संविधान की प्रस्तावना माता-पिता जैसी, उसे बदला नहीं जा सकता: उप राष्ट्रपति

उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को कहा कि “संविधान की प्रस्तावना को लेकर कई मुद्दे उठे हैं। भारतीय संविधान की प्रस्तावना बच्चों के लिए माता-पिता जैसी होती है। चाहे कितनी भी कोशिश करो, अपने माता-पिता की भूमिका को नहीं बदल सकते। यह संभव नहीं है।”

कोच्चि के नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडवांस्ड लीगल स्टडीज में छात्रों और फैकल्टी के साथ बातचीत करते हुए धनखड़ ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से किसी भी देश का ‘प्रीएम्बल’ (प्रस्तावना) कभी बदला नहीं गया, लेकिन उन्होंने यह दुख जताया कि भारतीय संविधान का प्रीएम्बल आपातकाल के दौरान बदला गया था। उन्होंने कहा, “हमारे संविधान का प्रीएम्बल उस समय बदला गया था जब सैकड़ों और हजारों लोग जेल में थे, आपातकाल काल हमारे लोकतंत्र का सबसे अंधकारमय काल था।”

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यह बयान उस समय आया है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने संविधान के प्रस्तावना में मौजूद ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्दों की समीक्षा करने की मांग की है, यह कहते हुए कि ये शब्द आपातकाल के दौरान शामिल किए गए थे और बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर द्वारा तैयार संविधान का हिस्सा कभी नहीं थे।

26 जून को नई दिल्ली में आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने कहा था, “बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान के प्रीएम्बल में ये शब्द कभी उपयोग में नहीं लाए। ये शब्द आपातकाल के दौरान जोड़े गए, जब मूलभूत अधिकार निलंबित थे, संसद काम नहीं कर रही थी और न्यायपालिका निष्प्रभ थी।”

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