जब बारात को पिलाया जाता था गंगाजल
(धर्म संस्कृति)
मां गंगा और गंगाजल का भारत में विशेष महत्व है। जन्म से मृत्यु पर्यंत प्रत्येक संस्कार और पूजा-पाठ में नित्य प्रति गंगाजल का प्रयोग चरणामृत के रूप में करना दैनिकचर्या में शामिल है। यहाँ एक समय ऐसा भी था, जब विवाह के अवसर पर गंगाजल पिलाया जाना शान की बात थी। फ्रांसीसी यात्री टैवर्नियर ने अपने यात्रा संस्मरण में लिखा है कि उन दिनों हिंदुओं में विवाह के अवसर पर भोजन के पश्चात अतिथियों को पिलाने के लिए दूर से गंगाजल मंगवाया जाता था।
जो जितना अमीर होता था, उतना ही अधिक गंगाजल पिलाता था। दूर से गंगाजल मंगाने में खर्च भी बहुत पड़ता था। वह आगे लिखता है कि शादियों में गंगाजल की व्यवस्था के लिए कभी-कभी तो दो-तीन हजार रुपये तक खर्च किए जाते थे। अंदाजा लगाया जा सकता है कि लगभग 650 वर्ष पूर्व दो-तीन हजार रुपये मात्र गंगाजल की व्यवस्था करने में खर्च करना सामान्य जन के बस की तो बात नहीं होगी।
समाज के धनी व शासक वर्ग में ही यह चलन रहा होगा, किंतु टैवर्नियर ने यह चलन था शब्द का प्रयोग किया यानी यह सामान्य बात थी, तो तब का समाज कितना धनी व समृद्ध था! शायद गंगाजल के प्रति श्रद्धा ही इसके मूल में थी। विद्वान पं. गंगाशंकर मिश्र ने अपने आलेख श्रीगंगा और यमुना का जल में उल्लेख किया है कि पेशवाओं के लिए बहंगियों या कावड़ों से गंगाजल पूना भेजा जाता था।
गंगाजल: श्रद्धा, शुद्धता और संरक्षण की परंपरा
मराठी पुस्तक पेशावईच्या सवालीत (पूना 1937) से पता लगता है कि काशी से पूना ले जाने के लिए एक बहंगी गंगाजल का खर्च 20 रुपये पड़ता था, जिसे बहुत नहीं माना जा सकता। गढ़मुत्तेश्वर व हरिद्वार से भी पेशवाओं के लिए जल भेजा जाता था। श्री मिश्रा ने लिखा है कि गंगाजल की महिमा बहुत है। बाजीराव पेशवा को किसी विद्वान ने बताया था कि गंगाजल के सेवन से वे ऋण-मुक्त हो जाएंगे।
मृतप्राय व्यक्ति को गंगाजल पिलाने का प्रचलन दक्षिण भारत में भी है। विजयनगर के महाराज श्रीकृष्ण राय सन् 1525 में मृतप्राय थे तो उन्हें गंगाजल दिया गया, जिससे वे ठीक हो गये। हिंदुओं के प्रिय जलतीर्थ आलेख में श्री बैकुण्ठनाथ महरोत्रा लिखते हैं- कदाचित् भगवती भागीरथी ऐसी शिलाओं से बहती है कि उनके विकृत जल में भी कभी कृमि नहीं पड़ते। गंगा में स्नान करने वालों का वर्ण भस्मावलेपित भगवान शंकर के शरीर-सा गौर हो जाता है।
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गुलाम हुसैन ने अपने बंगाल के इतिहास रियाजु-स-सलमीन में लिखा है कि मधुरता, स्वाद और हल्केपन में गंगाजल के बराबर कोई दूसरा जल नहीं है। बहुत दिन तक रखने पर भी यह बिगड़ता नहीं। यही है गंगाजल की विशेषता। अमृत तुल्य है गंगाजल। एक गीत के बोल हैं- गंगा तेरा पानी अमृत, झर-झर बहता जाए। इस अविरल बहते गंगाजल अमृत की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए इसे हमें गंदा होने, अपवित्र होने, प्रदूषित होने से बचाना होगा। गंगाजल की स्वच्छता बनाये रखने में योगदान करना होगा। जय मां गंगे!
–अनिल शर्मा अनिल
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