‘ग़ुलामी’ का सच : तल्ख़ी बनाम मर्यादा

हाल ही में कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी ने एक चुनावी सभा में यह आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को अमेरिका और इजराइल का ग़ुलाम बना दिया है! यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में ईरान, इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा हुआ है और उसके असर के रूप में वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव से भारत भी प्रभावित हो रहा है। साथ ही, देश के पाँच राज्यों – पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी – में विधानसभा चुनावों का माहौल भी गरम है। ऐसे में यह टिप्पणी केवल विदेश नीति पर नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति और राजनीतिक भाषा – दोनों पर सवाल खड़े करती है।

सबसे पहले, बयान की पृष्ठभूमि और समय पर ग़ौर करना जरूरी है। चुनावी दौर में राष्ट्रीय मुद्दों को राज्य चुनावों में लाना एक आम रणनीति है। विपक्ष अक्सर सत्तारूढ़ नेतृत्व की छवि को चुनौती देने के लिए विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक संबंधों जैसे विषयों को उठाता है। ग़ुलामी जैसा आरोप इसी कोशिश का हिस्सा है। सरकार के मजबूत राष्ट्र के दावे के सामने निर्भरता का नैरेटिव खड़ा करने का सोचा-समझा दांव! विशेषकर ऐसे राज्य पश्चिम एशिया के घटनाक्रम को लेकर कुछ ज़्यादा और जल्दी संवेदनशील हो सकते हैं, जिनका खाड़ी देशों से आर्थिक या सामाजिक जुड़ाव अधिक है।

भारत की विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता का सिद्धांत

तथ्यात्मक दृष्टि से देखें तो भारत की विदेश नीति को ग़ुलामी कहना अतिशयोक्तिपूर्ण जुमलेबाज़ी अधिक प्रतीत होता है। भारत लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर चलता आया है। वर्तमान सरकार ने अमेरिका और इजराइल के साथ सहयोग बढ़ाया है, पर साथ ही रूस और ईरान जैसे देशों के साथ भी रिश्ते बनाए रखे हैं। वैश्विक संकटों के बीच भारत आमतौर पर संतुलित रुख अपनाता है। न तो किसी एक धड़े में पूरी तरह शामिल होता है, न ही अपने हितों से समझौता करता है। ऐसे में जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों को एकरेखीय आरोप में समेट देना वास्तविकता का अति सरलीकरण नहीं है तो और क्या है?

इसमें संदेह नहीं कि पश्चिम एशिया के तनाव का असर भारत पर पड़ता है। खासतौर पर ऊर्जा कीमतों और महंगाई के रूप में। चुनावी राजनीति में इन प्रभावों को सरकार की नीतियों से जोड़ना विपक्ष का स्वाभाविक प्रयास होता है। लेकिन यह मान लेना कि यह संकट केवल भारत की विदेश नीति का परिणाम है, वस्तुस्थिति के साथ न्याय नहीं करता। यह संघर्ष दशकों पुरानी ऐसी जटिलताओं का नतीजा है, जिन पर किसी एक देश का नियंत्रण नहीं।

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राजनीतिक भाषा में मर्यादा की अहमियत

इस पूरे प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू भाषा की मर्यादा भी है। ग़ुलाम जैसा शब्द न केवल आक्रामक है, बल्कि ऐतिहासिक और भावनात्मक रूप से भी अत्यंत भारी है। यह किसी सरकार की नीतियों की आलोचना से आगे बढ़कर उसकी स्वायत्तता और राष्ट्रीय सम्मान पर सीधा प्रहार करता है। लोकतंत्र में तीखी आलोचना आवश्यक है, लेकिन जब भाषा मर्यादा की सीमा लांघने लगती है, तो बहस का स्तर गिरता है और मुद्दों की गंभीरता पीछे छूट जाती है।

चुनावी माहौल में भाषा का तापमान बढ़ना स्वाभाविक है, परंतु यही वह समय भी होता है जब संयम सबसे अधिक अपेक्षित होता है। शीर्ष नेताओं की भाषा राजनीतिक संस्कृति को दिशा देती है। यदि संवाद का स्तर लगातार आक्रामक और व्यक्तिगत होता जाएगा, तो स्वस्थ बहस की जगह कटुता और तल्ख़ी ले लेगी। निष्कर्षत, कांग्रेस नेत्री का यह बयान राजनीतिक रूप से प्रभावी और ध्यान आकर्षित करने वाला ज़रूर है, लेकिन इसमें तथ्यात्मकता की कमी और भाषा की अतिशयता दोनों झलकती हैं। भारत की विदेश नीति की आलोचना पूरी तरह वैध है और होनी भी चाहिए, परंतु वह जितनी तथ्य-आधारित और संयमित होगी, उतनी ही प्रभावी भी। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि असहमति मुखर हो, पर मर्यादित भी।

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