तप से होता है सद्गुणों का विकास : भाग्यचन्द्रजी म.सा.
हैदराबाद, तप से सद्गुणों का विकास होता है। तप के माध्यम से व्यक्ति में सहनशीलता, शांति, समता और संयम जैसे सद्गुण विकसित होते हैं। तप से इच्छाओं पर नियंत्रण किया जा सकता है। यह इच्छाओं का निरोध करने में मदद करता है, जो जैन दर्शन के अनुसार पूर्णता प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।
उक्त उद्गार गोशामहल स्थित शंखेश्वर भवन में श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ जैन संघ के तत्वावधान में भाग्यचन्द्रजी म.सा. ने व्यक्त किये। म.सा. ने कहा तप का अर्थ है आत्म अनुशासन, तपस्या, और इच्छाओं को नियंत्रित कर मन, वचन और कर्म से आत्म-शुद्धि करना। इससे आध्यात्मिक उन्नति होती है। इसमें दैहिक (शरीर से), वाचिक (वाणी से) और मानसिक (मन से) तप शामिल हैं। तप का अंतिम लक्ष्य स्वयं को परिष्कृत करना, ऊर्जा का संरक्षण करना और अंतत आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करना है।
शरीर और मन को शुद्ध करता है तप
म.सा. ने तप के प्रकार के बारे में कहा कि शारीरिक तप (दैहिक तप) दूसरों को कष्ट न पहुँचाना, सत्य बोलना और गुरुजनों का सम्मान करना, वाचिक तप (वाणी का तप) शांत, प्रिय, और सत्य वचन बोलना, स्वाध्याय और अध्ययन करना और मानसिक तप मन में प्रसन्नता, सौम्यता और आत्म-नियंत्रण रखना है। म.सा. ने कहा कि तप से आत्म शुद्धि और विकास होता है।
तप शरीर और मन को शुद्ध करता है, जिससे सुप्त संस्कार जागृत होते हैं और आध्यात्मिक विकास की गति तेज होती है। यह ऊर्जा का संरक्षण करता है। तप से प्राप्त ऊर्जा का संरक्षण और सुनियोजन किया जाता है, जिससे व्यक्ति सामर्थ्यवान बनता है। जीवन में प्रमुख लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए तपस्या और साधना आवश्यक है।
प्रचार संयोजक जसराज देवड़ा धोका ने बताया कि प्रवचन में प्रभावना कांतिलाल तेजा लुंकड़ खण्डप वालों की ओर से दी गयी। कल, बुधवार को सुबह 8 बजे संपूर्ण ओलीजी के लाभार्थी चंपालाल देवीचन्द भंडारी की ओर से पारणे होंगे। सभी तपस्वी समय पर पधारें। अध्यक्ष चंपालाल भंडारी ने संघ में भव्य ओलीजी की आराधना करने हेतु तपस्वियों की अनुमोदना की।
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