गरिमापूर्ण विदाई के हकदार थे हर दिल अजीज अभिनेता धर्मेंद्र
धर्मेंद्र के निधन के बाद जिस तरह की परिस्थितियां बनीं- औपचारिक घोषणा का अभाव, अंतिम संस्कार की तैयारी में घोर गोपनीयता, मीडिया या प्रशंसकों की पहुंच पर रोक तथा सार्वजनिक श्रद्धांजलि के किसी अवसर का न होना- इन सबने कई गंभीर सवालों को जन्म दिया है। यह प्रश्न किसी की निजता का हनन करने के लिए नहीं बल्कि इसलिए उठते हैं कि धर्मेंद्र केवल किसी परिवार के सदस्य नहीं थे; वे राष्ट्रीय सांस्कृतिक स्मृति के हिस्सा थे। वे पद्मभूषण विजेता, पूर्व सांसद और सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेताओं में से एक रहे। ऐसे में उनकी विदाई का स्वरूप सिर्फ घरेलू निर्णय नहीं बल्कि सांस्कृतिक गरिमा का प्रश्न भी था। पद्म पुरस्कार विजेताओं के संस्कार का एक प्रोटोकॉल होता है,जो धर्मेंद्र के मामले में कतई नहीं निभाया गया।
पहले पपराजियों और कुछ टीवी चैनलों ने जिस तरह की हड़बड़ी अभिनेता धर्मेंद्र के मरने की खबर को लेकर दिखायी थी, धर्मेंद्र के वाकई में निधन के बाद क्या वैसी ही लापरवाही उनके घर के लोगों ने नहीं दिखायी? जिस तरह निधन की बिना किसी औपचारिक घोषणा, मीडिया के क्रियाकर्म स्थल पर प्रवेश की पाबंदी आदि लगाकर आनन-फानन में इस महान अभिनेता, पद्मभूषण विजेता और पूर्व मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट का अंतिम संस्कार किया गया, वह न केवल करोड़ों लोगों के चहेते अभिनेता की डिग्निटी के खिलाफ था बल्कि जिस तरह उनको गार्ड ऑफ ऑनर दिये जाने की कोई तस्वीर नहीं आयी, उससे लगता है कि परिवार की हड़बड़ी और लापरवाही से उनकी मौत को वह गरिमा नहीं मिल सकी, जो वास्तव में मिलनी चाहिए थी?
क्योंकि धर्मेंद्र महज फिल्म अभिनेता भर नहीं थे। वह 2004 से 2009 तक देश की 15 वीं लोकसभा के सदस्य भी थे, साथ ही उन्हें साल 2012 में देश के तीसरे सर्वेच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। जहां तक उनके सिने सितारा होने की बात है तो भारतीय सिनेमा के इतिहास में धर्मेंद्र जैसा दूसरा चेहरा नहीं है- पंजाब की सोंधी मिट्टी से निकला हुआ मृदु स्वभाव का नायक, करोड़ों दिलों की धड़कन, एक ऐसा कलाकार जिसके व्यक्तित्व में सहजता, ईमानदार मुस्कान और आत्मीयता कूट-कूटकर भरी थी।
धर्मेंद्र के निधन पर सार्वजनिक घोषणा और श्रद्धांजलि नहीं हुई
जब कभी मुंबई से लेकर पंजाब के किसी कस्बे तक धरम पाजी का नाम लिया जाता था, तो उस उच्चारण में सम्मान, अपनापन और स्नेह एक साथ मिलते दिखते थे। इसीलिए, उनके निधन के बाद जिस तरह की परिस्थितियां बनीं- औपचारिक घोषणा का अभाव, अंतिम संस्कार की तैयारी में घोर गोपनीयता, मीडिया या प्रशंसकों की पहुंच पर रोक तथा सार्वजनिक श्रद्धांजलि के किसी अवसर का न होना- इन सबने कई गंभीर सवालों को जन्म दिया है।
यह प्रश्न किसी की निजता का हनन करने के लिए नहीं बल्कि इसलिए उठते हैं कि धर्मेंद्र केवल किसी परिवार के सदस्य नहीं थे; वे राष्ट्रीय सांस्कृतिक स्मृति के हिस्सा थे। ऐसे में सवाल है क्या परिवार ने वही हड़बड़ी दोहराई, जिसकी शिकायत पहले मीडिया से की गई थी? बीते वर्षों में दो-तीन मौकों पर ऐसा हुआ था कि पपराज़ी या कुछ टीवी चैनलों ने धर्मेंद्र के स्वास्थ्य या निधन को लेकर गलत खबरें चलाई थीं।
पिछले पखवाड़े भी यह हुआ परिवार और प्रशंसकों ने उस समय इस जल्दबाज़ी और संवेदनहीनता पर नाराज़गी भी जताई थी। लेकिन विडंबना यह है कि वास्तविक निधन के समय भी कुछ वैसी ही स्थिति देखने को मिली, बस इस बार जल्दबाज़ी मीडिया नहीं, परिवार की तरफ से दिखी। धर्मेन्द्र के करोड़ों चाहने वालों के लिए कोई औपचारिक मेडिकल बुलेटिन नहीं, निधन का समय और कारण स्पष्ट रूप से सार्वजनिक नहीं किया गया।
धर्मेंद्र के प्रशंसकों को अंतिम श्रद्धांजलि का मौका नहीं मिला
अंतिम संस्कार से पहले किसी सार्वजनिक श्रद्धांजलि या दर्शन का आयोजन नहीं। साथ ही अंतिम संस्कार स्थल के पास मीडिया पर पूर्ण रोक। सवाल यह नहीं कि मीडिया को अनुमति देनी चाहिए थी। सवाल यह है कि क्या करोड़ों प्रशंसकों, जिनकी भावनाओं पर धर्मेंद्र जीवन भर खरे उतरे, उन्हें अपने प्रिय अभिनेता को आख़िरी बार श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं मिलना चाहिए था? एक ऐसे कलाकार के साथ, जिसने अपने जीवन में केवल अपनापन बांटा, क्या उनकी विदाई इतनी बंद और सीमित होनी चाहिए थी?
इस हड़बड़ी से दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह उभरता है कि क्या एक पूर्व सांसद और पद्मश्री विजेता को वह औपचारिक सम्मान मिला, जिसके वे हकदार थे? संसद की परंपरा के अनुसार, जब कोई पूर्व सांसद दिवंगत होता है, तो अक्सर सरकारी स्तर पर शोक संदेश, सार्वजनिक सम्मान और कई बार पुलिस गार्ड ऑफ ऑनर जैसी औपचारिकताएँ की जाती हैं। लेकिन इस मामले में गार्ड ऑ़फ ऑनर का कोई दृश्य सामने नहीं आया।
किसी बड़े सार्वजनिक शहराती समारोह का आयोजन हुआ और न ही यह स्पष्ट किया गया कि क्या सरकारी प्रोटोकॉल का पालन किया गया या नहीं। भले ही अंतिम संस्कार धार्मिक मान्यताओं के अनुसार किया गया हो, पर पब्लिक लाइफ से जुड़े किसी व्यक्ति के सम्मान का प्रश्न निजी न होकर सार्वजनिक होता है। यह भी तर्क दिया जा सकता है कि परिवार की इच्छा सर्वेपरि है और यह बिल्कुल सही है। परंतु किसी राष्ट्रीय सांस्कृतिक आइकन की विदाई एक निजी घटना और सार्वजनिक महत्व की घटना- दोनों का संगम होती है और यही जगह शायद इस मामले में खाली रह गई।
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धर्मेंद्र की विदाई में स्वर्णिम हिंदी फिल्म युग की सार्वजनिकता जरूरी
इस संबंध में तीसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या गोपनीयता ने श्रद्धांजलि की गरिमा को सीमित कर दिया है? निश्चित रूप से ऐसा माना जा सकता है, क्योंकि कला की दुनिया में कई ऐसे उदाहरण है, जहां दिवंगत कलाकारों को अंतिम विदाई अत्यंत गरिमापूर्ण और सार्वजनिक भागीदारी के साथ दी गई है। चाहे वो राजकपूर रहे हों, चाहे दिलीप कुमार हों, चाहे लता मंगेशकर या फिर श्रीदेवी। इन सभी के अंतिम संस्कारों की बकायदा औपचारिक घोषणा हुई थी।
राज्य स्तर पर सम्मान मिला था और सबसे बढ़कर उनके चाहने वालों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने का मौका दिया गया था। इनके प्रशंसकों ने दूर से ही सही, लेकिन अपने चहेते हीरो या हीरोइन के दर्शन किये थे, जो धर्मेंद्र के साथ नहीं हुआ। उन्हें एक बंद एम्बुलेंस में बिना किसी सूचना के शमशान घाट तक ले जाया गया और फिर एक-एक कर वहीं सेलिब्रिटीज पहुंचे। धर्मेंद्र जिस सिने दौर के प्रतीक थे।
1960 से 1990 तक के उस दौर को स्वर्णिम हिंदी फिल्म युग कहा जाता है, जिसकी स्मृतियां आज भी करोड़ों भारतीयों के जीवन का हिस्सा हैं। ऐसे में उनकी विदाई में सार्वजनिकता का कुछ अंश तो होना ही चाहिए था। याद रखिए, गोपनीयता कभी-कभी सम्मान की रक्षा की बजाय उसे सीमित कर देती है। जो शायद ही-मैन धर्मेंद्र के साथ हुआ, जो अपनी एक फिल्म में कहते हैं- हम मौत का भी स्वागत करते हैं।
धर्मेंद्र की अंतिम विदाई उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व के खिलाफ
कई बार जहन में आता है कि क्या धर्मेंद्र के परिजनों ने मीडिया की गलतियों का बदला, उनके चाहने वालों से ले लिया? पिछले सालों में अगर गलत खबरें चलीं, पपराजियों ने अगर उन्हें लेकर असंवेदनशील व्यवहार दर्शाया, तो क्या इन गलतियों की सजा उनके करोड़ों चाहने वालों से लिया जाना चाहिए? उनके लिए धर्मेंद्र केवल एक अभिनेता नहीं बल्कि भावनात्मक विरासत थे। धर्मेंद्र ने कभी अपने दर्शकों से दूरी बनाए नहीं रखी थी। वैसे भी वह खुले दिल और मिट्टी की खुशबू वाले कलाकार थे। इसलिए उनकी विदाई में सार्वजनिक खुलेपन की जरूरत थी, जबकि हकीकत इसके उलट दिखी।

जिस तरह से उनकी अंतिम विदाई चुपचाप हुई, वह उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व के बिल्कुल खिलाफ रही। हालांकि यह किसी पर आरोप-प्रत्यारोप के लिए उठाये गये सवाल नहीं है। वास्तव में यह एक सांस्कृतिक विमर्श के लिए जरूरी सवाल हैं। इस लेख का मकसद कतई उनके परिवार पर किसी तरह अंगुली उठाना नहीं है। हर परिवार को दुख के समय निजता का पूरा अधिकार है। पर सवाल यह है कि क्या धर्मेंद्र किसी एक परिवार की निजी संपत्ति थे? नहीं। वह राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा थे। इसलिए उनके साथ इससे अलग और ज्यादा गरिमापूर्ण विदाई व्यवहार की अपेक्षा थी।
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