विद्रोह को कड़ाई से दबाए। चौथा और सबसे बुरा परिदृश्य यह कि यह कि युद्ध लंबा खिंचते देख अमेरिका कुर्दों और ईरानी सत्ता के दूसरे विरोधी धड़ों को भड़का दे, इस अफरा-तफरी से आजिज उन 40 फीसद लोगों के बीच जो ईरान मूल के नहीं बल्कि अजरबैजान, कुर्दिस्तान से संबंध रखते है, उन कुर्दों और अजेरी लोगों के बीच अस्थिरता फैल जाए जिसके साथ लूर, अरब, बलोच, जेरी भी शामिल हो जाएं। आंदोलनों के समय जो नारा लगा करता था,न गाज़ा न लेबनान, ईरान के लिए मेरी जान, भूल जाएं, जिससे ईरान में विलगाव और विखंडन आरंभ हो जाए, देश गृहयुद्ध तथा आंतरिक कलह एवं हिंसा में जलने लगे।

आईआरजीसी से आंतरिक ताकतें टकराएं, यूरेनियम स्टॉक, परमाणु संयंत्र अतिवादी हाथों में जा जाएं। देश लीबिया जैसा टूट जाए या सीरिया सा बिखर जाए। ट्रंप का पोस्ट-वॉर रणनीति भी यही है। ईरानी सेना और आईआरजीसी पूरी तरह समर्पण कर दे बहुत मुमकिन नहीं। क्योंकि इस्लामी गणराज्य की संस्थाएं अभी भी मजबूत हैं और सत्ता परिवर्तन का रास्ता उतना सरल नहीं है, जितना बाहर से दिखता है। पहलवी को संयुक्त विपक्ष द्वारा नेता स्वीकारने की संभावना भी कम है।

चौथा परिदृश्य: ईरानी गुटों के लिए सबसे भयावह

चौथा परिदृश्य बहुत भयावह है। सत्ता की ताक में लगे ईरानी गुट भी पहला परिदृश्य बिल्कुल नहीं चाहेंगे कि वे मुंह देखते रह जाएं, सत्ता अमेरिका के मुंह लगे। पूर्ण समर्पण के बाद उनके भी हाथ खाली होंगे। वे रजा पहलवी को बाहर रखकर बाजी मारते नहीं देखना चाहेंगे। इसके साथ ही वे चौथा परिदृश्य भी निर्मित होने देना नहीं चाहेंगे इससे वे भी संकट में फंसेंगे उनकी चाहत पूरी होने में बहुत देर लगेगी, ईरान का मलबा ही उनके हाथ आयेगा।

कुल मिलाकर दूसरे और तीसरे परिदृश्य की उम्मीद अधिक है हालांकि ईरान के भीतर सत्ता की जंग लड़ते हितधारक सभी स्थितियों में अपने लिये लाभदायक विकल्प की तलाश में हैं। लेकिन इस संक्रमण के दौर में रज़ा पहलवी युद्ध से पहले से खुद को संक्रमणकालीन नेता के तौरपर पेश कर रहे हैं। फिलहाल उन्होंने ईरानी जनता को संदेश दिया है कि सतर्क रहें और उचित समय पर अंतिम कार्रवाई के लिए सड़कों पर लौटने को तैयार रहें, जिसकी जानकारी मैं आपको दूंगा।

मैं जल्द से जल्द आपके साथ होऊंगा ताकि हम मिलकर ईरान को वापस पा सकें और उसका पुनर्निर्माण कर सकें। वे राजशाही के बजाए एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने का वादा कर रहे हैं। लेकिन पहलवी की राह आसान नहीं है। उनकी सबसे बड़ी कमजोरी उनकी विभाजनकारी छवि है। आरोप है कि वे अमेरिका और इजराइल के हस्तक्षेप को मुक्ति का जरिया मानते हैं।

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अमेरिकी-इजराइली समर्थन पर आलोचना का सामना

ईरान का एक बड़ा वर्ग इसे देशद्रोह, उन्हें विदेशी कठपुतली के बतौर देखता है। अमेरिकी और इजराइली हमलों के प्रति उनके अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख ने भी उन्हें आलोचना के घेरे में ला दिया है। पहलवी का आंदोलन धीरे-धीरे कट्टर दक्षिणपंथी विचारधारा की ओर झुकता दिखाई देता है, जिससे उनकी सामाजिक राजनीतिक स्वीकार्यता सीमित लगती है। उनकी वैधता और लोकप्रियता की समस्या के अलावा ईरान के विपक्ष के बीच बिखराव पहलवी की राह को कंटकाकीर्ण करने वाला है, क्योंकि कई गुट उनके दावों को बदनाम करने की कोशिश में लगे हैं।

फिर रज़ा पहलवी के पास ईरान के भीतर कोई मजबूत संगठनात्मक ढांचा भी नहीं है। दूसरा गुट इस्लामी गणराज्य के खिलाफ संघर्ष करते रहने वाला नेशनल काउंसिल ऑफ रेजिस्टेंस ऑफ ईरान है, मरियम रजवी की अगुवाई वाले इस गुट की जड़ें विद्रोही संगठन मुजाहिदीन-ए-खल्क में हैं। यह भी ईरान को एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने, मृत्युदंड समाप्त करने, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को समान अधिकार देने तथा परमाणु कार्यक्रम समाप्त करने जैसे वादे करता है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि विवादास्पद है।

1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान यह सद्दाम हुसैन का सहयोगी था, सो ईरानियों के मन में इसके प्रति अविश्वास ज्यादा है। रज़ा पहलवी की लोकतांत्रिक महत्वाकांक्षाएं और मुजाहिदीन-ए-खल्क का क्रांतिकारी एजेंडा, तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक वे आपसी मतभेद भुलाकर एक साझा विजन पेश न करें। मरियम रजवी या पहलवी जैसे नेता विदेशी मीडिया में भले ही चर्चित हों, लेकिन ईरान के अंदर उनकी वास्तविक राजनीतिक पकड़ सीमित है।

अफगानिस्तान और इराक से मिली विफलता की सीख

वैसे भी तभी सत्ता में आ सकते हैं, जब अमेरिका जमीनी सेना उतारे। लेकिन जैसा कि अफगानिस्तान और इराक में देखा गया, ऐसी सरकारें कभी भी वैधता हासिल नहीं कर पातीं। तीसरा महत्वपूर्ण खिलाड़ी कुर्द संगठन हैं। ट्रंप इन्हें ही अपना मोहरा बनाना चाहते हैं। हाल ही में कोअलिशन ऑफ पॉलिटिकल फोर्सेज ऑफ ईरानी कुर्दिस्तान नामक गठबंधन के तहत पांच प्रमुख कुर्द संगठनों ने मिलकर राजनीतिक मंच बनाकर कुर्दों के अधिकारों और स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं।

संजय श्रीवास्तव

रज़ा पहलवी जैसे विपक्षी नेता भी कुर्द संगठनों की आलोचना करते रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि विपक्ष के भीतर क्षेत्रीय स्वायत्तता जैसे मुद्दों पर गहरी असहमति है। ईरान में सत्ता संघर्ष जितना बाहर से दिखाई देता है, वास्तविकता उससे कहीं अधिक जटिल है। ईरान में सत्ता परिवर्तन यदि होता होगा तो वह किसी विदेशी हस्तक्षेप या निर्वासित विपक्ष के नेतृत्व में नहीं बल्कि व्यवस्था के भीतर से ही होगा। संभव है कि सत्ता संरचना में कुछ सुधारवादी तत्व उभरें या नया सर्वेच्च नेता अपेक्षाकृत व्यवहारिक नीतियों को अपनाए। ईरान को आज ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है, जो न तो विदेशी हमलों का समर्थन करे और न ही कट्टरपंथ का बल्कि जो ईरानी पहचान और संप्रभुता के आधार पर एक साझा मंच तैयार कर सके। भविष्य की सत्ता संरचना तय करने में समय, संघर्ष और आंतरिक राजनीतिक संतुलन की निर्णायक भूमिका होगी।

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