अपने ही देश में घिर गए हैं ट्रंप
ट्रंप को राजनीतिक तौर पर ईरान युद्ध से जल्द से जल्द बाहर निकलने की जरूरत है। आखिर यह वही राष्ट्रपति हैं जिन्होंने अपने दूसरे शपथ ग्रहण भाषण के दौरान कहा था, हम अपनी सफलता को सिर्फ उन लड़ाइयों से नहीं मापेंगे जिन्हें हम जीतते हैं, बल्कि उन युद्धों से भी मापेंगे जिन्हें हम खत्म करते हैं। आज वे खुद ही अपनी शपथ का मखौल उड़ाते नजर आ रहे हैं।
जहां एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप एक ऐसे अलोकप्रिय युद्ध पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए हैं जिसका कोई स्पष्ट अंत नजर नहीं आ रहा, वहीं दूसरी तरफ उनकी अप्रूवल रेटिंग उस मुद्दे पर और भी ज्यादा खराब हो गई है जिसे मतदाता सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं – अर्थव्यवस्था। विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों के औसत के अनुसार उनकी जॉब अप्रूवल रेटिंग (काम करने की स्वीकृति दर) गिरकर 39 प्रतिशत रह गई है।
न्यूयॉर्क से लेकर लॉस एंजिल्स तक, और मिनेसोटा से लेकर टेक्सास तक – पूरे देश भर में तीन हजार से भी ज्यादा ट्रंप-विरोधी (एंटी-ट्रंप) रैलियां आयोजित की गईं, जिनमें लाखों लोगों ने हिस्सा लिया। यहां तक कि विदेशों में – पेरिस लंदन और पुर्तगाल के लिस्बन में भी – प्रवासी भारतीयों और अन्य लोगों ने रैलियां निकालीं। ट्रंप के प्रति विरोध की तीव्रता अब तक के किसी भी समय की तुलना में या तो उतनी ही अधिक है, या उससे भी ज्यादा है।
ट्रंप के प्रति असंतोष का स्तर फॉक्स सर्वे में 59% दर्ज
फॉक्स न्यूज के सर्वेक्षण में यह पाया गया कि ट्रंप के दोनों कार्यकालों के दौरान किए गए सभी सर्वेक्षणों में से इस बार उनके प्रति असंतोष का स्तर सबसे ऊंचा (59 प्रतिशत) रहा। इनमें से लगभग आधे लोगों ने तो यह भी कहा कि वे ट्रंप के काम से पूरी तरह से असहमत हैं। सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि 58 प्रतिशत लोग ईरान युद्ध का विरोध करते हैं। इस युद्ध ने ट्रंप के मुख्य समर्थकों और राजनीतिक सहयोगियों के बीच गहरी दरार पैदा कर दी है।
आलोचकों और शोधकर्ताओं ने ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के कार्यों को लोकतंत्र के पीछे हटने में योगदान देने वाला बताया है। ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष के बीच ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया है जिसने अमेरिकी लोकतंत्र की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिका के भीतर से ही यह आवाज उठने लगी है कि राष्ट्रपति मानसिक रूप से असंतुलित हैं और उनके फैसले देश को तबाही की ओर ले जा सकते हैं।
अमेरिकी सांसदों ने तो चेतावनी दी है कि ट्रंप की नर्क में जिओगे वाली धमकी और आक्रामक नीति अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए डेथ वारंट साबित हो सकती है। अमेरिकी कांग्रेस में अब इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि क्या राष्ट्रपति के युद्ध घोषित करने की शक्तियों पर तत्काल अंकुश लगाया जाना चाहिए ताकि एक और विश्व युद्ध की स्थिति को टाला जा सके। नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनाव नजदीक आने के साथ ही ट्रंप की राजनीतिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है।
कई देशों ने ट्रंप के वैश्विक फैसलों पर कम भरोसा जताया
वर्ष 2025 के प्यू रिसर्च सेंटर के एक अध्ययन के अनुसार, अमेरिकी नेतृत्व पर वैश्विक भरोसा बहुत तेजी से गिरा है और कई देशों ने वैश्विक मामलों में ट्रंप के नेतृत्व पर बहुत कम भरोसा जताया है। विश्व के ज्यादातर देशों का मानना है कि हम दो मनमानी करने वाले देशों का एक अशोभनीय तमाशा देख रहे हैं, जिनमें से हर एक के पास ढेर सारे परमाणु हथियार हैं और जो एक तीसरे मनमानी करने वाले देश को वैसे ही हथियार हासिल करने से रोकने के लिए युद्ध पर उतर आए हैं।
अगर यही नई विश्व व्यवस्था है, जहां मनमानी करने वाले देश अपनी अगली जीत या कब्जे के लिए अपनी मर्जी से चुनने के लिए आजाद हैं, तो यह निश्चित रूप से उन लोगों को भी हरी झंडी देती है जिनके दावे ज्यादा वैध हैं। जैसे ताइवान पर चीन का दावा, जिब्राल्टर पर स्पेन का और फॉकलैंड्स पर अर्जेंटीना का..। देखा जाए तो ईरान युद्ध कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था। खतरा आसन्न नहीं था, उद्देश्य स्पष्ट नहीं थे और बारीकी से जांच करने पर इसका कोई औचित्य भी नजर नहीं आता।
युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, उतना ही ट्रंप के सार्वजनिक समर्थन और नवंबर के मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन की संभावनाओं के लिए खतरा बनेगा। उन्होंने एक ऐसा युद्ध शुरू कर दिया है जिसके लिए उन्हें कोई जनादेश नहीं मिला था। हालांकि ट्रंप इस अभियान को समेटना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें इस बात की आशंका है कि यह लंबा खिंचने वाला संघर्ष मध्यावधि चुनावों से पहले रिपब्लिकन पार्टी की राह में रोड़े अटका सकता है।
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लड़ाई रोकने और राजनीतिक नुकसान कम करने का प्रयास
साथ ही, वे यह भी चाहते हैं कि यह सैन्य अभियान निर्णायक रूप से सफल हो। वे कोई ऐसा रास्ता खोज रहे हैं जिससे वे अपनी जीत की घोषणा कर सकें, लड़ाई रोक सकें और उम्मीद कर सकें कि राजनीतिक नुकसान के स्थायी होने से पहले ही आर्थिक हालात स्थिर हो जाएं। फिर भी संशय है कि ट्रंप उन बड़े लक्ष्यों को हासिल कर पाएंगे, जिनका उन्होंने जोर-शोर से प्रचार किया था।
जैसे कि तेहरान के परमाणु हथियार बनाने के रास्ते को हमेशा के लिए रोकना, उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्पाम को खत्म करना और इस्लामिक गणराज्य के कट्टरपंथी नेताओं की जगह एक ज्यादा मित्रवत शासन लाना। अंतिम परिणाम अभी भी अस्पष्ट है, क्योंकि ट्रंप कई बार एक ही समय पर लड़ाई को तेज करने और उसे खत्म करने दोनों का वादा कर रहे हैं। इधर इजरायली राष्ट्रपति नेतन्याहू और सऊदी क्राँउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस संघर्ष को लंबा खींचने के पक्ष में हैं, क्योंकि वे इसे एक साझा दुश्मन को कमजोर करने का एक दुर्लभ मौका मानते हैं। लेकिन वे ट्रंप पर अपनी निर्भरता को भी पहचानते हैं।
इजराइल में चुनाव नजदीक होने के कारण नेतन्याहू के पास ट्रंप के समर्थन के बिना दांव-पेच खेलने की बहुत कम गुंजाइश है। ट्रंप तो इससे भी बुरी स्थिति में हैं। जब ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या का आदेश दिया था, तो ईरान का जवाब अमेरिका के एक बेस पर मिसाइल हमला था, जिसमें कोई हताहत नहीं हुआ था और जिसकी जानकारी पहले ही दे दी गई थी। ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई
ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई
जून 2025 में ईरान की परमाणु सुविधाओं के खिलाफ चलाए गए हवाई अभियान, ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के बाद भी, जवाबी कार्रवाई इसी तरह संयमित थी। लेकिन अयातुल्लाह की मौत के बाद तेहरान की प्रतिक्रिया इतनी व्यापक और करो या मरो वाली होगी, न ट्रंप ने और न ही नेतन्याहू ने इसके बारे में अनुमान लगाया था। अमेरिकी प्रशासन की हैरानी तब और बढ़ गई, जब ईरान ने अपनी ताकत का एक जरिया इस्तेमाल किया- होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और उसे जवाबी हथियार के रूप में इस्तेमाल करना।
इसके परिणामस्वरूप जो आर्थिक झटका लगा, उसके ऐसे दूरगामी असर हुए जो न सिर्फ ट्रंप, उनके करीबी सलाहकारों की उम्मीदों से कहीं ज्यादा थे। यह युद्ध नवंबर के अमेरिकी चुनावों को कैसे प्रभावित कर सकता है और उन नतीजों का उनके बाकी राष्ट्रपति कार्यकाल के लिए क्या मतलब होगा, यह एक ऐसा सवाल है जो ट्रंप के फैसलों पर छाया हुआ है। यूं भी सत्ता में रहने वाली पार्टी को मध्यावधि चुनावों में अक्सर नुकसान उठाना पड़ता है।

ट्रंप को इतिहास की इस बात को भुलाने में दिक्कत हो रही है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जो राष्ट्रपति देश को युद्ध में झोंक देता है, उसके लिए चुनाव हारने से भी बुरे नतीजे हो सकते हैं। यह देखते हुए कि युद्ध और अर्थव्यवस्था आपस में जुड़े हुए हैं, ट्रंप को राजनीतिक तौर पर ईरान युद्ध से जल्द से जल्द बाहर निकलने की जरूरत है। आखिर यह वही राष्ट्रपति हैं जिन्होंने अपने दूसरे शपथ ग्रहण भाषण के दौरान कहा था, हम अपनी सफलता को सिर्फ उन लड़ाइयों से नहीं मापेंगे जिन्हें हम जीतते हैं, बल्कि उन युद्धों से भी मापेंगे जिन्हें हम खत्म करते हैं। आज वे खुद ही अपनी शपथ का मखौल उड़ाते नजर आ रहे हैं।
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