विकास की अनोखी उड़ान
हमारा देश विकास के पंख लगाकर इतनी तेज़ी से उड़ रहा है कि अब गुरुत्वाकर्षण भी इसके सामने बेबस नज़र आता है। सरकार कहती है कि हम पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं और जनता इस बात से इतनी उत्साहित है कि अपने जेब में पड़े पांच रुपये के सिक्के को भी गर्व से घुमा रही है।
गली-मोहल्लों में विकास की ऐसी धूम मची है कि हर कोने पर गड्ढों की गहराई नापने के लिए विशेषज्ञ बुलाए जा सकते हैं। सड़कों पर बने गड्ढे हमारी महान सभ्यता की गहराई को दर्शाते हैं और जब बारिश होती है, तो ये गड्ढे जल-संरक्षण की अद्भुत मिसाल पेश करते हैं।
विकास का यह स्तर देख कर, राहगीर खुशी के मारे छलांग लगाते नज़र आते हैं। कभी-कभी तो उनकी ये छलांग सीधी अस्पताल में जाकर ही खत्म होती है। शिक्षा के क्षेत्र में भी हमने अद्भुत प्रगति की है। अब किताबों की बजाय सोशल मीडिया पर फॉरवर्ड किए गए ज्ञान से ही छात्रों का भविष्य संवर रहा है। स्कूलों में टॉपर बनने का सीधा फॉर्मूला है कि फोन लो, अंकों की बारिश होगी।
अगर कभी नंबर कम आ जाएं, तो रोते हुए वीडियो बना लो, इंटरनेट का जनसमर्थन मिल जाएगा। शिक्षा व्यवस्था का यह हाल है कि छात्रों को अब परीक्षा से ज्यादा, परीक्षा रद्द होने की उम्मीद रहती है। महंगाई पर भी सरकार की पूरी नज़र है, बल्कि अब तो वह महंगाई को इतनी नज़दीक से देख रही है कि कभी-कभी तो वह खुद भी चौंक जाती है।
महंगाई, बेरोजगारी और आत्मनिर्भरता की व्यथा
पेट्रोल-डीजल के दाम इतने ऊँचे जा चुके हैं कि अब लोग गाड़ी की जगह बैलगाड़ी की ओर लौटने को मजबूर हैं। लेकिन घबराने की जरूरत नहीं, क्योंकि सरकार के अनुसार, यह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता कदम है। सब्जियों के दाम ऐसे बढ़ गए हैं कि अब टमाटर खरीदना अमीरों की शान और मिडिल क्लास के लिए सपना बन चुका है। आलू-प्याज भी अब तिजोरी में रखने लायक हो गए हैं।
दूध, दाल और खाने-पीने की बाकी चीज़ों के दाम ऐसे बढ़ रहे हैं जैसे कोई ओलंपिक दौड़ चल रही हो।नौकरी की स्थिति भी कमाल की है। सरकार नौकरी देने के बजाय युवाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही है। युवाओं के हाथों में डिग्रियाँ हैं, सपने हैं, पर नौकरी नहीं है।
लेकिन कोई बात नहीं, सरकार कहती है कि पकौड़े तलो, स्टार्टअप करो और डिजिटल इंडिया में ऑनलाइन चाय बेचो। अब तो हाल यह हो गया है कि पढ़े-लिखे इंजीनियर भी राशन की दुकान खोलने पर विचार कर रहे हैं। इंटरव्यू के सवाल भी अनोखे हो गए हैं- पूछा जाता है कि,तुम्हें नौकरी क्यों चाहिए? इसका जवाब देने में उम्मीदवारों को अब दर्शनशास्त्र का सहारा लेना पड़ता है।
देश में चुनावी मौसम भी पूरे साल बना रहता है। जनता से बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं और फिर उन्हें भूलने की कला में नेतागण निपुण हो चुके हैं। घोषणापत्र अब सिर्फ शोपीस बन चुके हैं, जिनका असली उपयोग दीवारों में कील ठोंकने के लिए किया जाता है। चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए मुफ्त बिरयानी और नकद प्रोत्साहन जैसी योजनाएँ चलाई जाती हैं। चुनाव खत्म होते ही जनता फिर से अपने मुद्दों के साथ अकेली छूट जाती है।
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डिजिटल धोखे, बीमार सिस्टम और भीड़भाड़ सफर
अब हम डिजिटल इंडिया की ओर भी बढ़ रहे हैं। हर काम ऑनलाइन हो रहा है, चाहे वो बैंकिंग हो, सरकारी सेवाएँ हों या फिर धोखाधड़ी। एक तरफ सरकार डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा दे रही है, दूसरी तरफ साइबर अपराधी लोगों के खातों को खाली करने में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। तकनीक का ऐसा विकास हुआ है कि अब ओटीपी भी चोरों के पास पहले पहुँच जाता है और ग्राहक बाद में देखता रह जाता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की भी बात कर लें। सरकारी अस्पतालों में इलाज की गति इतनी धीमी है कि मरीज़ का दर्द खुद ही दर्दकिलर बन जाता है। डॉक्टर उपलब्ध नहीं, दवाइयाँ नदारद और अगर कुछ उपलब्ध है तो बस लंबी-लंबी कतारें। निजी अस्पतालों में इलाज इतना महंगा है कि बिल देखकर मरीज़ की आधी बीमारी तो वैसे ही ठीक हो जाती है। बीमा कंपनियाँ भी ऐसी मददगार हैं कि क्लेम पास करवाने के चक्कर में मरीज़ की आत्मा तक क्लेम करने की स्थिति में आ जाती है।
पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी अपनी मिसाल आप है। बसें और ट्रेनें ऐसे चलती हैं जैसे खुद को वीआईपी समझती है जब मन करे, तब आएँ, जब मन करे, तब जाएँ। मेट्रो में चढ़ने के लिए लोग इतनी भीड़ में घुसते हैं कि कभी-कभी स्टेशन पर पहुँचने के बाद भी शरीर के कुछ हिस्से पिछले स्टेशन पर ही छूट जाते हैं। ऑटो रिक्शा वालों की अपनी अलग दुनिया है वे हमारे कहने से नहीं, अपने मूड से चलेंगे।
आम आदमी की जद्दोजहद और देशभक्ति का जज़्बा
आम आदमी की रोजमर्रा की समस्याएँ तो अनगिनत हैं। बिजली कटौती इतनी आम हो चुकी है कि लोग इनवर्टर को भगवान की तरह पूजने लगे हैं। पानी की समस्या भी ऐसी है कि लोग अब बाल्टी भरने के लिए सूरज उगने से पहले ही तैयार रहते हैं। सड़क पर निकलो तो जाम में फँसना तय है और अगर जाम न मिले तो समझो किसी बड़े नेता का काफिला गुजरने वाला है।
सरकारी दफ्तरों में काम करवाना भी एक साहसिक कार्य बन चुका है। एक फॉर्म जमा करवाने के लिए इतनी बार चक्कर लगाने पड़ते हैं कि लोग इसे मुफ्त का व्यायाम मानने लगे हैं। और अगर गलती से कोई काम समय पर हो जाए, तो लोग इसे किसी चमत्कार से कम नहीं समझते।
और सबसे अनोखी बात तो यह है कि आम जनता हर हाल में खुश रहती है। चाहे सड़क पर ट्रैफिक जाम हो, बिजली कटौती हो, महंगाई आसमान छू रही हो। एक प्याली चाय लेकर ठहाके लगाते हुए कहते हैं, चलो कोई नहीं, अपना देश महान है। यही जज़्बा हमें दुनिया से अलग बनाता है।
कुल मिलाकर, हमारा देश तेजी से आगे बढ़ रहा है। अब यह अलग बात है कि यह आगे बढ़ रहा है या पीछे गिर रहा है, इस पर विचार करने की ज़रूरत नहीं है। आखिरकार, विकास की यह अनोखी उड़ान है, जहाँ उड़ने वाले ही जानते हैं कि वे उड़ रहे हैं या गिर रहे हैं!
-डॉ.सिद्धार्थ कुमार जौहरी
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