हाईकोर्ट ने दिया स्पष्टीकरण, नोटिस में हो कानून के प्रावधान का उल्लेख
हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि राजस्व अधिकारियों द्वारा जारी की गई कार्रवाई या नोटिस में यह निर्दिष्ट होना चाहिए कि किस कानून के प्रावधान के तहत ऐसी कार्रवाई या नोटिस जारी की गई है। अदालत ने यह भी कहा कि तहसीलदार और राजस्व अधिकारियों को उस कानून का भी उल्लेख करना होगा, जो उन्हें नोटिस जारी करने के लिए ऐसा अधिकार प्रदान करता है।
इस दलील के साथ तेलंगाना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस बी. विजयसेन रेड्डी ने मेडचल मलकाजगिरी ज़िले के अलवाल मंडल के तहसीलदार द्वारा जारी प्रोसिडिंग को खारिज कर दिया। उन्होंने वर्ष 2019 के दौरान मेडचल मलकाजगिरी ज़िले के अलवाल गाँव और मंडल के तोला खरखाना की परिधि में आने वाली सर्वे नंबर 380 (पुराना सर्वे नंबर) स्थित 5.3 एकड़ भूमि को लेकर प्रोसिडिंग जारी की थी। न्यायाधीश ने बताया कि इस कार्रवाई में तहसीलदार के अधिकार क्षेत्र का उल्लेख नहीं किया गया है।
सर्वे नंबर 380 स्थित 5.3 एकड़ भूमि को सरकारी भूमि बताते हुए तहसीलदार द्वारा गत जून-2019 के दौरान दी गई प्रोसिडिंग को चुनौती दे हुए बुज्जी भानोत समेत 39 लोगों द्वारा दायर याचिकाओं पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस बी. विजयसेन रेड्डी ने सुनवाई कर अपना फैसला सुनाया। इस भूमि को लेकर राजस्व अधिकारियों और निजी पक्षों के बीच विवाद चल रहा था। सर्वेक्षण विभाग ने इसे निजी भूमि के रूप में स्पष्ट किया था।
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तहसीलदार की कार्रवाई पर अदालत की सख्ती
जब यह मामला न्यायालय में गया, तब न्यायालय ने तहसीलदार को निजी पक्षों को नोटिस जारी करने और उनके प्रस्तुतिकरण के आधार पर निर्णय लेने के निर्देश जारी किए थे। अलवाल के तहसीलदार द्वारा इस भूमि को सरकारी भूमि घोषित करते हुए की गई कार्रवाई को निजी पक्षों द्वारा अदालत में चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने दलील देते हुए बताया कि तहसीलदार द्वारा बिना अधिकार क्षेत्र से पारित की गई थी और यह नहीं बताया गया था कि कार्रवाई किस कानून के तहत की गई।
अदालत ने यह भी याद दिलाया कि तहसीलदार द्वारा अदालत के आदेश की गलत व्याख्या की गई थी। राजस्व विभाग की ओर से सरकारी अधिवक्ता कटराम मुरलीधर ने दलील देते हुए बताया कि बताया कि आबादी के रूप में दर्ज भूमि को सरकारी भूमि माना जाना चाहिए और तर्क दिया कि कार्रवाई राजस्व अधिनियम 1869 के तहत जारी की गई। इसीलिए कार्रवाई प्रभावित नहीं होगी। चूँकि तहसीलदार न्यायालय को यह समझाने में असमर्थ रहे कि किस कानून के तहत यह कार्रवाई की गई थी। इस कारण न्यायाधीश ने तहसीलदार द्वारा की गई कार्रवाई को रद्द करते हुए अपना फैसला सुनाया।
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