निशाने पर पानी !
पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य हमेशा से तनावपूर्ण रहा है, लेकिन हाल के दिनों में यह संघर्ष एक खतरनाक मोड़ ले चुका है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हमलों से प्रारंभ हुआ यह युद्ध अब सैन्य ठिकानों से आगे बढ़कर नागरिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बना रहा है। खाड़ी क्षेत्र के विलवणीकरण (डिसेलिनेशन) संयंत्र, जो पेयजल के प्रमुख स्रोत हैं, अब ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते टकराव के नए निशाने के रूप में उभर रहे हैं।
बहरीन ने ईरान पर अपने एक डिसेलिनेशन प्लांट पर ड्रोन हमले का आरोप लगाया, जबकि ईरान ने अमेरिका पर क़ेश्म द्वीप के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट पर हवाई हमले का दावा किया, जिससे 30 गाँवों की जल आपूर्ति प्रभावित हुई। यह घटना न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रही है, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक सवाल खड़ा कर रही है: क्या तेल के बाद अगला युद्ध पानी पर होगा?
खाड़ी क्षेत्र का सबसे सूखा और जल संकटग्रस्त इलाका
गौरतलब है कि खाड़ी क्षेत्र दुनिया का सबसे सूखा क्षेत्र है। वहाँ प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत न्यूनतम हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन जैसे देशों में 70 से 90 प्रतिशत पेयजल डिसेलिनेशन संयंत्रों से प्राप्त होता है। कुवैत में यह अनुपात 90 प्रतिशत, ओमान में 86 प्रतिशत और सऊदी अरब में 70 प्रतिशत है। ये संयंत्र समुद्री जल को रिवर्स ऑस्मोसिस या आसवन प्रक्रिया से शुद्ध करते हैं, जो बहुत महँगी प्रक्रिया है।
फारस की खाड़ी के तट पर सैकड़ों ऐसे प्लांट स्थित हैं, जो न केवल पेयजल बल्कि कृषि और उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन युद्ध की आग में ये संयंत्र अब कमजोर कड़ी बन चुके हैं। ईरानी मिसाइलों या ड्रोन हमलों की सीमा में होने के कारण, इनका निशाना बनना लाखों लोगों की जान को खतरे में डाल सकता है। बेशक, यह सबसे खराब परिदृश्य है, क्योंकि जल संकट मानवीय आपदा को जन्म दे सकता है।
इतिहास गवाह है कि 1991 के खाड़ी युद्ध में इराक ने कुवैती जल संयंत्रों को नुकसान पहुँचाया था, जिसकी बहाली में वर्षों लगे। यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी संयंत्रों को निशाना बनाया, जबकि लीबिया गृहयुद्ध में त्रिपोली के प्लांट क्षतिग्रस्त हुए। अब ईरान का बदला खाड़ी के तटवर्ती देशों को प्रभावित कर रहा है, जो तटस्थ रहना चाहते हैं लेकिन युद्ध की चपेट में फँस रहे हैं!
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तेल के बाद पानी पर प्रहार, खाड़ी में अस्तित्व का संकट
कहना गलत न होगा कि तेल ने खाड़ी को वैश्विक शक्ति केंद्र बनाया, लेकिन पानी पर प्रहार से अब अस्तित्व का प्रश्न पैदा हो रहा है। जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि से, पहले ही क्षेत्र जल-तनाव से जूझ रहा है। विडंबना यह है कि जब ऐसे हमले कोई पक्ष स्वयं करता है तो इन्हें रणनीतिक दबाव का हथियार कहता है, लेकिन जब उस पर हमला होता है तो यही कृत्य उसे अपराध लगने लगता है! यह युद्ध अब हाइब्रिड रूप ले चुका है। तेल की कीमतें पहले ही चढ़ चुकी हैं, लेकिन जल संकट वैश्विक खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करेगा। यदि ये हमले बढ़े, तो लाखों शरणार्थी विस्थापित होंगे, जो यूरोप और एशिया तक फैल सकते हैं!
क्या तेल के बाद पानी ही अगला युद्धक्षेत्र बनेगा? संभावना डरावनी है। जल संसाधनों को लेकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा पहले से ही काफी तीव्र है। नील नदी पर मिस्र-इथियोपिया विवाद इसका उदाहरण है। पश्चिम एशिया में यह संघर्ष क्षेत्रीय शक्तियों को मजबूर कर सकता है कि वे गठबंधन बदलें, जैसे सऊदी अरब और यूएई अमेरिका की ओर झुकें! लेकिन समाधान कूटनीति में है – जिसकी संभावनाओं को धूमिल करने में दोनों ही पक्ष किसी भी तरह पीछे नहीं हैं! अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत नागरिक बुनियादी ढाँचे की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून की परवाह यहाँ किसी को है क्या? तो भी, वक़्त आ गया है कि वैश्विक समुदाय अब हस्तक्षेप करे, वरना पश्चिम एशिया की रेत की आग जल्दी ही ज़िंदगी के स्रोत को निगल लेगी। और तब कोई भी विजेता नहीं होगा। हर एक को हारना होगा।
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