जब डगमगाती है महिला सशक्तिकरण की भाषा

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(जो सशक्तिकरण इस बात को समस्या नहीं मानता कि घर में पहले कौन खाना खाये, वह सशक्तिकरण बिना शर्त नहीं है। अगर समता, जैसा कि मेहता कहते हैं, सामाजिक विश्वास है, तो विश्वास वहां से आरंभ होना चाहिए जहां श्रम को सबसे ज़्यादा फॉर ग्रांटेड लिया जाता है, तालाब में नहीं, खाने की मेज़ पर।)

सुबह के पांच बजे है, नेहा पूरी तरह से जाग चुकी है। छह बजे तक घर की सफाई हो चुकी है, फर्श पर पोंछा लगा दिया गया है और सबके लिए नाश्ता तैयार कर दिया गया है। आठ बजे से लकड़ियों पर धीमे-धीमे लंच तैयार करना आरंभ हो गया, तीन या चार डिश, गैस सिलिंडर का इस्तेमाल मेहमानों के आने तक स्थगित कर दिया गया है।

स्नान व पूजा करने और सबको नाश्ता परोसने व टिफन देने के बाद 9:30 बजे नेहा स्वयं खाने बैठती है। घड़ी की तरह नेहा को भी इस व्यवस्था से कोई शिकायत नहीं है। वह इसे नियम कहती है, जिसका पालन होना ही चाहिए। नेहा वह महिला नहीं है जिस पर आमतौर से हमें तरस करना सिखाया जाता है। हर समकालीन नीतिगत पैमाने पर वह सशक्त महिला है।

पिछले दस वर्षों से वह उस सेल्फ-हेल्प समूह का हिस्सा है जिससे उसकी पहुंच आवर्ती कोष- छोटे ऋण, कम ब्याज, कोई ऋणदाता नहीं तक हो जाती है। तीन साल पहले वह जल जीवन हरियाली प्रोजेक्ट की लाभार्थी भी बनी, जिसके तहत बिहार सरकार ने उसे व छह अन्य महिलाओं को पांच साल तक बिना किसी किराए के एक तालाब पर क़ानूनी अधिकार भी दिये थे।

महिला सशक्तिकरण: मछली पालन से घर और समाज में बढ़ी इज़्ज़त

इसके तहत वे सभी महिलाएं मछली पालन करती हैं, उन्हें बाज़ार में बेचती हैं और आय को अपने मछली उत्पादन समूह के खाते में जमा कर देती हैं, जिसका नाम शक्ति जीविका महिला फिश प्रोड्यूसर ग्रुप है। उन्हें अपना हिस्सा मिल जाता है। नेहा अति गर्व से कहती है, जैसा कि उसे कहना भी चाहिए कि अब उसके घर में उसकी अधिक इज़्ज़त है। वह उन शहरों के नाम बताती है जिनमें वह अपने आधिकारिक कार्य के लिए अपने गांव से बाहर गई है।

वह अपने सम्पर्कों व नेटवर्क के बारे में बढ़-चढ़कर बताती है, जो उसने महिलाओं के साथ बनाये हैं और किस तरह से उसके पास सभी जानकारियां हैं। वह अपने बच्चों की शिक्षा व कोचिंग का खर्च उठाती है और परिवार के फैसलों में अब उसकी राय भी ली जाती है। इसके बावजूद वह सबके बाद में खाना खाती है। भारत में सशक्तिकरण पर यहीं विराम लग जाता है।

यह इसी बात की कहानी है। पिछले दिनों मैं एक अख़बार में प्रताप भानु मेहता का एक लेख पढ़ रही थी, जिसमें उनकी बहस यह थी कि समता केवल नैतिक महत्वाकांक्षा नहीं है बल्कि संरचनात्मक आवश्यकता है। उनके अनुसार, अत्यधिक ग़ैर-बराबरी सामाजिक विश्वास को खोखला कर देती है, विकास को कमज़ोर करती है, विशेषाधिकार की घेराबंदी करती है और अभावों को पुन उत्पन्न करती है।

सशक्तिकरण की सीमाएँ: घर में सम्मान और निर्णय में असमानता

पूंजी केवल प्रतिभा को ही पुरस्कृत नहीं करती है बल्कि ऐतिहासिक बहिष्करण को भी प्रतिबिम्बित करती है। नेहा का जीवन अनुभव, पहली नज़र में, मेहता की बात की पुष्टि करता हुआ प्रतीत होता है। एक बार जब पूंजी मिल जाती है, तो उसके जीवन के हालात में नाटकीय परिवर्तन आ जाता है। स्थिर आय के कारण उसका परिवार उसे गंभीरता से लेने लगता है।

लेकिन निर्णयों के संदर्भ में सलाह लेने का अर्थ यह नहीं है कि निर्णय लेने का अधिकार भी हासिल हो गया है। घर में पैसे लाने का अर्थ यह नहीं है कि उसे अपनी मर्जी से खर्च करने का ह़क भी मिल गया है। ये दोनों अलग अलग बातें हैं; क्योंकि जब नेहा घर का सारा कामकाज और पूरे परिवार के लिए खाना बना देती है, तब भी वह अंत में ही खाती है।

उसकी कहानी से जो ज़ाहिर होता है वह मेहता के तर्कों का विरोधाभास नहीं है बल्कि उनकी सीमाओं को व्यक्त करना है। पूंजी का पुनवितरण निश्चित रूप से महिलाओं के बाज़ार व राज्य से संबंधों को बदल सकते हैं, लेकिन इससे घर में उनके संबंध अपने आप नहीं बदल सकते। भोजन यहां आकस्मिक नहीं है।

घर में भोजन का क्रम बताता है कि सशक्तिकरण भी सीमित हो सकता है

फेमिनिस्ट स्कॉलर लम्बे समय से यह बहस करते आये हैं कि घरों के अंदर भोजन का वितरण पदाम की सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति में से एक है। जब नेहा से यह मालूम किया गया कि क्या वह इस बात से परेशान होती है कि उसे सबसे अंत में खाना खाने का अवसर मिलता है, तो उसके जवाब में असमंजस था और उसने सिर्फ इतना कहा, यही नियम है।

नियम को इतना अधिक प्राकृतिक कर दिया गया है कि उस पर कोई सवाल नहीं किया जाता और न ही उसे संशोधन के लायक समझा जाता है। यहीं पर सशक्तिकरण की भाषा डगमगाने लगती है। नीति निर्माताओं के लिए नेहा की ज़िंदगी सफलता की कहानी है, अर्थशास्त्रियों के लिए।

यह एसेट्स के मालिकाना अधिकारों की वापसी को प्रदर्शित करती है। लेकिन फेमिनिस्ट के लिए इससे असहज प्रश्न उठते हैं। किस किस्म का सशक्तिकरण घर के पदाम को स्पर्श नहीं करता? उत्तर योजनाओं को ख़ारिज करने में नहीं है। नेहा स्वयं कहती है कि उसका जीवन बेहतर हो गया है। मेरा कहना सिर्फ इतना सा है कि हमें इस बात का सामान्यीकरण नहीं करना चाहिए यही सुधार अंतिम आज़ादी है।

अंतरा पटेल

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