टंकी फुल, खोपड़ी खाली !

हैदराबाद की सड़कों पर इन दिनों एक नया ट्रैफिक नियम लागू होता दिख रहा है – जो पहले पेट्रोल पंप पहुँचेगा, वही देशभक्त कहलाएगा। बाकी लोग शायद राष्ट्रहित में पीछे रह गए नागरिक माने जाएँगे। ईरान युद्ध की दूर की धमक ने यहाँ के उपभोक्ताओं को इतना पास ला दिया है कि पेट्रोल पंप अब लोकतांत्रिक कुंभ बन चुके हैं – लंबी कतारें, अधीर चेहरे और बस एक और कैन भर दीजिए का सामूहिक मंत्र।

विडंबना देखिए – सरकार और तेल कंपनियाँ लगातार कह रही हैं कि पेट्रोल, डीजल और एलपीजी का पर्याप्त भंडार है, कई महीनों के लिए भी। फिर भी जनता का भरोसा व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय में दाखिल होकर फर्स्ट क्लास से पास हो चुका है। अफवाहें इतनी तेज़ दौड़ीं कि असली सप्लाई ट्रक पीछे छूट गए। दरअसल, यह घबराहट सिर्फ युद्ध का साइड-इफेक्ट नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मनोदशा का आईना है।

नो स्टॉक बोर्ड से फैली घबराहट और अफवाह

जैसे ही कहीं नो स्टॉक का बोर्ड दिखा, लोगों ने यह मान लिया कि अब अगली सुबह सूरज नहीं उगेगा, क्योंकि पेट्रोल खत्म हो जाएगा। और फिर शुरू हुआ वह राष्ट्रीय खेल – पहले मैं; पहले मैं। नतीजा यह कि जहाँ पहले कोई संकट नहीं था, वहाँ कृत्रिम संकट खड़ा हो गया – विकट संकट! हैदराबाद में हालात ऐसे बने कि कई पेट्रोल पंप अस्थायी रूप से सूख गए। माँग अचानक इतनी बढ़ गई कि सप्लाई की साँस फूल गई। संकट असली नहीं था, लेकिन कतारें असली थीं। डर काल्पनिक था, पर टंकी सचमुच फुल थी।

इस पूरे घटनाक्रम में अफवाह नामक अदृश्य जीव की भूमिका निर्णायक रही। सोशल मीडिया ने इस जीव को पंख दिए। किसी ने लिखा- कल से पेट्रोल बंद! तो किसी ने सलाह दी- आज ही भरवा लो, वरना पछताओगे! लोग गाड़ियों के अलावा बोतलों, डिब्बों और यहाँ तक कि पानी के कैनों में भी ईंधन भरने लगे। यानी भारत ने एक बार फिर जुगाड़ को नई ऊँचाई पर पहुँचा दिया। अब कोल्ड ड्रिंक की बोतल में भी पेट्रोल फिट हो सकता है!

लेकिन इस हड़बड़ी के पीछे एक गंभीर आर्थिक सच्चाई भी है। पश्चिम एशिया में तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रम ने वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव डाला है। खासकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील मार्गों में संभावित व्यवधान ने। इससे कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है। ऐसे में उपभोक्ता का डर पूरी तरह निराधार भी नहीं। उसे लगता है कि आज न भरवा लिया तो कल महँगा पड़ेगा।

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डर और भीड़ से बाजार का संतुलन बिगड़ा

पर समस्या तब पैदा होती है जब यह डर तर्क को निगल जाता है। एक व्यक्ति की सावधानी जब लाखों की हड़बड़ी बन जाती है, तो वह बाजार को असंतुलित कर देती है। यही कारण है कि कुछ जगहों पर प्रशासन को सीमित वितरण जैसे कदम उठाने पड़े। पेट्रोल राशन की दुकान की तरह मिलने लगा! इस प्रवृत्ति के दूरगामी दुष्परिणाम भी कम चिंताजनक नहीं। पहला, कृत्रिम कमी से कालाबाज़ारी को बढ़ावा मिलता है।

दूसरा, सप्लाई चेन पर अनावश्यक दबाव पड़ता है। तीसरा, आम नागरिक (जिसे सच में जरूरत है) कतार में पीछे छूट जाता है और चौथा, हम एक बार फिर यह साबित कर देते हैं कि संकट से पहले ही हम संकट पैदा करने में माहिर हैं! विडंबना देखिए। हम युद्ध से नहीं, अपने ही डर से हार रहे हैं। ईरान की मिसाइलें भले हजारों किलोमीटर दूर गिर रही हों, लेकिन उनका मनोवैज्ञानिक असर हैदराबाद के पेट्रोल पंपों पर लाइन बनाकर खड़ा है।

समाधान बहुत जटिल नहीं। सूचना पर भरोसा, अफवाह से दूरी और थोड़ी-सी नागरिक समझदारी। बस इतना ही। वरना अगली बार अगर नमक, चीनी या हवा की कमी की अफवाह फैली, तो शायद हम ऑक्सीजन भी बोतलों में भरकर घर ले जाते दिखाई दें! अंततः सवाल यह नहीं कि पेट्रोल कितना है; सवाल यह है कि धैर्य कितना बचा है। और फिलहाल, टंकी तो फुल है; पर दिमाग खाली होने का खतरा ज्यादा दिख रहा है!

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