मानवता का संदेश देते हैं ये रंग

होली का त्योहार समस्त भारत वर्ष में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी धूमधाम एवं श्रद्धा से मनाया जाता है। रंगों की मर्यादा में उत्साह भरे नज़ारे संतरंगी आभा बिखेरते हैं। यह त्योहार फाल्गुन की पूर्णिमा को मनाया जाता है। जगह-जगह रंग-अबीर-गुलाल की होली खेली जाती है। धरती का कण-कण होलीमय हो जाता है।

अगर ज़िंदगी में प्रकृति में भव्य रंगों का अस्तित्व न होता तो शायद सारी दुनिया, सारी ज़िंदगी निरर्थक होती। अलग-अलग रंगों की सुन्दर दृश्यावली ही प्राणियों के हृदय-दिमाग़ तथा शरीर के ऊपर गहरा प्रभाव छोड़ती है। रंगों में मोह, प्यार और स्नेह होता है। रंगों में ही भगवान बसते हैं। रंगों में ही दिव्यता होती है। रंग ही सुन्दरता के अर्थ बताते हुए, जन्नत के रास्ते खोजते हैं। सुन्दर दृश्य जन्नत का पर्याय हैं। रंगों का प्रभाव जिंदगी के प्रत्येक कार्य पर पड़ता है और यह प्रभाव परिणामपूर्वक होते हैं। रंगों की दिव्यता ही प्रकृति का नाम है। रंगों के समूह को ही कुदरत कहा जाता है।

आस्था, विश्वास और बुराई पर अच्छाई की जीत

आँखों में उतरते रंगों के प्रतिबिंब दिमाग, हृदय को ताजगी देते हैं। शान्ति प्रदान करते हैं। रंग तो कुरूप को भी सरूप बख्श देते हैं। खूबसूरती का चिह्न ही रंगों की परिभाषा है। दुनिया में जितनी भी खूबसूरत वस्तुएँ हैं, सब रंगों की अपेक्षा ही तो हैं। रंगों से ही सारा संसार सुन्दर लगता है। अच्छा लगता है। चाहे रंग संजीव हों या निर्जीव। रंग आकर्षण पैदा करते हैं। रंग प्यार-मुहब्बत उत्पन्न करते हैं। रंग मेल-मिलाप बढ़ाते हैं। प्रत्येक देश रंगों की पहचान से ही जाना जाता है। रंग देश का नेतृत्व करते हैं। रंग न होते तो जिंदगी के ढंग भी न होते।

हृदय-मस्तिष्क को रंग ही जँचते हैं, जिसके कारण मुनष्य अपनी अंदरूनी-बाहरी शक्ति को तौलता है। रंगों से ही तू और मैं का अस्तित्व है। रंगों से ही प्यार पनपता है। रंगों से ही उपलब्धियाँ, उपाधियाँ हैं। होली के त्योहार के साथ अनेक ऐतिहासिक, पौराणिक, प्रेरक, प्रसंग तथा दंतकथाएँ भी जुड़ी हुई हैं। विश्वासमत है कि एक समय की बात है, भारत वर्ष में एक हिरण्यकशिपु नाम का राक्षस राज्य करता था। उसका एक पुत्र प्रह्लाद था, जो भगवान में अथाह विश्वास रखता था। हिरण्यकशिपु भगवान को नहीं मानता था। वह अपने आपको स्वयं भगवान समझता था।

होलिका दहन: बुराई पर अच्छाई की जीत

वह अपने राज्य में भगवान का नाम नहीं अपना नाम जपने को कहता, परन्तु प्रह्लाद भगवान की कृपा में ही विश्वास रखता था। वह दिन-रात भगवान (ईश्वर) की पूजा करता जो उसके पिता का यह अच्छा न लगता। उसने प्रह्लाद को भगवान का नाम जपने से दूर किया। परन्तु प्रह्लाद टस से मस न हुआ तो उसने प्रह्लाद को पहाड़ से गिरा दिया। सर्पों के कमरे में बंद किया। हाथी से भी मरवाने की कोशिश की। परन्तु प्रह्लाद का कुछ न बिगाड़ सका। अन्त में हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने कहा ताकि प्रह्लाद भस्म हो जाए। होलिका को यह वरदान था कि उसे अग्नि नहीं जला सकती।

होलिका प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ गई। प्रह्लाद भगवान को याद करता रहा। आखिर अग्नि ने होलिका को भस्म कर दिया और प्रह्लाद का बाल भी बांका न हुआ। प्रह्लाद जीवंत रहा। उसी दिन से यह होलिका जलाई जाती है। भगवान अपने भक्तों की हर हाल रक्षा करता है। होली के दिन ढोल, नगाड़े, नृत्य-भंगड़े बाले जाते हैं। दुश्मन भी मित्र बन जाते हैं। रंगों की बरसात होती है। खुशी घर-घर नाचती है। इस दिन पूजा में अग्नि में जल रोली, मोली, चावल, फूल, प्रसाद, गुलाल, चंदन, नारियल आदि चढ़ाएँ जाते हैं। दीपक से आरती करके दंडवत होना शुभ माना जाता है।

होली पूजा में भक्त प्रह्लाद की प्रतीक लकड़ी का महत्व

फिर सबको रोली से तिलक लगाते हैं। तरह-तरह की मर्यादा से होली की पूजा की जाती है। होली में अग्नि लगाते ही उस डंडे या लकड़ी को बाहर निकाल देते हैं। इस लकड़ी को भक्त प्रह्लाद माना जाता है। इस दिन अच्छे-अच्छे पकवान, मिष्ठान्न भोजन, नमकीन, फल आदि का सेवन किया जाता है। होली का त्योहार श्री आनंदपुर साहिब (पंजाब) में भी धूमधाम एवं श्रद्धा से मनाया जाता है। खेल क्रियाएँ, घोड़-क्रियाएँ तथा भारी मेला लगता है।

लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। कई राजनीतिक पार्टियों के मंच भी लगते हैं। कथा-कीर्तन, शबद-गायन तथा भाषण भी होते हैं। सारा आनंदपुर होली से रंग जाता है। खालसा का दिव्य रूप देखने को मिलता है। फिर भी इस दिन कुछ लोग नशा करते हैं। जुआ खेलते हैं। फिल्मी लचर गाने लगाते हैं, जो बुरी बात है। समाज को गलत दिशा मिलती है। होली सद्भावना का त्योहार है। यह रंगों के माध्यम से मानवता का संदेश देता है।

-बलविन्दर बालम

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