कर्मफल से बचने का कोई शॉर्टकट नहीं

कहते हैं कि मनुष्य स्वयं अपने जीवन का वास्तुकार है। अतः यह कहना उचित होगा कि हम सभी ने अपने जीवन को अपनी पसंद अनुसार बनाया है, परंतु जब हमारे साथ कुछ गलत या अवांछित होता है, तो हम आत्म अवलोकन किए बिना तुरंत उसका दोष किसी के माथे मढ देते हैं। अमूमन लोग अपने जीवन में आने वाली विपदाओं एवं दुःखों के लिए दूसरों को कोसते रहते हैं और अंदर ही अंदर यह बड़बड़ाते रहते हैं कि ‘फ़लाने ने ऐसा नहीं किया होता तो आज हमारा यह हाल न होता।’

परंतु उस वक्त लोग इस सार्वभौमिक नियम को भूल जाते हैं कि ‘हर क्रिया की एक विपरीत और समान प्रतिक्रिया होती है। अतः खुद को देखने के बजाय हर वक्त हम सामने वाले को ठीक करने की जद्दोजहद में अपनी ऊर्जा जाया करते हैं। इसी प्रकार जब हमें दोष देने के लिए कोई व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ता तब हम बड़ी चतुराई से परिस्थिति को दोष देने लगते हैं, लेकिन ऐसा करने में हम यह भूल जाते हैं कि वर्तमान की हमारी परिस्थितियां अपनी ही पैदाइश हैं।

अतः ‘कर्म फिलॉसफी’ के मुताबिक जो कुछ भी हम आज अनुभव कर रहे हैं, वह हमारे भूतकाल में किये किसी कर्म या सोच का नतीजा हैं। इसलिए जब हमारे सामने अपने उस पूर्व कर्म के हिसाब को चुकता करने का मौका आता है तो हमें सहर्ष उसका लाभउठाकर खुद को बोझ मुक्त करना चाहिए, किंतु हम ऐसा नहीं करते हैं, क्यों? क्योंकि महसूस करने की लंबी प्रक्रिया से बचने के लिए और अपने आलसी स्वभाव से मजबूर अधिकांश दोष का ठिकरा किसी अन्य के माथे रख देते हैं।

दोषारोपण की प्रवृत्ति और आत्मचिंतन की कमी

विस्मय तो तब होता है, जब व्यक्ति या परिस्थिति के ऊपर दोष देने में नाकामयाबी हासिल होने पर निराश मनुष्यात्मा सर्वशक्तिमान परमात्मा को दोष देने की हद तक चली जाती है। ऐसा करने में मनुष्यों का तर्क यह होता है कि ‘दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है, वह सब ईश्वर की मर्जी से ही हो रहा है। इसलिए मेरी यह निजी दुर्दशा भी भगवान की इच्छा का ही नतीजा है।’ सुनने में काफी हास्यास्पद लगता है, पर वास्तव में हम सभी दिनभर इस प्रकार की बचकानी गतिविधियों में लिप्त रहते हैं।

हम जानबूझकर यह भूलने का ढोंग करते हैं कि हर इंसान अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर खुशी या सुख का अनुभव करता है। इसलिए यह कहना अनुचित होगा कि परमात्मा दुनिया में होने वाली हर अच्छी व बुरी घटना के लिए ज़िम्मेदार है। याद रहे! हम सभी मनुष्य-आत्मा कर्म के कानून के अंतर्गत अपने-अपने कर्म करती हैं और चाहा या अनचाहा फल प्राप्त करती हैं। इस प्रक्रिया में ईश्वर का कोई भी हस्तक्षेप नहीं होता।

साहस के साथ चुनौतियों का सामना

-राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज

हालांकि एक शिक्षक एवं मार्गदर्शक के रूप में वे हमें अच्छे कर्म करने की तालीम दे सकते हैं, किन्तु हमारी जगह आकर वे इम्तिहान नहीं दे सकते। इसलिए हमें बिना किसी को दोष दिए पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं ही जीवन के हर इम्तहान में उतीर्ण होकर आगे बढ़ना है। इन इम्तहानों में हम सफल हों या असफल, यह ज्यादा मायने नहीं रखता।

महत्वपूर्ण यह है कि हम किस साहस और ताकत के साथ उन्हें चुनौती के रूप में स्वीकार करके उनका सामना करते हैं। याद रहे! सर्वांगीण विकास देने की आदत के लिए दषि प्रमुख बाधाओं में से एक है, इसलिए जितना हो सके उतना इससे बचना अनिवार्य है अन्यथा हम कभी भी किसी क्षेत्र में आगे बढ़ नहीं पाएंगे।

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