बॉलीवुड में बार-बार लौटकर आता है रोमांटिक फिल्मों का दौर
मोहित सूरी ने अपनी नई फिल्म सैय्यारा के साथ ही एक बार फिर से बॉलीवुड को रोमांटिक बना दिया है। इस फिल्म के जरिये अहान पांडे, जो कि अनन्या पांडे के कजन हैं और अनीत पड्डा ने डेव्यू किया है। इन दो न्यू-कमर ने अपनी पहली फिल्म से ही बहुत ज्यादा बज पैदा कर दिया। कई फैंस ने तो फिल्म आने के पहले ही इसके ब्लॉकबस्टर होने की घोषणा कर दी थी और पहले दिन के इसके कलेक्शन ने यह बात सही भी साबित की है।

हालांकि तब लग रहा था कि यह एक प्रमोशन ट्रिक है, लेकिन अब साबित हो गया है कि अगर टैलेंट हो तो बड़े नाम या पीआर न भी हों तो कामयाबी का शिखर छुआ जा सकता है। फिल्म ने पहले ही दिन जिस तरह से 20 करोड़ रुपये की कमाई की, वह हैरान करने वाला रहा। यह कमाई उम्मीद से कहीं ज्यादा थी। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि सैय्यारा के साथ ही एक बार फिर से बॉलीवुड में रोमांटिक जेनर की जबर्दस्त वापसी हुई है।
क्योंकि सैय्यारा एक रोमांटिक ड्रामा फिल्म है, जिसकी नैशनल अवार्ड विनर डायरेक्टर मधुर भंडारकार ने भी तारीफ की है। वास्तव में फिल्म में न्यू-कमर अहान पांडे और अनीत पड्डा ने अपनी शानदार ऐक्टिंग से सबका दिल जीत लिया है। इसके साथ ही कई सालों से मुरझाया और नई थीम की तलाश कर रहा, बॉलीवुड फिर से हरा-भरा हो गया है। मानो उसे कामयाबी का पुराना रोमांटिक फार्मूला हाथ लग गया हो, जिसके बाद कई फिल्म समीक्षक कह रहे हैं कि बॉलीवुड में रोमांटिक फिल्मों का दौर फिर से लौट आया है।
हर दौर में बदला रोमांस, लेकिन बॉलीवुड में हमेशा कायम

लेकिन सही बात तो यह है कि जब से बॉलीवुड का अस्तित्व है, यहां से रोमांटिक फिल्मों का दौर कहीं गया ही नहीं। ऐसा कोई समय नहीं रहा जब कुछ रोमांटिक फिल्मों और उनके नायकों ने बॉलीवुड में धमाल न मचाया हो। कभी देवदास, कभी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कभी गली ब्वॉय, कभी रॉकी और रानी तो कभी कोई और। हर दौर में कुछ रोमांटिक फिल्में बार-बार बॉलीवुड पर हुकूमत करती रही हैं। सिर्फ बॉलीवुड हर दौर के हिसाब से अपनी रोमांटिक कहानियां चुन लेता है बल्कि ये कहानियां उस दौर के घोषित आदर्श का पर्याय बन जाती हैं।

मसलन, 1950 के दशक में आवारा, श्री-420 जैसी आदर्शवादी प्रेम कहानियों का दौर था, तो 1960 के दशक में मुगल-ए-आजम और आराधना जैसी क्लासिक इमोशनल लव का स्टोरी का ट्रेंड था। 1970 के दशक में आयी कटी पतंग और अमर प्रेम दर्द व बलिदान के ट्रेंड से ओतप्रोत थीं, तो 1980 के दशक में आयी रोमांटिक फिल्में जैसे एक दूजे के लिए और मैंने प्यार किया, प्यार में युवा विद्रोह का नूमना थीं।
साल 1990 के दशक में दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे तथा हम दिल दे चुके सनम जैसी फिल्में सपना सजाओ और सच्चा पाओ जैसी धारणा की पुष्टि कर रही थीं, तो 2000 के दौर में जब वी मेट या कल हो न हो, मॉडर्न प्रेम और प्रेम तथा आकर्षण में कंयूजन का ऐसा ट्रेंड बयां कर रही थीं, जो उस दौर की सच्ची प्रेम कहानियों में हर तरफ दिख रहा था।
बॉलीवुड में रोमांस का जादू कभी नहीं होता फीका
साल 2010 में आयी रोमांटिक फिल्में जैसे तमाशा, बर्फी और लुकाछुपी, ये ऐसी कहानियां थीं, जिनमें मानसिक और सामाजिक प्रेम की परत दर परत मौजूदगी थी। इसी क्रम में साल 2020 के दौर में शरेशाह, गहराईयां तथा रॉकी और रानी जैसी फिल्में आयीं, जो इमोशनल के साथ रियलिज्म का परचम बुलंद कर रही थीं। मतलब यह कि हर दौर में प्यार का रूप बदलता रहा है। लेकिन बॉलीवुड में रोमांटिक फिल्मों का दौर सही मायनों में कभी गया ही नहीं।

सवाल है आखिर बॉलीवुड इस जेनर की फिल्मों में इस कदर माहिर क्यों हैं? दरसअल इसके पीछे एक बड़ी वजह तो सांस्कृतिक है और दूसरी बड़ी वजह कि हॉलीवुड के बाद दुनिया की किसी भी दूसरी फिल्म इंडस्ट्री से कहीं ज्यादा तकनीकी रूप से उन्नत हमारा बॉलीवुड है। हमारी ज्यादातर रोमांटिक फिल्मों में शानदार और कानों को पसंद आने वाला म्यूजिक भी होता है तथा ऐसी प्रेम कहानी होती है, जिसका जादू हम सबके सिर पर चढ़कर बोलता है।
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इसलिए कोई भी दौर हो बॉलीवुड में रोमांटिक फिल्में बार बार दर्शकों को अपनी तरफ खींचती है। एक बात यह भी है कि रियल लाइफ की सख्ती से छुटकारा ये कलरफुल और आइडियल प्रेम कहानियां ही आसानी से देती हैं। इसलिए हम भारतीयों की जिंदगी के रोजमर्रा के कष्ट बॉलीवुड के तीन घंटों के ड्रामों में आसानी से दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि बॉलीवुड से रोमांटिक फिल्मों का दौर जाता ही नहीं।
डी.जे.नंदन
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