उत्तराखंड : यूसीसी की प्रयोगशाला

उत्तराखंड 27 जनवरी, 2025 को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने वाला भारत का पहला राज्य बन गया। यानी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों जैसे मामलों के लिए सभी धर्मों के लिए एक समान कानून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस कदम को एक संवैधानिक उपाय बताया। उद्देश्य है, भेदभाव की समाप्ति और महिलाओं का सशक्तीकरण। यह भी, कि यूसीसी किसी भी धर्म या संप्रदाय के खिलाफ नहीं है और अनुसूचित जनजातियों को उनके अधिकारों की रक्षा के लिए इससे बाहर रखा गया है। तो भी इस कदम से बहुआयामी बहस छिड़ना लाज़मी है।

भारत की ताकत इसकी सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता में निहित है। आलोचकों का तर्क है कि एक समान कानून इस बहुलवाद को कमजोर कर सकता है, क्योंकि यह विशिष्ट धार्मिक प्रथाओं और परंपराओं की अनदेखी करता है। उदाहरण के लिए, इस्लामिक धर्मशास्त्रा और उलेमा इसे उनके धर्म का पालन करने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन मानते हैं, क्योंकि यह धार्मिक सिद्धांतों से शासित व्यक्तिगत कानूनों को निरस्त करता है।

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लंबे समय से यूसीसी का समर्थन किया है। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए श्रेयस्कर माना है। लेकिन, विरोधियों की राय में तो उत्तराखंड में इसका कार्यान्वयन निहित राजनीतिक उद्देश्य की सिद्धि भर है – संभावित रूप से अल्पसंख्यक समुदायों को हाशिये पर धकेलना! भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने यूसीसी को बहुसंख्यकवादी संहिता करार दिया है। उसकी निगाह में यह न तो समान है और न ही नागरिक। उन्हें इसमें भारत के विविधतापूर्ण सामाजिक ताने-बाने का तिरस्कार भी दिखाई देता है।

यूसीसी के समर्थकों का दावा है कि यह महिलाओं को प्रभावित करने वाले भेदभावपूर्ण व्यक्तिगत कानूनों को समाप्त करके लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है। बहुविवाह पर प्रतिबंध और उत्तराधिकार अधिकारों को बराबरी पर लाया जाना प्रगतिशील कदम माने जाने चाहिए। लेकिन, कुछ महिला अधिकार समूहों को इन पर भी संदेह है।

वैसे भी, सरकार की मंशा को लेकर सवाल उठना आम बात है। लिव-इन संबंधों में जोड़ों को राज्य के साथ पंजीकरण कराने की बाध्यता वाले प्रावधानों पर भी चिंता जताई जा रही है, क्योंकि इससे महिलाओं को सामाजिक निगरानी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है।

यूसीसी के लागू होने से इसमें निहित कानूनी अस्पष्टताएँ भी सामने आई हैं। ख़ासकर माता-पिता की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के विषय में। सयानों की मानें तो, यह संहिता कुछ मामलों पर चुप है। इससे उन मौजूदा कानूनों पर निर्भरता बढ़ सकती है, जो यूसीसी के उद्देश्यों के अनुरूप न हों। इस स्पष्टता की कमी से व्यावहारिक असंगतियों के पैदा होने की आशंका को निराधार नहीं कहा जा सकता न!

विचारणीय यह भी है कि उत्तराखंड में यूसीसी पर जनता की प्रतिािढया मिली-जुली दिख रही है। जहाँ कुछ इसे समानता की दिशा में ऐतिहासिक कदम मानते हैं, वहीं अन्य इसे भारत के बहुलतावादी ताने-बाने की अनदेखी के रूप में देखते हैं। सियासती दाँवपेंच की बात करें, तो यह भी कहा जा रहा है कि उत्तराखंड को इस पहल के लिए इसलिए चुना गया कि वहाँ मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत कम और बिखरी हुई है, इस कारण व्यापक विरोध की संभावना कम है।

उत्तराखंड में यूसीसी की सफलता या असफलता अन्य भाजपा-शासित राज्यों में इसे अपनाने के लिए एक मिसाल बन सकती है, जो देश के कानूनी परिदृश्य को पुन आकार दे सकती है। कहना शायद गलत न हो कि उत्तराखंड यूसीसी की प्राथमिक प्रयोगशाला है! अंतत, उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता का घोषित उद्देश्य भले ही समानता को बढ़ावा देने वाला एक समेकित कानूनी ढाँचा बनाना है, यह अपने साथ सांस्कृतिक विविधता, अल्पसंख्यक अधिकार, लैंगिक समानता और कानूनी स्पष्टता से संबंधित अहम चिंताओं को भी लेकर आया है।

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