भारत छोड़ने की दौड़ : यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है!
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए यह खबर बेहद चिंताजनक है कि हर साल लगभग दो लाख से अधिक भारतीय अपनी जन्मभूमि की नागरिकता छोड़कर विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। विदेश मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2011 से 2024 तक कुल 20 लाख 60 हजार से ज्यादा भारतीयों ने भारतीय नागरिकता का त्याग किया है। इनमें से आधे से ज्यादा तो महज पांच सालों – 2020 से 2024 – में यहां से गए हैं। 2024 में ही 2 लाख 6 हजार 378 लोगों ने यह कदम उठाया। यह ब्रेन ड्रेन का नया रूप है, जब नौजवान और पेशेवर लोग बेहतर जिंदगी की तलाश में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को अपना नया ठिकाना बना रहे हैं।
सयानों की मानें तो इस पलायन का सबसे बड़ा कारण आर्थिक असमानता और अवसरों की कमी है! भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, लेकिन नौकरियों का संकट, भ्रष्टाचार और असुरक्षित कार्य वातावरण युवाओं को निराश कर रहा है। आईआईटी, आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से निकलने वाले टैलेंटेड इंजीनियर, डॉक्टर और वैज्ञानिक विदेशों में दुगुनी-तिगुनी तनख्वाह और बेहतर रिसर्च सुविधाओं की चमक से आकर्षित हो जाते हैं। इसके अलावा, शिक्षा भी बड़ी वजह है।
मिलियनेयर्स का पलायन: पासपोर्ट प्रिविलेज से गोल्डन वीजा तक
माता-पिता अपने बच्चों को विदेशी यूनिवर्सिटियों में भेजते हैं और वहाँ की डिग्री पाने के बाद वापसी मुश्किल हो जाती है। कोविड महामारी ने इस आग में घी डाला। लॉकडाउन और आर्थिक मंदी ने घरेलू नौकरियों को चोट पहुँचाई, जबकि विदेशों में रिमोट वर्क और हाई-पेइंग जॉब्स ने लालच जगाया।
गौरतलब है कि अब यह प्रवासन सिर्फ निचले या मध्यम वर्ग तक सीमित नहीं रहा है। पहले जहाँ भारत से बाहर जाने वालों में गिरमिटिया मजदूरों से लेकर डॉक्टर-इंजीनियर जैसे पेशेवर शामिल थे, अब भारतीय प्रवासन की इस नई लहर में अमीर वर्ग और ज्यादा कमाई करने वाले हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (एचएनआई) की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सही ही इसे सफल लोगों का अलगाव कहा जा रहा है।
2025 में अकेले 3,500 मिलियनेयर्स भारत छोड़ने वाले हैं, जो वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा आउटफ्लो है। ये लोग पासपोर्ट प्रिविलेज, सुरक्षा, स्वच्छ वातावरण और कम सरकारी हस्तक्षेप की चाह में दुबई, सिंगापुर या यूरोपीय देशों की ओर रुख कर रहे हैं। यह भी कि ये एचएनआई अपनी संपत्ति का एक चौथाई हिस्सा विदेशी रियल एस्टेट और गोल्डन वीजा में लगा रहे हैं। यह लहर नई पीढ़ी के धनाढ्यों की है, जिनके बच्चों को विदेशी बोर्डिंग स्कूलों से लेकर स्टार्टअप फंडिंग तक सब कुछ मिला है, लेकिन वे भारत की जटिलताओं से तंग आ चुके हैं!
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ब्रेन ड्रेन से वेल्थ ड्रेन तक: भारत को हो रहा भारी नुकसान
सामाजिक मोर्चे पर बात करें तो प्रदूषण, असुरक्षा और सामाजिक दबाव भी कम नहीं हैं। दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में साँस लेना मुश्किल हो गया है। महिलाओं के लिए सुरक्षा का सवाल तो और भी गंभीर है। हर शाम की चिंता, रात की फिक्र ! राजनीतिक अस्थिरता, सांप्रदायिक तनाव और जातिगत भेदभाव भी कुछ लोगों को दूर भागने पर मजबूर कर देते हैं। कुल मिलाकर, एक पलायन की संस्कृति बन रही है, जिसमें सफलता का मतलब भारत छोड़ना हो गया है।
इसके परिणाम भयावह हैं। सबसे पहले, यह ब्रेन ड्रेन से आगे वेल्थ ड्रेन का रूप ले चुका है। देश की बौद्धिक और आर्थिक पूँजीगत हानि हो रही है। भारत को हर साल अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है। क्योंकि ये पलायनकारी रेमिटेंस तो भेजते हैं, लेकिन टैक्स, इनोवेशन और लीडरशिप यहाँ नहीं देते। एचएनआई के पलायन से तो निवेश का स्रोत सूख रहा है – 26 अरब डॉलर का आउटफ्लो सालाना! इसके अलावा, परिवार टूट रहे हैं। बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं।
बच्चे संस्कृति से कट जाते हैं। भारत की विविधता कमजोर हो रही है। नई पीढ़ी ग्लोबल सिटिजन बनकर अपनी जड़ों से दूर हो रही है! लंबे समय में, यह संकट पैदा होगा कि काम करने वाली उम्र के लोग घटेंगे, बुजुर्ग आबादी बढ़ेगी। मानना होगा कि पलायन की यह प्रवृत्ति भारत के लिए एक चुनौती है। अगर हम अपने युवाओं और सफल लोगों को यहीं अवसर दें, सम्मान दें, तो वे कहीं नहीं जाएँगे। काश, कभी ऐसा हो!
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