आसमान की उदासी
आसमान…कभी वो खुला हुआ नीला कैनवास था जहां इंसानी कल्पनाओं की उड़ानें और राइट बंधुओं के सपने आकार लेते थे। सुबह की सुनहरी धूप में चिड़ियों का चहचहाना, पतंगों का इठलाना और हवाई जहाज का बादलों को चीरते हुए आगे बढ़ना। आकाश के वक्ष पर सतरंगी इंद्रधनुष को निहारना, कागज के हवाई जहाज उड़ाना और आकाश के तारे गिनना कितना आम हुआ करता था।
अब तो आसमान की कहानी कुछ और ही है। अब वो सिर्फ बमों, मिसाइलों और ड्रोन के लिए रह गया है। जहाँ कभी उम्मीदों के पंख फड़फड़ाते थे, वहाँ अब विनाश का साया मंडराता है। लगता है जैसे आसमान ने भी अपनी नीली चादर ओढ़कर सिसकना शुरू कर दिया है। जिस आसमान ने हमें आजादी और विस्तार की कल्पना दी, वही अब युद्ध और आतंक का साक्षी बन रहा है।
परिंदे आज भी उड़ते हैं, लेकिन शायद वो भी डरते होंगे कि कहीं कोई मिसाइल उनके रास्ते में न आ जाए और हवाई जहाज? वो अब सिर्फ यात्री नहीं ढोते, बल्कि अक्सर युद्ध के मैदानों में मौत का सामान भी पहुँचाते हैं। लगता है इंसानी तरक्की ने आसमान का रंग नीला नहीं, बल्कि काला कर दिया है। उस धुएँ से जो मिसाइलों के पीछे छूटता है, उन विस्फोटों से जो उसके सीने पर घाव करते हैं।
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आसमान अब शांति का नहीं, शक्ति का मैदान
रडार की नजरों में कैद, ड्रोन की भनभनाहट से घायल और मिसाइलों की आवाज से थरथराता हुआ बेचारा अम्बर। कभी आकाश, कल्पनाओं का चित्र-पट था। आज उसी नीलांबर पर अग्नि, प्रलय, ब्रह्मोस और बैलिस्टिक का साया मंडराता है। कभी हम एक गीत गाते थे- नीले गगन के तले धरती का प्यार पले। ऐसे ही नभ में होती है सुबह ऐसे ही शाम ढले। नन्हे बच्चों की उंगली सांझ को आसमान की ओर उठती थी और दादी कहती थी- बेटा, देखो! चंदा मामा बैठे हैं।
आसमान अब शांति का नहीं, शक्ति का मैदान है। आसमान में उड़ते परिंदे नहीं, ड्रोन हैं जिनका पेट बारूद से भरा है और दिमाग किसी एआई सिस्टम से संचालित है। बड़े-बड़े देश शांति वार्ता के नाम पर दुनिया के मंचों से कुटिल मुस्कानें और कूटनीतिक झूठ परोस रहे हैं। वह दिन दूर नहीं, जब आसमान से सिर्फ राख गिरेगी क्योंकि जहाँ कभी परिंदे गीत सुनाते थे, आज वहाँ बमों की गूंज में इंसानियत सहमी है।
काश, आसमान फिर से पंछियों की उड़ान, सपनों के पंख और सुकून भरी साँसों के लिए बन जाये वरना लोगों के हाथों के तोते उड़ जायेंगे। इसके बाद तो इंसान के पछताने से भी कुछ नहीं होगा क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। समय रहते इंसान चेत जाए, अपनी इस तरक्की व विकास का गलत इस्तेमाल न करे तो ही इंसान के साथ इंसानियत भी बच जाएगी वरना तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा। एक बर की बात है, नत्थू की टांट पै एक कबूतर नैं बीट कर दी। वो हाथ तै पोंछते होये बोल्या- शुक्र है राम जी का अक म्हैंस नै उड़ना नी आता।
–शमीम शर्मा
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