फौरी सीजफायर के बाद अब इजराइल का क्या होगा ?

जंग के मैदान से अमेरिका तुरत-फुरत में अलग तो नहीं हो पाया, लेकिन बिगड़ते हालात के बीच दो हफ्तों के लिए जंग फौरी तौरपर रूक गई है। क्या इससे ईरान, हिजबुल्ला मजबूत होंगे? क्या दो हफ्तों के बाद अगर जंग हुई तो अमेरिका दोबारा लौटेगा? जानकार संशय जता रहे हैं। ऐसे में अगर दो हफ्तों के बाद स्थायी तौरपर जंग न रूकी, तो इजराइल ईरान के सामने अकेला पड़ जायेगा। युद्ध में अकेले फंसने पर इजराइल का क्या होगा?

अंतत दो हफ्तों के लिए अमेरिका-इजराइल-ईरान जंग थम गई है। लेकिन अगर जंग दोबारा शुरु होती है, तो क्या होगा? यह बात कई अमेरिकी विशेषज्ञ कह रहे हैं। क्या सीजफायर के दौरान अमेरिका और इजराइल के रिश्तों में क्रांतिकारी बदलाव आ सकते हैं? इस टर्निंग पॉइंट के बाद या तो एक बहुत विवेकशील और आत्मनिर्भर नया जिम्मेदार इजराइल उभरेगा या फिर उसका अस्तित्व ही नष्टप्राय हो जाएगा।

हालांकि कोई युद्ध अनंतकाल तक नहीं चलता और यह युद्ध भी, अगर दोबारा शुरु हुआ तो, बरसों तक नहीं खिंचेगा, ये तय है। परंतु युद्ध जरा भी लंबा खिंचता है, तो ट्रंप ने अपना एक्जिट प्लान और प्वाइंट तय कर रखा है। आधिकारिक स्रोतों के अनुसार अब तक हुई अमेरिकी सैनिकों की मौत, भारी आर्थिक बर्बादी, रक्षा विभाग के लिए फंड की कमी, कांग्रेस की असहमति, घरेलू राजनीति में अलोकप्रियता, खुद की गिरती रेटिंग तथा उनके दावों को मीडिया द्वारा हल्के में लेने से डोनल्ड ट्रंप इतने बौखला और झुंझला गये थे कि स्वनिर्मित तर्कों, तथ्यों तथा आंकड़ों के आधार पर ही वह खुद को स्वयंभू विजेता घोषित करने लगे थे और औपचारिक सीजफायर के पहले भी वह मैदान से बाहर जाने के रास्ते देख रहे थे।

अमेरिका न लौटे तो इजराइल पर ईरान का हमला बढ़ेगा

लेकिन ऐसी नौबत तो नहीं आयी, बनाये गये माहौल के मुताबिक अंतत सीजफायर हो गई। लेकिन अगर सीजफायर नहीं हुई होती, तो इजराइल को हर हाल में जंग जारी रखनी पड़ती। लेकिन अगर सीजफायर की अवधि समाप्त होने के बाद अमेरिका फिर से जंग में नहीं लौटता और इजराइल अपनी नाक बचाने के लिए फिर से जंग छेड़ देता है, तो ईरान इस बार इजराइल पर कहीं ज्यादा हमलावर होगा।

इस स्थिति में वह खाड़ी देशों पर हमले सीमित कर इजराइल के विरुद्ध युद्ध को खींच सकता है, इससे इजराइल की मुसीबतें खासी बढेंगी। सवाल यह है कि युद्ध अमेरिका और इजराइल ने मिलकर शुरू किया था, तब क्या ऐसी शर्त थी कि कोई भी अपनी सुविधानुसार मैदान छोड़ देगा? इस पर तुर्रा यह कि अमेरिका अपनी सारी असफलता का दोष इजराइल पर डाल देगा। तब युद्ध में अकेले ही लड़ रहे इजराइल को प्रोत्साहन की बजाए प्रताड़ना, प्रत्यारोप निस्संदेह बुरा लगेगा, इससे दोनों के रिश्तों में दरार आयेगी।

वैसे सतही तौरपर इस विनाशकारी युद्ध से इजराइल, अमेरिका रिश्ते खत्म होने की उम्मीद दूर की कौड़ी लगती है, लेकिन कई तर्क इस संभावना को संबल भी देते हैं, वैसे भी राजनीति और युद्ध में कुछ भी संभव है और यह मसला तो इन दोनों से जुड़ा है। अमेरिका और इजराइल के रिश्तों में बदलाव की जमीन तो तैयार है, यदि आगे की घटनाओं ने प्रत्याशित मोड़ लिया तो कुछ बातें इजराइल को अमेरिका से दूरी पर मजबूर करेंगी, यह तर्क आंशिक सत्य अवश्य है, परंतु यथार्थ इतना जटिल है कि बात और बदलाव क्रांतिकारी स्तर पर पहुंच जाए, थोड़ा अतिरेक लगता है।

इजराइल की सैन्य शक्ति अमेरिकी सहायता पर निर्भर

अमेरिका के लिए इजराइल पश्चिम एशिया में एक स्थिर, विश्वसनीय और तकनीकी रूप से उन्नत साझेदार है। इजराइल की सैन्य क्षमता का बड़ा हिस्सा अमेरिका की सालाना तकरीबन 4 बिलियन डॉलर अमेरिकी सैन्य सहायता और हथियारों पर निर्भर है। अमेरिकी कूटनीतिक संरक्षण और आर्थिक सहयोग उसके अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिकी वीटो ने कई बार इजराइल को अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचाया है।

अमेरिका और इजराइल के संबंध महज किसी एक युद्ध या किसी सरकार पर आधारित नहीं हैं; वे सामरिक, तकनीकी, वैचारिक और घरेलू राजनीतिक कारकों की गहरी जड़ों में समाए हुए हैं। ऐसे में यह मान लेना कि एक युद्ध की विफलता अथवा ट्रंप की मनमानी के कारण ये संबंध अचानक टूट जाएंगे, अतिश्योक्ति प्रतीत होती है, क्योंकि न नेतन्याहू इस सीमा तक जाने का खतरा मोल लेना चाहेंगे न ही ट्रंप, जब तक कि मेक अमेरिका फर्स्ट अगेन अभियान चल रहा है।

हालांकि संबंधों में दरार के कई मौके दिखे। ट्रंप और नेतन्याहू ने ईरान पर साथ में हमले शुरू किए लेकिन लक्ष्य को लेकर दोनों एकमत नहीं दिखे, अमेरिका ने अपना इरादा परमाणु क्षमता, सैन्य क्षमता कम करना बताया जबकि इजराइल ने रेजीम चेंज और ईरान के नेताओं की प्रतीकों की तबाही। अमेरिका ने कई बार लक्ष्य और बयान बदले पर इजराइल इसका कोई बढ़-चढ़कर समर्थन करते नहीं दिखा वह ईरान की अवसंरचानाओं को नष्ट करने पर केंद्रित रहा।

होर्मुज जलडमरूमध्य सुरक्षा पर अमेरिका-इजराइल रुख अलग

युद्ध के तीसरे सप्ताह में मतभेद और साफ हुए ट्रंप ने जंग में जीत का दावा ठोंककर अपनी तरफ से युद्ध विराम की घोषणा की लेकिन इजराइल ने इससे असहमति के तौरपर निरंतर हमले जारी रखे। होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा हेतु जिन देशों से आह्वान किया उनके द्वारा असहयोग पर ट्रंप का रुख आक्रामक और जैसे को तैसा वाला था, जबकि इजराइल ने इस अमेरिकी रुख का समर्थन नहीं किया।

ट्रंप ने यूरोपीय देशों के साथ-साथ सहयोगी खाड़ी देशों की आलोचना की लेकिन इजराइल ने सुर में सुर नहीं मिलाया। ट्रंप का खार्ग द्वीप पर कब्जे का रुख हो या जमीन पर सेना उतारना, एकतरफा ही रहा क्योंकि इजराइल ने खुल कर समर्थन नहीं किया। इन चंद सबूतों से साफ है कि ट्रंप ने इजराइल को पूर्ण साझेदारी का वचन तो दिया लेकिन राजनीतिक लक्ष्य अस्पष्ट रहे, प्रतिबद्धता पर कोई मुहर नहीं लगी। भविष्य में यदि ईरान कमजोर हो जाता है, तो दोनों के संबंध मजबूत रहेंगे; ईरान मजबूत बना रहता है, तो ट्रंप इजराइल के पीछे से हट सकते हैं।

यदि अमेरिका हटा तो इजराइल अकेला पड़ेगा, इससे ईरान हिजबुल्लाह मजबूत होंगे और उस पर दबाव बढ़ेगा। वैश्विक जनमत पहले से ही इजराइल के खिलाफ है। अन्य देश भी इजराइल से दूरी बना सकते हैं। यूरोप, जो अभी दबाव में चुप है, खुलकर विरोध करेगा, गाजा पर बेहद मुखर होगा। अमेरिका द्वारा इजराइल का हर हाल में समर्थन को देखते हुए इजराइल के प्रति नफरत के बावजूद यूरोपीय देश इस मामले पर एकमत नहीं होते थे, सबूत है महज 4 यूरोपीय देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता देना लेकिन यदि ट्रंप हटे तो प्रतिक्रिया का मौका ढूंढ रहा यूरोपीय संघ इजराइल पर प्रतिबंध लगाने की हद तक जा सकता है।

यह भी पढ़ें… जनविश्वास विधेयक क्या है और इससे किसको फायदा मिलेगा ?

इजराइल अलग-थलग देश बन सकता है, नॉर्थ कोरिया जैसा स्थिति

अंतरराष्ट्रीय जनमत में इजराइल की बिगड़ती छवि की प्रवृत्ति जारी रही तो कूटनीति पर भी दबाव बढ़ेगा। तमाम देशों और यूरोपीय संघ से तिरस्कृत इजराइल ऐसे में लोकल नॉर्थ कोरिया जैसा अलग-थलग देश बन सकता है। तब उसे अहसास हो सकता है कि उसके और अमेरिका के संबंध समान हितों पर नहीं टिके थे। अमेरिका उसे एकतरफा समर्थन देता रहा, गाजा और लेबनान में युद्ध में, सेटलमेंट के विस्तार और कई बार अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघनों पर उसने किंचित आलोचना के बावजूद पैसे, हथियार वगैरह शायद बंधुआ रिश्ते के तहत देता था।

संजय श्रीवास्तव
संजय श्रीवास्तव

ट्रंप की नीति हमेशा ही सहयोगियों को नजरअंदाज करने की रही है। अगर अमेरिका का समर्थन खत्म हो जाए तो 80 फीसदी अमेरिकी हथियार पर निर्भर उसकी सेना को न हथियार मिलेंगे न सरकार को मोटी आर्थिक सहायता न ही संयुक्त राष्ट्र में वीटो का सहारा। ऐसी स्थिति में इजराइल को अपनी नीतियां बदलनी ही पड़ेंगी। उसको चुनना होगा कि वह या तो सब झेलकर अमेरिका के रहमो-करम पर रहने वाला राष्ट्र बना रहे या आत्मनिर्भर जिम्मेदार देश बने अथवा सबसे कटा हुआ एक अस्तित्वहीन सा देश। इजराइल को इस आत्म विवेचन तथा सुधार पथ के चयन की पहली शर्त है अमेरिका का समर्थन खत्म होना। पर तमाम वजहों के बावजूद अमेरिका और इजराइल संबंध टूटना संभव नहीं लगता। संबंधों में तनाव तो बढ़ेगा पर विच्छेद तक नहीं पहुंचेगा,रणनीतिक संबंध बनाए रखना मजबूरी होगी। ऐसे में आत्मनिर्भर नए इजराइल का जन्मना मुश्किल है।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button