शहरों की बढ़ती जनसंख्या ने जीवन को खौफनाक बना दिया है

11 जुलाई – विश्व जनसंख्या दिवस

भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने जिंदगी के लिए आर्थिक अवसर तो पैदा किए हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि जीवन की क्वालिटी बिल्कुल गिर गई है। अगर और साफ शब्दों में कहें तो बढ़ते शहरीकरण ने शहरी जीवन को नरक बना दिया है। ये पूरी दुनिया की समस्या नहीं है। ये भारत और भारत जैसे दूसरे विकासशील देशों की ही समस्या है, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप में बांग्लादेश और पाकिस्तान भी शामिल है।

आजादी के बाद देश में तेजी से शहरीकरण बढ़ा है और इस दौरान शहर देश के आर्थिक अवसरों का केंद्र बनकर भी उभरे हैं। लेकिन भारत में शहरों की तरफ गांवों से बहुत तेज पलायन हुआ है, जिसने शहरों में जीवन जीने की स्थितियों को बहुत गहरे तक प्रभावित किया है। नागरिक सुविधाओं का देश के हर शहर में अभाव है। चाहे मुंबई हो, दिल्ली हो, बैंगलुरु हो या हैदराबाद। देश और दुनिया के ये बड़े-बड़े शहर आज बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के गढ़ तो हैं, लेकिन इन बड़े शहरों में बहुसंख्यक लोग भीषण परेशानियों के बीच रह रहे हैं। आइये इस जनसंख्या दिवस पर सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं कि शहरों में बढ़ी जनसंख्या के कारण किस तरह की परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है-

अनियोजित शहरीकरण

भारत में सन् 80 के दशक से इतना तेज शहरीकरण हुआ है कि देश का कोई भी शहर अपनी बढ़ने वाली जनसंख्या को ध्यान में रखकर नगर नियोजन का काम नहीं कर पा रहा। हर शहर अगले 10 सालों तक जितनी जनसंख्या का अनुमान लगाकर चलता है, जनसंख्या हमेशा उससे दो से तीन गुना ज्यादा बढ़ जाती है। यही कारण है कि भारत के सभी बड़े शहर अनियोजित शहरीकरण की समस्या से जूझ रहे हैं। यहां तक कि कानपुर, लुधियाना, भोपाल, अमृतसर, कोल्हापुर और राजकोट जैसे मझौले शहर भी जनसंख्या के दबाव से इस कदर चरमरा गये हैं कि इनकी आधारभूत संरचना के मुकाबले कई गुना ज्यादा इन पर जनसंख्या का दबाव है। दिल्ली, मुंबई और बैंगलुरु जैसे महानगर लाख प्रयासों के बावजूद पिछले कई दशकों में अपने शहर की झुग्गी-बस्तियां नहीं खत्म कर सके और न ही इन झुग्गी-बस्तियों को साफ पानी, सीवर या बिजली की सुविधा ही दे सके हैं।

बढ़ते ट्रैफिक से थमे शहर

आवास और बिजली पानी की समस्या तो है ही, इनके साथ ही ये सभी शहर आज जिस सबसे बड़ी समस्या से जूझ रहे हैं, वह है-सड़कों पर वाहनों की बेतहाशा वृद्धि। बैंगलुरु और मुंबई जैसे शहर तो सचमुच आज अंधाधुंध बढ़े वाहनों के कारण थम से गये हैं। बैंगलुरु में पीक आवर्स में सड़कों में यातायात बिल्कुल रेंगता है। 10 किलोमीटर की दूरी अकसर लोग कार से डेढ़ से दो घंटे में तय कर पाते हैं।

बैंगलुरु शहर तो आजकल सिलिकॉन वैली से ज्यादा अपने भारी ट्रैफिक के लिए मशहूर हो रहा है। जहां तक बात देश की वित्तीय राजधानी मुंबई की है तो यहां तो 80 के दशक से ही लोगों ने यह स्वीकार कर लिया था कि पीक आवर्स में कहीं पर समय से पहुंच पाना संभव नहीं है। यही कारण है कि मुंबई में मध्यवर्ग ही नहीं उच्चवर्ग भी एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए लोकल ट्रेन का इस्तेमाल करता है।

मुंबई में पीक आवर्स में सड़क यातायात की रफ्तार 5 से 10 किलोमीटर प्रतिघंटा होती है और अगर एक बार आप जाम में फंस जाएं तो कोई उपाय नहीं है कि उससे निकल सकें। इन दोनों शहरों में तो एम्बुलेंस के लिए भी सड़कों में जगह बनानी अब बहुत मुश्किल हो गया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी सभी शहर भारी वाहनों की समस्या से परेशान नहीं हैं। कमोबेश सभी शहरों का यही हाल है। यही वजह है कि आज हर एक घंटे में भारत के सिर्फ शहरों में ही 150 से लेकर 180 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मर रहे हैं।

घर नहीं ये दड़बों के शहर हैं

यूं तो हर शहर में कुछ चमचमाती हुई गगनचुंबी इमारतें होती हैं। कुछ हैसियत का झंडा बुलंद करते बड़े-बड़े बंगले हैं। लेकिन शहरों के 70 से 75 फीसदी हिस्से घरों नहीं, छोटे-छोटे दड़बों का जंगल हैं। मध्यम और निम्न वर्ग के लिए सस्ते घरों में गरिमामय आवास की कल्पना नहीं की जा सकती। मुंबई में तो 250 से 300 फीट के एक कमरे वाले फ्लैट भी हैसियत का जरिया हैं। उनके भी विज्ञापन बड़े-बड़े अखबारों के चिकने पेजों में आते हैं, क्योंकि ये छोटे-छोटे दड़बे भी 50 से 60 लाख रुपये के होते हैं।

भारत के सभी बड़े शहरों में प्राइवेट फ्लैट और कालोनियों की भरमार है, जहां रहने के लिए आवास को गरिमामय बनाने का कोई मापदंड नहीं है। यहां झुग्गियां, किराये के लिए मकान और अनधिकृत कालोनियों की अंतहीन श्रृंखलाएं हैं। जहां लोगों को न तो भावनात्मक सुरक्षा है और न ही मनोवैज्ञानिक निजता। देश के बड़े शहरों में बढ़ती जनसंख्या के कारण आवास एक खौफनाक अनुभव बन गया है।

नागरिक सुविधाओं का अभाव और पर्यावरण संकट

देश में बड़े शहर तेजी से फैल रहे हैं, जहां स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, कचरा प्रबंधन, सीवर और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं हर किसी के लिए नहीं हैं। सिर्फ कुछ लोगों के लिए ही हैं। शहरों की कुछ कालोनियों में ही नियमित रूप से साफ पानी आता है, सड़कें सीधी और चौड़ी हैं, स्कूल, अस्पताल आदि की सुविधाएं हैं, कचरे और सीवर का उच्च प्रबंधन है। जबकि शहरों के बड़े हिस्से इन सुविधाओं से वंचित है। यही कारण है कि नागरिक सुविधाओं के नजरिये से देश के बड़े शहर बहुत बड़ी आबादी के लिए खौफ का कारण बन गये हैं।

इन शहरों का पर्यावरणीय संकट भी विकट है, क्योंकि शहरों में कामगारों की भारी मांग के कारण बेतरतीब कालोनियों का जो जंगल खड़ा हुआ है, वे जंगल में शहर के इर्द-गिर्द की हरियाली को लील गये हैं। पिछले दो दशकों में लाखों की तादाद में पेड़ काटे गये हैं। बस्तियों के बीच मौजूद तालाब, नाले आदि सब पाट दिए गए हैं। यही कारण है कि देश के बड़े शहर, वायु प्रदूषण, जल भराव, हीट वेव और घटते भू-जल स्तर की समस्याओं से दो चार हो रहे हैं।

जीवन की गुणवत्ता में गिरावट और तनाव

देश के शहरों में आम लोगों का जीवन जिंदगी की गुणवत्ता से जंग कर रहा है। बहुसंख्यक शहरी लोगों के जीवन में मजबूत सामाजिक संबंध नहीं रहे। समय और जगह की कमी है। मानसिक बीमारियों का रेला है और खालीपन व असुरक्षा का लगातार घेरा बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण लोगों के आम जीवन में जबर्दस्त सामाजिक तनाव और असमानता व्याप्त है। शहरों में अमीर, गरीब के बीच की खाईं लगातार गहरी होती जा रही है।

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जहां एक तरफ गेटेड सोसायटीज और एयरकंडीशंड मॉल्स हैं, तो दूसरी तरफ झुग्गी-झोपड़ियों का विशाल समुद्र, कचरे में खेलते बच्चे और फुटपाथ पर चल रही गाड़ियां देखना बहुत आम है। कुल मिलाकर भारत में पिछले चार दशकों में जनसंख्या का जो तेज शहरीकरण हुआ है, उसके कारण हमारे शहरों की नागरिक सुविधाएं चरमरा गई हैं और शायद ही अब कोई विद्वान कहे, नगर वसंते देवानाम।

-शैलेंद्र सिंह

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