होली के त्यौहार में उद्धार का रहस्य
विविधता में एकता भारत की विशेषता है। होली का त्यौहार भी हमें विविध रूपों और रंगों के पीछे छुपी एक मात्र चेतना को पहचानने का संकेत देता है। इस त्यौहार के तीन मुख्य बिंदु हैं- पहला पूर्णिमा की रात को होलिका-दहन, अगले दिन रंग खेलना और तीसरा मिठाइयां बांटकर गले मिलना या होली मिलन। यह त्यौहार हर वर्ष वसंत ऋतु में आता है। प्रकृति संकेत देती है कि हमें भी रंग-बिरंगे पुष्पों की तरह जीवन में झूमना है, नाचना है, गाना है और अपनी सुगंध को चारों ओर फैलाना है।
फागुन मास की पूर्णिमा की रात को स्थूल रूप से होलिका-दहन किया जाता है। पूर्णिमा को हमारा मन अधिक सक्रिय होता है। इसका लाभ लेते हुए हमें भौतिक रूप से होलिका-दहन में भाग लेने का अवसर मिले या ना मिले, लेकिन सूक्ष्म रूप से हम जहां हों, वहीं पर होली की पूर्णिमा का विशेष लाभ ले सकते हैं। हमारा पूरा जीवन मन से ही संचालित होता है। इस दिन अगर हम अपने मन में जमा अहंकार, क्रोध, प्रतिशोध, ईर्ष्या, द्वेष, दुश्मनी, नकारात्मकता, तनाव, रोग, शोक आदि को आंख बंद करके कल्पना द्वारा होलिका-दहन में डालकर भस्म कर देते हैं तो तुरंत भीतर और बाहर से बदल जाते हैं।
प्रेम, क्षमा और करुणा के सात रंगों से मनाएं सच्ची होली
इसीलिए होलिका-दहन के बाद एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं। होलिका-दहन के अगले दिन रंगोत्सव या होली खेली जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य अपने रिश्तेदारों, मित्रों और लोगों के प्रति अपने मन में बनी पूर्व धारणाओं को मिटाकर हर एक को उनके नए रूप और रंग में देखें। इसका रहस्य यह है कि जिस प्रकार हमारे शरीर में पुरानी कोशिकाएं मिट कर नई बनती रहती हैं, लेकिन हमें दिखाई नहीं देतीं, उसी प्रकार मनुष्यों की भावनाएं भी बदलती रहती हैं। इसीलिए हमें किसी के पुराने व्यवहार के अनुसार व्यवहार नहीं करना चाहिए। इस वर्ष होली पर आप सबसे पक्के रंग अपने मन में घोलें।
प्रशंसा, प्रसन्नता, प्रेम, क्षमा, करुणा, आभार और स्वीकार के सात रंग आप एकदम तैयार रखें, जिससे भी मिलें उन्हें इन रंगों की बौछार से भिगो दें। बाहरी रंग और गुलाल धीरे-धीरे फीके पड़ जाते हैं, लेकिन निस्वार्थ प्यार की छाप अमिट रहती है। इन रंगों की चमक इतनी मनमोहक है कि जो लगाता है, वह भी चमकता है और जिसे हम लगाते हैं, वह भी दमकने लगता है। ये रंग इतने दिव्य हैं कि आप जितना इनका उपयोग करते हैं, परमात्मा आपके मन में उतने रंग भरता जाता है।
मीठी वाणी और सकारात्मक व्यवहार ही सच्ची होली की मिठाई
विशेष बात यह है कि बाजार में बिकने वाले रंगों की तरह ये रंग किसी को नुकसान नहीं पहुंचते बल्कि इन रंगों के प्रयोग से सभी का कल्याण निश्चित रूप से होता है। अब बारी आती है मिठाइयों की और होली मिलन की। परमात्मा ने हम सबको सद् व्यवहार और सद्भाव की इतनी सारी सुगंधित मिठाइयां दी हैं कि हम बिना किसी संकोच के खुले मन से सभी को इनका स्वाद चखा कर मुंह मीठा करा सकते हैं।
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हमारी सरलता, सहजता, सकारात्मकता और समर्पण की मिठाई सबको बहुत पसंद आती है और उनका मन आनंद से तृप्त हो जाता है। यह दिव्य मिठाई बाजार में नहीं मिलती केवल संत, गुरु या ज्ञानी की शरण में ही मिलती है। भले ही आप किसी से गले मिलें या न मिलें, लेकिन मन में सबके प्रति सम्मान का भाव रखकर व्यवहार करें, क्योंकि हर जीव परमात्मा का अंश है। आपकी मीठी बोली होली की मिठाई है और आपका सद् व्यवहार होली का पुरस्कार, इसी से होगा आपका उद्धार। इस वर्ष इस नए दृष्टिकोण से होली का त्योहार मनाकर नए रूप और रंग अपनाकर अपना उद्धार करें।
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