माता-पिता की देखभाल करो, वरना…
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए.रेवंत रेड्डी ने हाल ही में घोषणा की कि अगर कोई सरकारी कर्मचारी अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल नहीं करता, तो उसकी सैलरी से 10-15 प्रतिशत कटौती कर सीधे माता-पिता के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाएगा। यह विधेयक आने वाले बजट सत्र में पेश किया जाएगा। दरअसल, यह प्रस्ताव 2007 के मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटिजंस एक्ट से प्रेरित है, जो पहले से ही बच्चों को माता-पिता की देखभाल के लिए जिम्मेदार बनाता है। लेकिन अब सरकार इसे और सख्त बनाना चाहती है, खासकर सरकारी कर्मचारियों के लिए, क्योंकि वे सार्वजनिक सेवा में हैं और उनका उदाहरण समाज पर असर डालता है। स्वाभाविक है कि यह खबर सुनकर कई लोग तालियाँ बजा रहे हैं, तो कुछ इसे सरकार का ज्यादा हस्तक्षेप मान रहे हैं।
इसमें तो कोई शक नहीं कि भारत में बुजुर्गों की स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। सयाने बता रहे हैं कि देश में 60 साल से ऊपर की आबादी 10 करोड़ से ज्यादा है और इनमें से कई अकेले रहते हैं या ओल्ड एज होम्स में धकेल दिए जाते हैं। तेलंगाना में भी यही हाल है। मुख्यमंत्री महोदय ने खुद कहा कि उन्हें बुजुर्गों से शिकायतें मिल रही हैं कि उनके बच्चे, जो सरकारी नौकरी में हैं, उनकी परवाह नहीं करते। यही नहीं, विश्वमारी कोरोना के बाद बुजुर्गों की अकेलापन और स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ी हैं, जिससे ऐसे कानून की जरूरत महसूस हुई।
दिव्यांग और वरिष्ठ नागरिक कल्याण पर सरकार का फोकस
तेलंगाना सरकार ने हाल ही में विकलांगों के लिए व्हीलचेयर और हियरिंग एड्स जैसी योजनाएँ भी शुरू की हैं, जो दिखाता है कि वह वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण पर फोकस कर रही है। अब सवाल है, क्या यह पहल सही है? औचित्य के लिहाज से देखें तो हाँ, बिलकुल। हमारी संस्कृति में माता-पिता को देवता माना जाता है और उनके प्रति कर्तव्य निभाने को नैतिक जिम्मेदारी। अगर कोई अच्छी कमाई वाले बेटा-बेटी अपने माता-पिता को अनदेखा करें, तो समाज में गलत संदेश जाता है।
यह कानून बुजुर्गों को आर्थिक सुरक्षा देगा और परिवारों को मजबूत बनाएगा। यह कटौती कई बुजुर्गों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकती है। सरकार का कहना है कि इससे सरकारी कर्मचारियों में जिम्मेदारी का भाव आएगा और समाज में सकारात्मक बदलाव होगा। लेकिन इसके दूसरे पहलू से भी आँख नहीं फेरी जा सकती। क्या सरकार को निजी पारिवारिक मामलों में इतना दखल देना चाहिए? सैलरी कटौती से पहले कैसे साबित होगा कि कर्मचारी वाकई लापरवाह है?
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प्राइवेसी बनाम सरकारी हस्तक्षेप पर उठे गंभीर सवाल
अगर माता-पिता झूठी शिकायत करें या परिवार में कोई पुरानी रंजिश हो, तो क्या होगा? यह कर्मचारियों के मनोबल को गिरा सकता है और उन्हें ब्लैकमेल का शिकार बना सकता है। प्राइवेसी का मुद्दा भी है – क्या सरकार हर घर की जाँच करेगी? इससे सरकारी नौकरियाँ और अनाकर्षक हो सकती हैं, जबकि पहले से ही स्टाफ की कमी है। इतना ही नहीं, ऐसे किसी कानून को लागू करना भी आसान नहीं होगा सबसे पहले, शिकायत तंत्र बनाना पड़ेगा – जैसे हेल्पलाइन या कमेटी जो मामलों की जाँच करे। अदालती प्रक्रिया में समय लगेगा। और क्या हर शिकायत पर ऐक्शन लिया जाएगा?
तेलंगाना में पहले से ही सीनियर सिटिजंस एक्ट है, लेकिन उसका क्रियान्वयन कमजोर है। अगर यह कानून पास हो भी जाए, तो निजी सेक्टर में इसे कैसे फैलाया जाएगा? सरकारी कर्मचारियों से शुरू करना ठीक है, लेकिन पूरे समाज में बदलाव लाने के लिए जागरूकता अभियान ज्यादा जरूरी हैं। यह संविधान के राइट टू प्राइवेसी के प्रावधान से टकरा सकता है, जिससे कोर्ट में चुनौती मिल सकती है। फिर, 10-15 प्रतिशत कटौती तय कैसे होगी? क्या यह फिक्स्ड होगी या केस-दर-केस? यानी, मुख्यमंत्री महोदय की सदाशयता के बावजूद यह घोषणा फिलहाल दूर की कौड़ी ज़्यादा लगती है।
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