अन्नदान और दूसरों की भलाई से बढ़कर कोई पुण्य नहीं : चन्द्रप्रभजी
हैदराबाद अन्नदान और दूसरों की भलाई से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है। दूसरों के दिल को ठेस पहुँचाने से बढ़कर कोई पाप नहीं है। जैसे फूल का धर्म है खिलना, काँटे का धर्म है चुभना, पानी का धर्म है शीतलता और अग्नि का धर्म है उष्ठता, ठीक वैसे ही इंसान सोचे कि आखिर उसका धर्म क्या है। मंदिर जाना, पूजा-पाठ करना, माला फेरना, सामायिक करना शास्त्रां का धर्म है, पर हम इंसान हैं, इसलिए पहले इंसानियम का धर्म अपनाएँ और इंसान होकर इंसान के काम आएँ। अगर कोई मंदिर में एक ओर लाखों को चढ़ावा बोलता है और दूसरी ओर द्वार पर आए भिखारी को धक्के मार के निकाल देता है, तो सोचो उसका धर्म ठीक है? उक्त उद्गार सिकंदराबाद स्थित जैन भवन में श्री राजस्थानी जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ द्वारा आयोजित प्रवचन के दौरान राष्ट्र संत चंद्रप्रभजी म.सा. ने व्यक्त किये।
संतश्री ने दूसरों की सेवा और दान का महत्व बताया
समिति के अध्यक्ष प्रदीप सुराणा एवं महामंत्री अशोक कुमार नाहर द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, संतश्री ने कहा कि जो औरों को देता है, वही देवता कहलाता है। जो गरीब और जरूरतमंद लोगों के काम आता है, उनकी सेवा करता है, भगवान उसकी झोली सदा भरते हैं। भगवान से प्रार्थना में धन-दौलत नहीं, वरन औरों के काम आने की सेवा माँगना, क्योंकि सेवा से मेवा अपने आप बरसने लग जाता है।
जिसके भीतर औरों का भला करने की भावना है, उससे अगर सौ गलतियाँ भी हो जाएँ, तो भगवान उसे माफ कर देते हैं। संतश्री ने कहा कि केवल बीबी-बच्चों तक ही सीमित न रहें, वरन दूसरों की मदद भी करें। जो दूसरों की मदद करेगा, वह जरूर आगे बढ़ेगा। भाग्य का निर्माण धर्म-कर्म से नहीं, मदद करने से होगा। संतश्री ने कहा कि जो अन्नदान करता है, उसका अन्न भंडार सदा भरा रहता है। व्यक्ति आतिथ्य सत्कार के लिए सदा तैयार रहे।
महिलाएँ चार मुट्ठी आटा ज्यादा भिगोए। चार रोटियों से आपको तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर जिसके पेट में अन्न जाएगा उसका बहुत भला होगा। व्यक्ति वस्त्र दान और औषधि दान करने की भावना रखे। घर में अनुपयोगी अथवा पुराने कपड़ों को देने में संकोच न करें। कोई गरीब बीमार हो जाए, तो उसे औषधि दिलाने का पुण्य कमाएँ। घर के बाहर मटकी भर के रख दें, छत पर कुंडी भर के रख दें, ताकि औरों की प्यास बुझाने का सौभाग्य मिल सके। आप जिस क्षेत्र में है उसमें श्रमदान करें।
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खुशी और त्याग पर जैन भवन विशेष प्रवचन 16 अक्तूबर
अभिनंदनचंद्रसागरजी म.सा. ने कहा कि यदि आप खुश रहना चाहते हैं, तो अपनी बेलगाम इच्छाओं को कम कीजिए। अपनी खुशियों को बाँटना सीखिए, दूसरों की विशेषताओं का सम्मान कीजिए और मौका पड़ने पर त्याग का आदर्श स्थापित कीजिए। हमेशा खुश रहिए, क्योंकि परेशान होने से कल की मुश्किल दूर नहीं होगी, बल्कि आज का सुकुन भी हाथ से चला जाएगा। खुशियों की अलग-अलग परिभाषाएँ हैं।
कोई देकर खुश होता है, तो कोई छीनकर, कोई धन पाकर खुश है, तो कोई त्याग कर। खुशियाँ केवल किस्मत का खेल नहीं, यह हमारी मनोदशाओं के आधार पर निर्मित होती हैं। खुशी के लिए लॉटरी जीतना, अच्छी नौकरी पाना या व्यवसाय में बढ़ोतरी होना जरूरी नहीं है, जीवन की खुशियाँ मुस्कान, सकारात्मक सोच और मानसिक शांति की पूँजी में है। डॉ. मुनिशांतिप्रियसागरजी म.सा. ने श्रद्धालुओं को नवकार महामंत्र और प्रभु प्रार्थना का सामूहिक उच्चारण करवाया। इससे पूर्व डी.वी. कॉलोनी स्थित संघवी मोतीलाल योगेश खरगांधी के निवास से म.सा. जैन भवन, सिकंदराबाद पहुँचे।
अवसर पर जैन भवन के अध्यक्ष योगेश खर गांधी और राजस्थानी जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के पदाधिकारियों ने सभी अभिनंदन किया। कार्यक्रम में लोक कल्याणकारी चातुर्मास समिति के प्रधान संयोजक नवरतनमल गुंदेचा, उमेश कुमार बागरेचा, कोषाध्यक्ष मानकचंद्र पोकरणा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष विमलचंद मुथा, अमित मुणोत, सुनील बांठिया उपस्थित थे।
ललितप्रभजी और चंद्रप्रभजी का विशेष प्रवचन और सत्संग गुरुवार, 16 अत्तूबर को श्री पार्श्व पद्मावती आराधना भवन, डी.वी. कॉलोनी, सिकंदराबाद में सुबह 9 से 11 बजे तक रहेगा।
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