शतावधान साधना पद्धति के साधक ट्विंस महात्मा नेमीचंद्रसागर एवं नमीचंद्रसागर
समय व स्थल
जैन इंटरनेशनल विद्यालय द्वारा इस वर्ष 5 अप्रैल की सुबह 8 बजकर 30 मिनट पर ट्विंस महात्मा नेमीचंद्रसागर एवं नमीचंद्रसागर का शतावधान साधना पद्धति कार्पाम का आयोजन किया जा रहा है।
भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से विविध विधाओं एवं कलाओं का आविर्भाव हुआ है, जिनका जनमानस के जीवन पर अत्यंत प्रभाव दृश्यान्वित्त होता है। भारतीय प्राचीन विरासतों में एक विद्या का नाम मिलता है- शतावधान। भीतरी आत्मिक साधना एवं ध्यान के माध्यम से उजागर की गई तीव्र प्रज्ञा के बल से मानसिक शक्ति प्रबल बनती है। साधक की प्रज्ञा अत्यंत सक्षम एवं शक्तिशाली बन जाती है। मस्तिष्क में एक विशेष प्रक्रिया होती है जिससे याद्दाश्त और एकाग्रता बढ़ती है। साधक जो एक बार सुनता है, उसकी स्मृति में अंकित हो जाता है।
शतावधान अर्थात शत (सौ) और अवधान (याद)। विस्तार में कहें तो एक बार श्रवण की गई या देखी हुई वस्तुओं को याद रखने की क्रिया है-शतावधान। सौ वस्तुओं को याद रखकर उसे क्रमवार (1 से 100 के क्रम) और उल्टे क्रम (100 से 1) में याद करने की कला है- शतावधान। जब साधक साधना की गहराई में जाता है तो उसमें 200-200 अवधान करने की सिद्धि हासिल होती है, जिसे कहते हैं- महाशतावधान।
महाशतावधान: स्मरण और साधना
विज्ञान की परिभाषा में समझें तो हमारे पास दो मन होते हैं- ज्ञात मन और अज्ञात मन। हमारा ज्ञात मन जागृत होता है, जिसमें धारण की हुई वस्तुओं को अज्ञात मन में स्थिर किया जाता है। चित्त की एकाग्रता, अभ्यास, मनोबल से जो बातें चित्त में रखी जाती हैं, वह दीर्घकालीन अवस्था तक स्मरण रहती हैं। साधक मनोयोग एवं एकाग्रता के माध्यम से ध्यान को अज्ञात मन में स्थिर करता है, फिर उसे पुन जागृत कर लेता है। यह है-शतावधान प्रक्रिया।
आर्य संस्कृति आत्मिक शक्ति को स्वीकार करती है। आत्मा में असंख्य शक्तियों का भंडार है। प्राचीन काल से हमारे ऋषि-मुनियों ने साधना से अनेक अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त की हैं। आहार संयम, इन्द्रिय संयम एवं जप साधना के जरिए आत्मिक शक्ति के द्वारा शतावधान की सिद्धि प्राप्त करते हैं। ट्विंस महात्मा नेमीचंद्रसागर एवं नमीचंद्रसागर हैदराबाद में ऐतिहासिक महाशतावधान का प्रयोग प्रथम बार करने जा रहे हैं।
उस कार्पाम देखकर आप कह उठेंगे कि यह मानव मगज था या मेमोरी कार्ड! तेलंगाना में महाशतावधान प्रयोग का आयोजन पहली बार किया जा रहा है। इसका आयोजन जैन इंटरनेशनल विद्यालय की टीम द्वारा किया जा रहा है। यह ऐसा स्कूल है। इस स्कूल में शिक्षा व संस्कार का समन्वय दिखाई देता है। यहाँ छात्रों के खेल-कूद तथा अन्य योग्यताओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके अतिरिक्त अनुशासन और विज्ञान के साथ अध्यात्म की शिक्षा भी दी जाती है। जेआईवी संस्था का उद्देश्य युवाओं को शिक्षा तथा संस्कार से जोड़ना है।
ट्विंस महात्मा का परिचय
इन जुड़वां बाल मुनियों का जन्म सूरत में हुआ। उन्होंने अपनी माता सोनल बेन और पिता पीयुष भाई से नैतिक मूल्य, संस्कृति, जैन धर्म और जीवन कौशल की शिक्षा प्राप्त की। व्यावहारिक शिक्षा में पहली कक्षा तक पढ़ाई की, बाद में दो वर्ष तक अपने गुरुदेव से संयम साधना का प्रशिक्षण लिया। मात्र नौ वर्ष की आयु में सूरत में दीक्षा ग्रहण की। उसके बाद से निरंतर तप, जप और कठोर अभ्यास से आध्यात्मिकता में दृढ़ता से प्रगति कर रहे हैं। उन्होंने पैदल 10,000 किलोमीटर की यात्रा तय की है।
ये जुड़वां महात्मा पहले ध्रुव और धैर्य के नाम से जाने जाते थे। आठ वर्ष की आयु में उन्होंने संयुक्त अवधान और अर्धशतावधान का प्रदर्शन किया। उन्होंने सूरत में यह उपलब्धि हासिल की, तो गुजरात के तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री भूपेंद्र सिंह चुडासमा इस जुड़वां जोड़ी से अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्हें सोने से लिखित प्रमाण-पत्र से सम्मानित किया।
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ट्विंस महात्मा ने संन्यास जीवन के बाद सिर्फ ढाई घंटे में 350 श्लोकों को याद करके उन्हें दोहराने का एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाया है। ट्विंस महात्मा ने सर्वप्रथम शतावधान का प्रयोग बेंगलुरु में किया था। वहां 6000 से अधिक दर्शक यह विधि देखकर आश्चर्य चकित रह गए। इसमें भी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि ट्विंस महात्मा ने सिर्फ 10 साल की उम्र में 10-10 भाषा में मोटिवेशनल प्रवचन दिया था, जिससे प्रभावित होकर कर्नाटक के राज्यपाल वजू भाईवाला और मनिंदर सिंह बिट्टा ने उन्हें बधाई के साथ स्वर्ण प्रमाण-पत्र से सम्मानित किया था।
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