राज्य सरकार के प्रति उच्च न्यायालय ने जताई नाराजगी
हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने राज्य के प्रति गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि नीम्स में कर्मचारियों को नियमित करने के लिए जारी किए गए आदेश में याचिकाकर्ता के पद के स्तर को कम करना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। अदालत ने याद दिलाया कि सरकार ने आदेश दिया था कि उन्हें उसी पद पर नियमित किया जाए जिस पद पर वे काम कर रहे हैं। इसके अलावा, अदालत ने यह नतीजा निकाला है कि याचिकाकर्ता को अधिकारियों की पसंद के पद पर नियमित करना मुमकिन नहीं है।
अतिरिक्त अदालत महाधिवक्ता द्वारा मेमो फाइल करने असंतोष जताते हुए यह नतीजा निकाला है कि भविष्य में ऐसी चीज़ों की इजाज़त नहीं दी जाएगी और दिए गए आदेश को लागू किया जाना चाहिए। अदालत ने हर बार किसी न किसी वजह से आकर और आदेश को लागू किए बिना मेमो फाइल कर अदालत का समय बर्बाद करने की आलोचना की। न्यायाधीश ने सरकार के अधिवक्ता की एक हफ़्ते का समय देने के आग्रह पर सहमति जताई और स़ाफ किया कि कानून का गलत इस्तेमाल हर बार बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
10 अप्रैल तक के लिए टली अगली सुनवाई
आखिरी बार एक हफ़्ते का समय देते हुए कहा है कि इस बीच एक कंप्लायंस रिपोर्ट फाइल की जानी चाहिए, अन्यथा नीम्स के निदेशक को स्वयं हाजिर होकर स्पष्टीकरण देना होगा। इसके साथ ही मामले की अगली सुनवाई अगले महीने की 10 तारीख तक के लिए टाल दी गयी। गौरतलब है कि सिकंदराबाद के के. पापी रेड्डी समेत 29 लोगों ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसमें नीम्स के निदेशक द्वारा गत 3 सितंबर, 2021 को उन्हें दूसरे क्लास-4 कर्मचारियों के बराबर रेगुलर करने के उनके आग्रह को खारिज करने को चुनौती दी गयी थी।
इस याचिका पर सुनवाई करने वाले न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाकर्ता के आग्रह को को खारिज करने वाला जारी किया गया विवादित आदेश साफ तौर पर नामंज़ूर है। प्रतिवादियों को उनके रेगुलराइजेशन पर फिर से सोचने और उनकी सर्विस को सभी जरूरी बेनिफिट्स के साथ रेगुलर करने का आदेश जारी करने का निर्देश दिया गया, जो उनके एलिजिबल होने की तारीख से लागू होगा। याचिकाकर्ता ने जून, 2023 में एक अवमानना की याचिका दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि छह महीने बाद भी आदेश लागू नहीं किए जा रहे हैं और वे जानबूझकर लापरवाही कर रहे हैं।
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याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका जून 2023 में दायर की
उच्च न्यायालय की न्यायाधीश जस्टिस टी. माधवी देवी की खंडपीठ ने शुक्रवार को इस याचिका पर सुनवाई की। सरकार की ओर से दलील देते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि अदालत के आदेश के अनुसार, आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की सर्विस को रेगुलर करने के लिए 12 फरवरी को आदेश जारी किए गए थे। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने पहले जिन जॉब पोजीशन/पोजीशन पर काम किया है, उनकी एजुकेशनल क्वालिफिकेशन और उनकी अभी के वेतन का विवरण दिया गया है।
याचिकाकर्ता को हमेशा की तरह ही सैलरी दी जाएगी और अपनी जॉइनिंग रिपोर्ट जमा करने और सर्विस जॉइन करने के बाद उन्हें ज़रूरत के हिसाब से काम दिया जाएगा। उन्होंने इस बारे में एक मेमो भी जमा किया। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील देते हुए उन्होंने कहा कि अधिकारी स्किल्ड और अनस्किल्ड एम्प्लॉई के साथ एक जैसा बर्ताव कर रहे हैं।
स्किल्ड एम्प्लॉई को भी अनस्किल्ड एम्प्लॉई की तरह काम करने का आदेश दिया जा रहा है और उन्हें वही सैलरी दी जा रही है, जिससे कुछ लोगों के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर याचिकाकर्ताओं को सेमी-स्किल्ड वर्कर के तौर पर अपॉइंट किया गया है। वर्ष 1990 में नियुक्त हुई पद्मा देवी नाम की महिला का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वह अभी भी उसी पोस्ट पर काम कर रही हैं। दलीलें सुनने के बाद न्यायाधीश ने फैसला दिया कि याचिकाकर्ताओं का रेगुलराइजेशन उनके आदेश के मुताबिक किया जाना चाहिए। यह आदेश देते हुए कहा कि दिये गये आदेश का पालन किया गया है या नहीं इसकी एक हफ्ते के भीतर एक कंप्लायंस रिपोर्ट जमा की जाए। इसके साथ ही मामले की सुनवाई टाल दी गयी।
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