रामायण-महाभारत की नारी-पात्रों का प्रेरणामयी जीवन

सनातनी धर्म-ग्रंथ रामायण-महाभारत में बताया गया है कि महिलाओं का अपमान करने वाला व्यक्ति कितना भी ताकतवर हो, वह बर्बाद हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः यानी जिन घरों में महिलाओं का सम्मान होता है, वहां सभी देवी-देवताओं का वास होता है। यहाँ उन खास महिलाओं की संक्षिप्त जानकारी।
अनसूइया
रामायण में राम, सीता और लक्ष्मण का वनवास काल चल रहा था। इस दौरान वे अत्रि मुनि के आश्रम में पहुंचे। वहाँ अत्रि मुनि की पत्नी अनसूइया ने सीता को स्त्री धर्म समझाया। अनसूइया को उनके सतीत्व की वजह से पूजनीय माना गया है। अनसूइया ने संदेश दिया है कि स्त्री अपने सतीत्व की शक्ति से पूजनीय बन सकती है।
सीता
रामायण में कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वर मांगे थे- एक, भरत को राज और दूसरा, राम को चौदह वर्ष का वनवास। वनवास सिर्फ राम को जाना था, लेकिन अपने पतिव्रत धर्म को निभाने के लिए देवी सीता ने भी वनवास जाने की इच्छा जताई। राम और कौशल्या ने सीता को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन सीता अपने पति का साथ देने की बात पर टिकी रहीं। देवी सीता ने संदेश दिया है कि मुश्किल समय में भी जीवन-साथी का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
उर्मिला
उर्मिला सीता की बहन थीं। उनका विवाह लक्ष्मण के साथ हुआ था। श्रीराम और सीता के साथ लक्ष्मण ने भी वनवास जाने का निर्णय लिया था। उर्मिला ने अपने पति लक्ष्मण की इच्छा का मान रखा और स्वयं पति के बिना चौदह वर्षों तक राजमहल में नियम-संयम के साथ रहीं। इसी त्याग की वजह से उर्मिला को पूजनीय माना गया है। उर्मिला ने संदेश दिया है कि जीवन-साथी की इच्छा का मान रखना चाहिए और उसके सही निर्णय में उसका साथ देना चाहिए।
मंदोदरी
मंदोदरी रावण की पत्नी थीं। वह हमेशा रावण की भलाई चाहती थीं। सीता-हरण के बाद मंदोदरी ने रावण को समझाने की बहुत कोशिश की। उसने कई बार रावण से कहा कि वह राम को उनकी सीता लौटा दें, लेकिन अहंकारी रावण ने मंदोदरी की बात नहीं मानी और उसका अंत हो गया। मंदोदरी और रावण के जीवन से सीख लेनी चाहिए कि जीवन-साथी की सही सलाह तुरंत मान लेनी चाहिए, वरना सब कुछ खत्म हो सकता है। जीवन-साथी अगर कोई गलती करता है, तो उसे समझाने की कोशिश करनी चाहिए।
शूर्पणखा
राम – लक्ष्मण को पंचवटी में देखकर शूर्पणखा उनकी सुंदरता पर मोहित हो गई। उसने बारी-बारी से राम और लक्ष्मण से विवाह करने की बात कही। दोनों ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो वह क्रोधित हो सीता को मारने के लिए दौड़ पड़ी। उस समय लक्ष्मण ने उसे रोकते हुए उसकी नाक और कान काट दिए। इस घटना से हमें यह सीख मिलती है कि दूसरों के रिश्तों और भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। किसी से गलत या अनैतिक रिश्ता बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए, वरना घर-परिवार और समाज में अपमानित होना पड़ सकता है।
द्रौपदी
महाभारत के महत्वपूर्ण पात्रों में से एक थीं-द्रौपदी। दुर्योधन के कहने पर हस्तिनापुर के भरे दरबार में दु:शासन ने द्रौपदी का चीर-हरण किया। इसी अपमान की वजह से कौरव-पांडव के बीच युद्ध हुआ। दुर्योधन-दु:शासन की गलती की सज़ा पूरे कौरव वंश को मिली। महाभारत का संदेश यह है कि महिलाओं का हर स्थिति में सम्मान करना चाहिए। महिलाओं का अपमान करने वाले लोग बर्बाद हो जाते हैं।
कुंती
महाभारत में महाराज पांडु की मृत्यु के बाद कुंती ने अभावों में रहते हुए भी पांचों पांडव पुत्रों को अच्छे संस्कार दिए। धर्म-अधर्म का ज्ञान दिया। कुंती के संस्कारों की वजह से सभी पांडव हमेशा धर्म के मार्ग पर चले। श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त की। जो लोग धर्म के अनुसार काम करते हैं, उन्हें ईश्वर की कृपा जरूर मिलती है। माता के अच्छे संस्कार ही संतान का जीवन सफल बनाते हैं।
गांधारी
धृतराष्ट्र की पत्नी और दुर्योधन की माता गांधारी ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। दृष्टिहीन धृतराष्ट्र और गांधारी की आंखों पर बंधी पट्टी इस बात का प्रतीक है कि जब माता-पिता अपनी संतान के बुरे कर्मों पर ध्यान नहीं देते हैं, तब सब कुछ बर्बाद हो जाता है। इन दोनों को अपने पुत्र दुर्योधन के गलत काम दिखाई नहीं दिए। उन्होंने दुर्योधन की हर गलती को नजरअंदाज किया। जो माता-पिता संतान के मोह में आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं, बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं देते हैं, उनकी संतान गलत रास्ते पर चली जाती है।
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