वे भी तो मतदाता हैं : हिंदीभाषी हुए तो क्या!
यह ख़बर चौंकानेवाली तो है ही, चिंताजनक भी है कि हैदराबाद ज़िला चुनाव अधिकारी और जीएचएमसी आयुक्त ने हिंदी को तेलंगाना की राजभाषा न होने के कारण चुनाव की एक अनिवार्य प्रक्रिया से निष्कासित कर दिया है! उन्होंने कहा है कि चुनाव प्रत्याशियों को अपना आपराधिक रिकॉर्ड केवल अंग्रेजी, तेलुगु या उर्दू भाषा के समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर ही प्रकाशित या प्रसारित करना होगा। उनका यह फ़रमान न केवल हिंदी की संवैधानिक स्थिति की समझ पर सवाल उठाता है, बल्कि भाषाई एकता के सिद्धांत को भी चुनौती देता है।
ग़ौरतलब है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 343 स्पष्ट रूप से कहता है कि भारत संघ की राजभाषा, देवनागरी लिपि में लिखित, हिंदी होगी। साथ ही, अनुच्छेद 345 राज्यों को अपनी राजभाषा चुनने की स्वतंत्रता देता है। तेलंगाना के मामले में, तेलंगाना ऑफिशियल लैंग्वेजेस एक्ट, 1966 के अनुसार, तेलुगु और उर्दू राज्य की आधिकारिक भाषाएँ हैं। अंग्रेजी का उपयोग भी सरकारी कार्यों में होता है।
यहाँ यह याद दिलाना ज़रूरी है कि चुनाव आयोग एक अखिल भारतीय संस्था है, जिसकी राजभाषा हिंदी है। चुनाव अधिकारी आयोग के प्रतिनिधि होते हैं, न कि राज्य सरकार के। इसलिए, चुनावी प्रक्रिया में हिंदी को शामिल न करना अनुच्छेद 343 की अवहेलना है। यदि राज्य स्तर पर स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता दी जाती है, तो भी केंद्रीय दिशानिर्देशों के तहत हिंदी को वैकल्पिक रूप से अनुमति दी जानी चाहिए, खासकर जहाँ हिंदी बोलने वाली आबादी मौजूद हो।
हिंदी बहिष्कार संविधान और न्याय के विरुद्ध
विडंबना देखिए कि प्रवासी भारतीयों को अमेरिका में भारतीय भाषा बांग्ला में मतपत्र की सुविधा दी गई है और भारत के एक राज्य में चुनाव अधिकारी को हिंदी ग़ैर-ज़रूरी प्रतीत होती है! कानूनी दृष्टि से देखें तो भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) के दिशानिर्देशों में प्रत्याशियों के आपराधिक रिकॉर्ड की घोषणा के लिए क्षेत्र में व्यापक रूप से प्रसारित समाचार पत्रों और टीवी चैनलों का उल्लेख है।
इन दिशानिर्देशों में स्पष्ट रूप से भाषा की बाध्यता नहीं बताई गई है, बल्कि ज़ोर इस बात पर है कि जानकारी मतदाताओं तक पहुँचे। तेलंगाना में कई हिंदी समाचार पत्र और हिंदी चैनल व्यापक रूप से लोकप्रिय हैं। ऐसे में आयुक्त का बयान संविधान और आयोग दोनों की भावना का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह भाषाई भेदभाव को बढ़ावा देता है। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट भी उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि की पारदर्शी घोषणा पर ज़ोर देता रहा है; लेकिन किसी भी भाषाई प्रतिबंध के बिना!
यदि हिंदी में प्रकाशन से मतदाताओं का एक वर्ग लाभान्वित होता है, तो इसे अस्वीकार करना कानूनी रूप से असंगत है। ईसीआई को इस पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने चाहिए, ताकि भाषाई विविधता का सम्मान हो और राज्य के भाषाई अल्पसंख्यकों को न्याय मिल सके! दरअसल, यह केवल संवैधानिक और कानूनी मसला ही नहीं है, बल्कि इसका सांस्कृतिक पहलू भी बेहद अहम है।
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भाषाई भेदभाव से लोकतंत्र और एकता को खतरा
एक ओर तो हिंदी भारत की सबसे बड़ी भाषा है तथा दूसरी ओर तेलंगाना में लाखों हिंदीभाषी लोग रहते हैं, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और अन्य राज्यों से आए हैं। वे राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं, लेकिन भाषाई उपेक्षा उन्हें अलग-थलग कर सकती है। यहाँ चुनाव आयोग को ऐसी मिथ्या धारणा को प्रश्रय देने से बचना चाहिए कि हिंदी तो उत्तर की भाषा है! उन्हें समझना चाहिए कि चुनावी प्रक्रिया में हिंदी को शामिल करना सांस्कृतिक समावेशिता को मजबूत करेगा।
इतना ही नहीं, सियासी नज़रिये से भी यह फ़रमान क्षेत्रीयतावाद और राष्ट्रीय एकीकरण के बीच टकराव को हवा देने वाला है। हिंदी की उपेक्षा से ईसीआई जैसी राष्ट्रीय संस्था की स्वायत्तता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अतः ईसीआई से अपेक्षा की जाती है कि वह क्षेत्रीय सियासी दबाव से मुक्त रहकर संविधान-सम्मत भाषा नीति को लागू करे।
अंतत, इस भाषाई भेदभाव में सामाजिक न्याय की भी उपेक्षा निहित है। हिंदीतरभाषी राज्य में रहनेवाले हिंदीभाषी समुदाय में अक्सर प्रवासी मजदूर, व्यापारी या केंद्र सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कर्मचारी शामिल होते हैं, जो पहले से ही सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हैं। चुनावी जानकारी से उन्हें वंचित रखना उनके मताधिकार को प्रभावित करेगा। लोकतंत्र में पारदर्शिता सभी के लिए समान होनी चाहिए। उससे किसी राज्य के किसी विशेष भाषा समुदाय को वंचित रखना लोकतंत्र के लिए न तो श्रेयस्कर है; न स्वीकार्य! वैसे भी, समाज को भाषाई सद्भाव की ज़रूरत है, जहाँ सभी भाषाएँ सह-अस्तित्व में रहें!
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