तेलंगाना हाईकोर्ट : विद्यार्थियों को राहत पहुँचाने के निर्देश

हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने प्रश्न किया कि कॉलेज के विद्यार्थियों द्वारा जमा किया गया शुल्क कॉलेज द्वारा इंटरमीडिएट बोर्ड में जमा न करने का खामियाजा विद्यार्थी क्यों भुगतें और इससे विद्यार्थियों का भविष्य क्यों प्रभावित हो। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कॉलेज द्वारा की गई गलतियों के कारण विद्यार्थियों के अधिकारों का हनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

अदालत ने कहा कि पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी अपनी पढ़ाई पर ध्यान देते हुए निर्धारित समयावधि में शुल्क भर रहे हैं, लेकिन संबंधित कॉलेज शुल्क बोर्ड में जमा नहीं कर रहे हैं। इस कारण विद्यार्थियों को यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि वे इस बात को लेकर चिंतित रहें कि कॉलेज और बोर्ड के बीच क्या हो रहा है। निर्धारित समयावधि में शुल्क भरने के बावजूद विद्यार्थी चिंता का शिकार हो रहे हैं।

हॉल टिकट न मिलने के करण व्यावहारिक परीक्षा के लिए अनुमति देने के लिए इंटरमीडिएट बोर्ड को आदेश देने का आग्रह करते हुए दायर याचिकाओं पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस ई.वी. वेणुगोपाल ने सुनवाई की। दलील सुनने के पश्चात न्यायाधीश ने 25 फरवरी से प्रथम वर्ष की परीक्षा और 26 फरवरी से द्वितीय वर्ष की परीक्षा के लिए अदालत की शरण लेने वाले विद्यार्थियों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए परीक्षा लिखने की अनुमति देने के लिए इंटरमीडिएट बोर्ड को आदेश दिए।

शुल्क भरने के बावजूद भी हॉल टिकट जारी न करने और परीक्षा लिखने की अनुमति न देने के इंटरमीडिएट बोर्ड को आदेश देने का आग्रह करते हुए 9 विद्यार्थियों ने अलग-अलग याचिकाएँ दायर की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने दलील देते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने निर्धारित समयावधि के भीतर ही शुल्क जमा किया, लेकिन संबंधित कॉलेज द्वारा प्राप्त किया गया शुल्क इंटरमीडिएट बोर्ड में जमा नहीं किया गया।

13.7 लाख छात्र परीक्षा में शामिल, आईवीआर से शुल्क सुविधा

इस कारण परीक्षा लिखने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने बताया कि परीक्षा शुल्क सीधे तौर पर इंटरमीडिएट बोर्ड में जमा करने की विद्यार्थियों को सुविधा नहीं है और विद्यार्थियों द्वारा वसूला गया शुल्क कॉलेज की ओर से इंटरमीडिएट बोर्ड में जमा किया जाता है। कॉलेज की गलती के कारण इसका खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है। इंटरमीडिएट बोर्ड की ओर से अधिवक्ता ने प्रतिवाद करते हुए कहा कि प्रथम और द्वितीय वर्ष की परीक्षा में इस वर्ष कुल 13.7 लाख विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। उन्होंने बताया कि शुल्क जमा करने के लिए आईवीआर व्यवस्था उपलब्ध है।

इसके बावजूद भी याचिकाकर्ताओं ने इस सुविधा उपयोग नहीं किया। उन्होंने बताया कि विद्यार्थियों को व्हॉट्सऐप व अन्य माध्यमों से शुल्क भरने के लिए मैसेज भी भेजे गए। समाचार-पत्रों में समाचार भी जारी किए गए। वर्तमान समय तक व्यावहारिक परीक्षाएँ पूर्ण हो चुकी है और लिखित परीक्षा प्रारंभ होने जा रही है। इस स्तर पर याचिकाकर्ता को अनुमति देने पर तकनीकी समस्या उत्पन्न हो सकती है।

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दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले में विद्यार्थियों की कोई गलती नहीं है। इसके बावजूद उनके अधिकारों का हनन हो रहा है। विद्यार्थियों के अधिकारों का हनन अनुचित है। उन्होंने इंटर बोर्ड से इस मामले को सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए आवश्यक निर्णय लेने के आदेश दिए। इसके साथ ही वर्तमान समय तक संपन्न व्यवहारिक परीक्षा से वंचित याचिकाकर्ताओं को विशेष तौर पर पुनः व्यवहारिक परीक्षा का ओयजन करने के आदेश जारी किए। इस आदेश के साथ मामले की अगली सुनवाई 26 फरवरी तक स्थगित कर दी गयी। इस दौरान विद्यार्थियों से वसूला गया शुल्क इंटरमीडिएट बोर्ड में जमा करने के कॉलेजों को आदेश देते हुए प्रतियाचिका दायर करने के लिए नोटिस जारी किया।

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