तमोगुणी हास्य बनाम सतोगुणी संवेदना

कहा जाता है कि राजा जनक की सभा में जब ऋषि अष्टापा ने प्रवेश किया, तो उनके आठ जगहों से टेढ़े शरीर को देखकर वहाँ विद्यमान पंडित हँसने लगे। अचरज यह कि पंडितों को हँसते देख स्वयं अष्टापा भी ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। राजा ने वजह जाननी चाही, तो वे गंभीरता से बोले – हे राजन! आपकी सभा में एक भी पंडित नहीं, सारे चर्मकार बैठे हैं; जो सिर्फ चमड़ी देखते हैं, आत्मा नहीं। सभा स्तब्ध रह गई। राजा ने ऋषि अष्टापा के चरण स्पर्श कर क्षमा माँगी।

यह आख्यान हमें सिखाता है कि दिव्यांगता का मज़ाक उड़ाना न सिर्फ अज्ञानता है, बल्कि आत्मा का अपमान भी है। तब से अब तक कितनी सहस्राब्दियाँ बीत गईं, लेकिन यह प्रवृत्ति आज भी समाज को विषाक्त कर रही है। अभी, 27 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ऐसा ही एक आईना दिखाया, जब समय रैना और चार अन्य कॉमेडियनों की दिव्यांगों पर की गई संवेदनहीन टिप्पणियों पर फैसला सुनाया। यह फैसला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि उस प्राचीन सबक की आधुनिक गूँज है – हँसी कभी गरिमा की कीमत पर न हो!

एसएमए पीड़ित शिशुओं पर मज़ाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की कठोर टिप्पणी

दरअसल, इंडियाज गॉट लेटेंट शो में समय रैना ने स्पाइनल मस्कुलर अट्रोफी (एसएमए) से पीड़ित शिशुओं का मजाक उड़ाया था। दर्शकों को गुदगुदाती उस तामसिक हँसी में जाने कितनी विवश माताओं की करुण सिसकियाँ शामिल थीं! किसी की विवशता में आनंद महसूस करने वाला समाज रुग्ण नहीं तो और क्या है? क्योर एसएमए फाउंडेशन की याचिका पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने कहा, ह्यूमर किसी की पीड़ा का स्रोत नहीं बन सकता।

कोर्ट ने समय रैना, विपुल गोयल, बलराज घई, सोनाली ठक्कर और निशांत तंवर को हर महीने कम से कम दो कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश दिया। इनमें दिव्यांगों की सफलता की कहानियाँ साझा की जाएँगी और इलाज के लिए धनराशि जुटाई जाएगी। यह सामाजिक दायित्व है – एक ऐसा दायित्व जो अपमान को मरहम में बदल सकता है। कोर्ट ने याद दिलाया कि एसएमए (स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी) जैसी दुर्लभ बीमारियों का इलाज कितना महँगा है। एक इंजेक्शन करोड़ों का होता है!
कहना न होगा कि इस फैसले का उद्देश्य गहरा और भावुक है – जागरूकता और पश्चाताप।

कॉमेडियंस ने माफी माँगी थी, इसलिए कोर्ट ने सख्त सज़ा न सुनाते हुए यह समझाया कि असली माफी कर्मों में है। सीजेआई ने कहा, दिव्यांगों को आपका धन नहीं, सम्मान चाहिए। यह इन्फ्लुएंसर्स को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाता है। सोशल मीडिया के युग में, जहाँ एक चुटकुला पल भर में लाखों तक पहुँच कर करोड़ों की कमाई कर लेता है, संवेदनाओं की अनदेखी आम बात हो गई है।

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तमोगुणी हास्य पर रोक: हँसी में संवेदना का संतुलन ज़रूरी

निषिद्ध और वर्जित विषयों पर हँसना-हँसाना केवल डार्क ह्यूमर ही नहीं, गहरे अर्थों में तमोगुणी हास्य है – विकृति है। होना यह चाहिए कि हँसी पुल बने, न कि दीवार। दिव्यांगों को समाज से जोड़े; काटे नहीं। कोर्ट ने उचित ही सरकार से अपील की है कि दिव्यांगों का उपहास रोकने के लिए एससी-एसटी एक्ट जैसा कानून बने। यह फैसला अष्टापा के उत्तर की तरह है – जो उपहास को ज्ञान में बदल देता है!

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस दूरदर्शितापूर्ण फैसले के प्रभाव व्यापक और दूरगामी होंगे। समय रैना जैसे युवा, जिनके लाखों अनुयायी हैं, अपनी रचनात्मकता को सकारात्मक दिशा दे सकेंगे। उनके शो से फंड जुटेगा, जो जीवन रक्षक इंजेक्शन के लिए क्रांति ला सकता है। और पूर्वाग्रह टूटेंगे। सयाने याद दिला रहे हैं कि भारत में 2.68 करोड़ दिव्यांग हैं, लेकिन सशक्तिकरण सिर्फ 0.1 प्रतिशत को मिलता है। यह फैसला इस आँकड़े को बदलने की शुरुआत साबित हो सकता है। इसके अलावा, इस फैसले का दीर्घ अवधि में यह भी असर होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संतुलित होगी – हँसो, लेकिन क्रूर मत बनो! कॉमेडी इंडस्ट्री में डार्क ह्यूमर की आड़ में छिपी असंवेदनशीलता पर लगाम लगनी ही चाहिए!

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