मौन का महायज्ञ

सरस्वती अम्मा जब अपने बड़े बेटे विकास के आलीशान पेंटाहाउस में रहने आईं, तो अपने साथ बिस्तरों के बीच लपेटकर एक पुराना पीला पड़ चुका पत्थर का सिल-बट्टा लाई थीं। विकास ने करोड़ों की लागत से मॉड्यूलर किचन बनवाया था, जहाँ बटन दबाते ही मसाले खुद-ब-खुद मसाले पिस जाते थे।

माँ, यह पत्थर क्यों लाईं? हाथ दुःखने लगेंगे, मिक्सी है न! विकास ने मुस्कुराकर कहा। सरस्वती अम्मा ने एक मार्मिक अपराधी जैसी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, बेटा, मिक्सी की आवाज़ से तेरी शांति भंग होगी। वैसे भी मुझे तो अब पत्थर की तरह ही घिसना है। तू बस अपनी तरक्की देख, मेरी हड्डियों की कटकटाहट पर ध्यान मत दे।

अगले ही दिन से मौन युद्ध शुरू हो गया। विकास की पत्नी ईशा ने अम्मा के लिए एक महँगी मसाज चेयर खरीदी थी ताकि उनके घुटनों का दर्द कम हो सके। पर अम्मा उस पर कभी नहीं बैठीं। वे घर की उस बालकनी के फर्श पर बैठतीं जहाँ सीधी धूप और धूल आती थी। जब ईशा उन्हें उठाने जाती, तो वे सजल आँखों से कहतीं, बहू, मुझे इस मखमल की आदत मत डाल।

कल को जब यमराज आएँगे, तो मैं उन्हें ये नहीं कह पाऊँगी कि मैं मखमल छोड़कर नहीं चल सकती। मुझे ज़मीन की आदत रहने दे, ताकि तुझे मेरी कमी महसूस न हो। ईशा को लगा जैसे किसी ने उसके प्यार भरे उपहार को स्वार्थ का ठप्पा लगा दिया हो। वह कुर्सी ड्राइंग रूम में एक लावारिस लाश की तरह पड़ी रही।

अम्मा की मार्मिक सेवा का अगला पड़ाव थे- घर में दो रसोइए, पर अम्मा ने कसम खा ली थी कि वे अपना खाना खुद बनाएँगी। दोपहर में जब एसी की ठंडी हवा कमरों में तैरती, तो सरस्वती रसोई के एक कोने में पसीने से तर-बतर होकर अपने लिए दो मोटी रोटियाँ सेंकतीं। विकास ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, माँ, महाराज (रसोइया) खड़ा है, आप क्यों तप रही हैं?

अम्मा ने पल्लू से माथे का पसीना पोंछा और एक ऐसी आह भरी जो सीधे विकास के कलेजे को चीर गई। बेटा, जब तू छोटा था, तो मैंने चूल्हे की आग में अपनी आँखें गलाई थीं। अब इन गैस के चूल्हों से क्या डरना? तू अपनी स्टेटस वाली दावतें उड़ा, मुझे तो बस इस पसीने का स्वाद ही भाता है। वैसे भी बड़े घरों में बूढ़ों का हाथ चलते रहना चाहिए, वरना लोग बोझ कहते हैं।

उस रात विकास को लगा कि उसने रोटी नहीं, अपनी माँ का पसीना खाया है। उसका डिनर टेबल एक प्रताड़ना का केंद्र बन गया था। पराकाष्ठा तब हुई, जब विकास ने अम्मा के कमरे में रिमोट वाला बेड लगवाया। अम्मा ने उस बिस्तर को छुआ तक नहीं। वो रात को पतली-सी दरी बिछाकर कमरे के दरवाज़े के ठीक पीछे सो जातीं। जब रात को विकास पानी पीने के लिए बाहर निकलता, तो दरवाज़ा अम्मा के शरीर से टकराता।

माँ! यहाँ क्यों सो रही हैं? चोट लग जाएगी! विकास हड़बड़ाकर चिल्लाता। अम्मा अँधेरे में उठकर बैठतीं और अपनी आवाज़ में दुनिया भर की करुणा भरकर कहतीं, दरवाज़े के पीछे इसलिए सोती हूँ बेटा, ताकि अगर रात को मेरी ज़रूरत पड़े, तो तुझे आवाज़ न देनी पड़े। मेरी देह से टकराकर तुझे पता चल जाए कि तेरी माँ अभी ज़िंदा है।

बिस्तर तो राजाओं के लिए होते हैं, माँ तो बस एक ढाल होती है। विकास उस रात सो नहीं सका। उसे अपनी सफलता एक अपराध लगने लगी। उसे लगा कि वह एक ऐसा विलासी राक्षस है जिसने अपनी माँ को दरवाज़े का पायदान बना दिया। अम्मा की यह भयानक विनम्रता एक ऐसा अदृश्य कोड़ा थी, जिसकी हर फटकार पर समाज की तालियाँ बजती थीं और विकास की पीठ नीली पड़ रही थी।

एक दिन हारकर विकास ने कहा, माँ, आप जो चाहेंगी, वही होगा। बताइये आपको क्या चाहिए? मैं यह सब ऐशो-आराम छोड़ दूँ? अम्मा ने विकास के सिर पर हाथ रखा, उनकी आँखों में एक विजयी पवित्रता थी। वे बोलीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा, बस तू खुश रह। मैं तो बस अपनी अंतिम-यात्रा की रिहर्सल कर रही हूँ। तू तो मुझे अपनी कार में घुमाना चाहता है, पर मैं तो नंगे पाँव चलने का अभ्यास कर रही हूँ ताकि तुझे मेरे जाने के बाद कंधे का बोझ भारी न लगे।

विकास फूट-फूट कर रो पड़ा। वह समझ गया कि वह अम्मा की ममता के सिंहासन को कभी नहीं जीत पाएगा। अम्मा ने दुःखी होने का वह नैतिक ऊँचाई वाला स्थान चुन लिया था, जहाँ से वे उसे ताउम्र अपराधी महसूस करा सकती थीं।
उस घर की दीवारों पर अब पेंट नहीं, अपराधबोध की परतें थीं। अम्मा जीत चुकी थीं। वे उस घर की सबसे बड़ी त्यागी थीं, जिनकी सादगी ने पूरे परिवार की सुख-शांति को सरेआम सूली पर टाँग दिया था।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

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