उत्तराखंड पर मंडरा रहा है, हिमनद झील के विस्फोट का गंभीर खतरा
2017 में डब्लूआईएचजी के वैज्ञानिकों ने नंदा देवी घाटी सहित हिमालय में बाढ़ों पर एक विस्तृत रिपोर्ट फाइल की थी। इंस्टिट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रदीप श्रीवास्तव कहते हैं, वैज्ञानिकों के तौरपर हम नाकाम हो जाते हैं, जब सरकार हमारे सुझावों व समीक्षाओं को अनदेखा कर देती है। दरअसल, समस्या स़िर्फ यही नहीं है कि वैज्ञानिकों की सलाह नहीं मानी जाती, जिसकी वजह से आपदाएं तो आती ही रहेंगी, बल्कि कटु सत्य यह है कि जहां से सही सुझाव आ सकते हैं वह जगह भी सिकुड़ती जा रही हैं। भारत में एक भी इंस्टिट्यूट ऐसा नहीं है, जो ग्लेशियरों की वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन कर सके। ग्लेशियोलोजी के लिए डब्लूआईएचजी में एक केंद्र था, उसमें भी 2020 में ताले पड़ गये। ऐसा डब्लूआईएचजी के रिटायर्ड वैज्ञानिक डीबी डोभाल का कहना है, जो 2013 की केदारनाथ त्रासदी का मूल्यांकन करने वाली समिति के प्रमुख थे।
उत्तराखंड के केंद्रीय हिमालय क्षेत्र में लगभग 4,750 मी. की ऊंचाई पर एक एकाकी ग्लेशियर झील है, जिसका नाम भिलंगना झील है। एक नये वैज्ञानिक अध्ययन में यह गंभीर चिंता व्यक्त की गई है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण यह झील बहुत तेज़ी से फैल रही है और अगर यह विस्तार जारी रहा, तो जीएलओएफ (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स) का गंभीर खतरा भयंकर बढ़ जायेगा। इस विस्फोट के कारण डाउनस्ट्रीम (अनुप्रवाह) आबादियां और हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट्स पूरी तरह से नष्ट हो सकते हैं। जीएलओएफ का अर्थ है हिमनद झील विस्फोट होगा जिससे भयानक बाढ़ आयेगी।
यह बाढ़ आती ही उस समय है, जब किसी ग्लेशियर से बनी झील (जो बर्फ या मलबे के बांध से रुकी होती है) का प्राकृतिक बांध अचानक टूट जाता है। इससे झील का पानी बहुत तेज़ गति से बह निकलता है। यह बाढ़ ग्लेशियर के पिघलने, हिमस्खलन, भूस्खलन, भूकंप या बांध पर पानी के अत्यधिक दबाव के कारण आ सकती है। यह बाढ़ अपने रास्ते में आने वाली इमारतों, सड़कों और मानव जीवन को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। साल 2013 की केदारनाथ बाढ़, जिसमें 5,000 से अधिक व्यक्तियों की जान गई थी व करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति नष्ट हो गई थी, वैज्ञानिकों के अनुसार बादल फटने व जीएलओएफ के संयुक्त प्रभाव का परिणाम थी।
ग्लोबल वार्मिंग से तेज़ी से फैल रहीं झीलें बनीं बड़े खतरे का स्रोत
ग्लोबल वार्मिंग और तेज़ी से पिघलते ग्लेशियरों ने हिमालय को जीएलओएफ के लिए सबसे खतरनाक क्षेत्रों में शामिल कर दिया है; क्योंकि यहां तेज़ी से फैल रहीं ग्लेशियल झीलें उत्तराखंड के डाउनस्ट्रीम समुदायों, इन्फ्रास्ट्रक्चर व हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट्स के लिए मुख्य खतरा बन गईं हैं। वैज्ञानिकों ने निरंतरता के साथ सावधान किया है कि बढ़ती गर्मी और अस्थिर मलबे से बनी झीलें ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर रही हैं, जिससे अचानक विनाशकारी हिमनद विस्फोट हो सकता है। ऐसा विस्फोट मिनटों में लाखों क्यूबिक पानी छोड़ देगा।
यह बात केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑ़फ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (डीएसटी) द्वारा फण्ड किये गये एक ताज़ा अध्ययन में सामने आयी हैं, जोकि हाइड्रोलोजिकल प्रोसेस पत्रिका में प्रकाशित हुई है। यह अध्ययन वाडिया इंस्टिट्यूट ऑ़फ हिमालयन जियोलॉजी (डब्लूआईएचजी), देहरादून, नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट (एनजीआरआई) हैदराबाद, जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी दिल्ली, आईआईटी मद्रास, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑ़फ हाइड्रोलॉजी रुड़की और अन्य सहयोगी संस्थाओं के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है।
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भिलंगना झील का 1968 से 2025 तक तेज़ विस्तार, ग्लेशियर तेजी से पिघला
यह अध्ययन सैटेलाइट इमेजरी, फील्ड डाटा, मीटरोलॉजीकल विश्लेषण और हाइड्रोडायनामिक मॉडलिंग के जरिये किया गया है। इस अध्ययन में भिलंगना झील के क्रम-विकास को 1968 से 2025 तक देखा गया है। अध्ययन में पाया गया कि इस झील का 1968 में अस्तित्व ही नहीं था, यह 1980 में बनना शुरू हुई, फिर 2000 तक इसका विकास बहुत धीमी गति से हुआ। अध्ययन के लीड लेखक व डब्लूआईएचजी में सीनियर रिसर्च फेलो पवन पाटीदार के अनुसार, 2001 के बाद से इस झील का विस्तार घातीय हो गया, तेज़ी से ग्लेशियर के पतला होने व सिकुड़ने के कारण।
साल 1990 के दशक के मध्य से पैरेंट (मूल) ग्लेशियर ने 0.7 किमी वर्ग क्षेत्र खो दिया है, प्रति वर्ष 0.7 मी. पतला होने की दर से। हाइड्रोडायनामिक सिमुलेशंस का इस्तेमाल करते हुए शोधकर्ताओं ने एक मॉडल तैयार किया, यह देखने के लिए कि मलबे से बंधी हुई झील अगर अचानक विस्फोट करती है, तो अधिकतम कितनी तबाही मचायेगी। नतीजों ने बहुत ही भयावह तस्वीर प्रस्तुत की- हिमनद विस्फोट के कारण ऊपरी हिस्सों में प्रति सेकंड 3,645 क्यूबिक मीटर पानी डिस्चार्ज होगा और वह भी 30 मी. प्रति सेकंड के अधिक वेग से। घुट्टू, घंसाली और भिलंगना हाइड्रोपॉवर स्टेशन एकदम सीधे सैलाब के मार्ग में पड़ते हैं और उनमें बाढ़ की गहराई 8-10 मीटर से अधिक हो सकती है।
अध्ययन के अनुसार सड़क, पुल और पॉवर इन्फ्रास्ट्रक्चर को विशेषरूप से खतरा रहेगा। इससे जो जान और माल का नुकसान होगा, उसका अंदाज़ा स्वत ही लगाया जा सकता है। गौरतलब है कि गढ़वाल हिमालय में ज़िला चमोली के तपोवन क्षेत्र में रैनी गांव के निकट 7 फरवरी 2021 की सुबह जो दुखद घटना हुई थी, उसने निश्चितरूप से 2013 की केदारनाथ त्रासदी की याद दिला दी थी।
ऋषिगंगा और एनटीपीसी प्रोजेक्ट को भारी नुकसान, पुल भी प्रभावित
इससे जहां अनेक लोगों की जानें गईं, वहीं 13.2 मेगावाट ऋषिगंगा हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट पूरी तरह से बह गया। धौलीगंगा नदी पर 520 मेगावाट एनटीपीसी हाइड्रो प्रोजेक्ट को आंशिक नुकसान पहुंचा और पानी के तेज़ बहाव से कम से कम पांच पुलों पर गहरा प्रभाव पड़ा व अनेक गांवों में पानी भर गया था। तपोवन बैराज पर अधिकतम जलस्तर 1803 मीटर रहता है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि जलस्तर 1808 मीटर पार कर गया था, जिससे भारी नुकसान तो होना ही था।
इस पृष्ठभूमि में यह बात तो सहज ही समझी जा सकती है कि नवीनतम अध्ययन में जो आशंकाएं व्यक्त की गईं हैं, उनका आधार ठोस है और समय रहते सुरक्षा उपाय करने आवश्यक हैं। अगर एहतियाती कदम नहीं उठाये जाते हैं, तो फिर इस कि़स्म के अध्ययन कराने का क्या फायदा है? यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि हाल के महीनों में मसूरी की लंढोर मार्किट में ज़मीन के धंसने की स्थिति निरंतर बद से बदतर होती जा रही, जिससे वहां रहने वालों और पर्यटकों की सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं।
जैन मंदिर और पूर्व कोहिनूर बिल्डिंग के बीच का जो व्यस्त रास्ता है, वह लगभग एक फुट धंस गया है, जिससे सड़क पर और पास की इमारतों में चौड़े क्रैक आ गये हैं, जिससे अनेक दुर्घटनाएं हो चुकी हैं और मकानों को नुकसान पहुंचा है। ध्यान रहे कि पिछले कुछ दशकों के दौरान उत्तराखंड में चार प्रमुख प्राकृतिक आपदाएं देखने में आयी हैं- 1991 के उत्तरकाशी भूकंप में 768 लोगों की जानें गईं, 1998 के मालपा भूस्खलन में 255 लोग मरे, 1999 के चमोली भूकंप में 100 से ज्यादा लोग मरे और 2013 की केदारनाथ बाढ़ में 5,700 से अधिक लोग चल बसे। फिर 2021 में चमोली की घटना हुई।
वैज्ञानिकों की चेतावनियाँ अनसुनी, आपदा प्रबंधन पर उठे सवाल
इन दुखद घटनाओं पर विराम एक ही सूरत में लग सकता है कि पहाड़ों में कोई विकास प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से पहले वैज्ञानिकों की राय ले ली जाये, उन्हें अनदेखा न किया जाये। ऊपरी ऋषिगंगा जलागम क्षेत्र में आठ ग्लेशियर- उत्तरी नंदा देवी, चंगबंग, रमणी बैंक, बेथरतोली, त्रिशूल, दक्षिणी नंदा देवी, दक्षिणी ऋषि बैंक और रौनथी हैं। पिछले तीन दशक से भी कम में वह 10 प्रतिशत से भी अधिक अपना मास खो चुके हैं।

2017 में डब्लूआईएचजी के वैज्ञानिकों ने नंदा देवी घाटी सहित हिमालय में बाढ़ों पर एक विस्तृत रिपोर्ट फाइल की थी। इंस्टिट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रदीप श्रीवास्तव कहते हैं, वैज्ञानिकों के तौरपर हम नाकाम हो जाते हैं, जब सरकार हमारे सुझावों व समीक्षाओं को अनदेखा कर देती है। दरअसल, समस्या स़िर्फ यही नहीं है कि वैज्ञानिकों की सलाह नहीं मानी जाती, जिसकी वजह से आपदाएं तो आती ही रहेंगी, बल्कि कटु सत्य यह है कि जहां से सही सुझाव आ सकते हैं वह जगह भी सिकुड़ती जा रही हैं। भारत में एक भी इंस्टिट्यूट ऐसा नहीं है, जो ग्लेशियरों की वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन कर सके। ग्लेशियोलोजी के लिए डब्लूआईएचजी में एक केंद्र था, उसमें भी 2020 में ताले पड़ गये। ऐसा डब्लूआईएचजी के रिटायर्ड वैज्ञानिक डीबी डोभाल का कहना है, जो 2013 की केदारनाथ त्रासदी का मूल्यांकन करने वाली समिति के प्रमुख थे।
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