उत्तरा गर्भ-रक्षण कथा (डोंगरे जी महाराज)
भगवान् गीताजी में ऐसा बोले हैं – समोऽहं सर्वभूतेषु अर्थात मैं सर्व में समभाव रखता हूँ। मेरा कोई शत्रु नहीं है, मेरा कोई मित्र नहीं है। महाभारत पढ़ने से ऐसा लगता है कि भगवान समभाव नहीं हैं। भगवान पाण्डवों के पक्षपाती करते हैं या कह सकते हैं कि भगवान अपने भक्तों के पक्षपाती हैं।
पाण्डवों की जीत हो, इसीलिये भगवान कपट भी करते हैं, अपयश लेते हैं। प्रभु के प्यारे पांडवों के वंश में परीक्षित का जन्म हुआ है। कौरव-पांडवों के युद्ध में कौरवों का विनाश हुआ। कौरव-सेना में अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा तीन बाकी रहे और सबका विनाश हो गया।
अश्वत्थामा ने वैर से अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र छोड़ा। उसके पेट में जो गर्भ था, उसी बालक ने भविष्य में राजा बनकर वंश को बढ़ाया। पांडव-वंश का विनाश करने के लिये उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र छोड़ा था। ऐसा ब्रह्मास्त्र छोड़ा कि माँ का मरण न हो, लेकिन उसके पेट में स्थित गर्भ जीवित न रहे।
द्रौपदी की सीख: संकट में धैर्य और भक्ति ही सबसे बड़ा सहारा
द्रौपदी ने अपनी पुत्रवधू को समझाया है कि जीवन में कैसा भी दुःख का प्रसंग आए, घबराना नहीं। दुःख सभी के जीवन में आता है। श्रीराम, श्रीकृष्ण परमात्मा हैं, आनंदमय हैं। उन्होंने ऐसी लीला की है कि मेरे जीवन में भी दुःख है। द्रौपदी बहुत भक्ति करती थी। उसे देख कर उसकी पुत्रवधू उत्तरा भी भक्ति करने लगी थी। अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा, तो उत्तरा ने उस समय भगवान का स्मरण किया। भगवान को पता चल गया कि अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा है तो वह तुरंत उत्तरा के गर्भ में प्रवेश कर गए।
सदर्शनेन स्वास्त्रेण स्वानां रक्षां व्यधाद्विभुः।
उन्होंने उत्तरा के गर्भ में स्थित ब्रह्मास्त्र का अपने सुदर्शन-पा से निवारण किया है। भागवत् के प्रधान श्रोता परीक्षित हुए।
जीव गर्भ में नरक का दुःख भोगता है। गर्भवास ही नरकवास है। परीक्षित को गर्भ में परमात्मा का दर्शन हुआ। परीक्षित ने देखा कि ये बाण मुझे मारने के लिये आ रहा है। एक चार हाथ वाला तेजस्वी पुरुष चारों ओर से घूमता हुआ, मेरा रक्षण कर रहा है। गर्भ में परमात्मा का दर्शन हुआ।
सच्चा रक्षक भगवान: जीवन के हर चरण में वही सहारा
थोड़ा-सा विचार करो। हम परीक्षित जैसे ही हैं। यह जीव माँ के पेट में था, तो उसका रक्षण भगवान करते थे। माँ के पेट से बाहर आने पर भी बालक की रक्षा माँ-बाप नहीं करते हैं, बल्कि परमात्मा करते हैं। बालक बोलता नहीं है और माँ को भी खबर नहीं होती है कि बालक को क्या चाहिए? माँ समझती नहीं है और बालक बोलता नहीं तो बाल्यावस्था में जीव का रक्षण भगवान करते हैं।
भगवान् को कोई न माने, इससे भगवान का नुकसान नहीं होता। भगवान को जो मानता नहीं है, एक दिन वह बहुत दुःखी हो जाएगा। साढ़े साती जब आती है, तब शनि महाराज एक-एक को सज़ा देते हैं, तब लोग हनुमान जी को तेल चढ़ाने के लिये जाते हैं। थोड़ी अकल आती है। भगवान् को मानना ही चाहिए, भगवान को मानने से लाभ ही होता है।
यह भी पढ़े : आत्मनिष्ठ आचारनिष्ठ व निस्पृह साधक आचार्य महाश्रमण
आजकल बहुत-से लोग डॉक्टर को बहुत मानते हैं। भगवान को इतना नहीं मानते हैं, जितना डॉक्टर को मानते हैं। डॉक्टर में बहुत विश्वास रखते हैं। ऐसा समझते हैं कि डॉक्टर ने मुझे बचा लिया। अरे, डॉक्टर क्या बचाएगा। जो काल के आधीन है, वह दूसरे को क्या बचा सकता है? डॉक्टर में बचाने की शक्ति हो तो उसका मरण क्यों होता है? बचाने वाले भगवान हैं। रक्षण भगवान करते हैं। भगवान को मानो। भगवान् के उपकार का स्मरण करो। सभी जीवों का रक्षण भगवान करते हैं। परीक्षित का रक्षण किया है।
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



