जब होली सीक्वेंस ने दिया फिल्म की कहानी को नया मोड़

हिन्दी फिल्मों के इतिहास में ऐसे बहुत ही कम वर्ष हैं कि जिस साल कोई न कोई हिट गीत होली पर न आया हो। हिन्दी फिल्मों में होली के गीत देने का ट्रेंड महबूब खान की फिल्म औरत (1940) से शुरू हुआ, जिसमें होली के एक नहीं, बल्कि दो गीत थे। पहला गीत था जमुना तट श्याम खेले होरी और दूसरा था आज होली खेलेंगे साजन के संग। दरअसल, फिल्मों में इन गीतों का इस्तेमाल न सिर्फ होली के रंगों व मस्ती का प्रस्तुतिकरण है, बल्कि प्रेम व्यक्त करने का अवसर भी।

इसलिए बहुत-सी फिल्मों की कहानियों का ताना-बाना होली के इर्दगिर्द बुना गया और होली के सीक्वेंस से फिल्म की कहानी को निर्णायक मोड़ दिया गया। हालांकि, आधुनिक फिल्मों में अब होली की सिचुएशंस व गाने काफी कम बल्कि न के बराबर हो गए हैं। लेकिन लोग होली पर इतने गाने बना चुके हैं कि इस त्यौहार पर हमारी गीतों भरी मस्ती में कोई कमी नहीं आती। साथ ही होली सीक्वेंस से जो कहानी को नया मोड़ दिया जाता है वह भी दिलचस्प है।

यहां जगह के अभाव में ऐसी सभी फिल्मों का प़ा संभव नहीं है, लेकिन मिसाल के तौर पर उन चंद फिल्मों के बारे में बताना आवश्यक है, जिनमें सुंदरता के साथ होली और उसकी विविध संभावनाओं के मूल को कैद किया गया है। यश चोपड़ा की फिल्म सिलसिला में होली का बहुत ही प्यारा सीन है और चर्चित गीत रंग बरसे भी है, जो कहानी को महत्वपूर्ण मोड़ देने में अहम भूमिका अदा करता है।

बॉलीवुड में भावनाओं और कथानक को आगे बढ़ाने का माध्यम

जैसे ही होली की तरंग सिर चढ़कर बोलती है वैसे ही अमित (अमिताभ बच्चन) और चांदनी (रेखा) अपनी शर्म, संकोच व एहतियात को भूल जाते हैं। उनका एक-दूसरे के लिए प्रेम जग ज़ाहिर हो जाता है और अमित की पत्नी शोभा (जया बच्चन) और चांदनी का पति डॉ. आनंद (संजीव कुमार) असहाय इस प्रेम लीला को देखते रहते हैं। यहीं से फिल्म के किरदारों में तनाव उत्पन्न होने लगता है। यश चोपड़ा की ही फिल्म डर में शाहरुख़ खान के चरित्र को दिखाया गया है कि वह होली के अवसर पर रंगों से अपना मुंह छुपाकर जूही चावला के घर में प्रवेश करता है और स्टाल्कर प्लाट को अधिक गहरा कर देता है।

इसी प्रकार फिल्म वॉटर में मोहे श्याम रंग रंग दे वाराणसी की पीड़ित विधवाओं को प्रतीकात्मक स्वतंत्रता प्रदान करता है और वह रंग व आनंद का अनुभव कर पाती हैं। होली कब है? यह शब्द सुनते ही बॉलीवुड की आइकोनिक फिल्म शोले की याद आ जाती है, जिसमें इस डायलॉग को गब्बर सिंह (अमजद खान) ने बोला था, ताकि वह होली के अवसर पर रामगढ़ पर हमला कर सके। इस तरह कहानी को दिशा देने के लिए फिल्म में होली की उमंग व पृष्ठभूमि का प्रयोग किया गया।

होली : फिल्मों में प्रेम और विद्रोह का रंगीन अवसर

यही नहीं, रंगों का यह उत्सव वीरू (धर्मेंद्र) व बसंती (हेमा मालनी) के बीच प्रेम की पींगें बढ़ाने के लिए भी किया गया और इस अवसर पर जो गीत (होली के दिन खिल जाते हैं) गाया गया वह तो होली प्लेलिस्ट का नियमित हिस्सा बन गया है। फिल्म मोहबतें में होली उत्प्रेरक का काम करती है, जिससे सामाजिक रीति-रिवाजों पर प्रेम को विजय हासिल करने का अवसर मिल जाता है। विद्रोही राज आर्यन मल्होत्रा (शाहरुख़ खान) एहतियात को ताक पर रखकर अपने छात्रों को होली का जश्न मनाने के लिए ले जाता है।

युवा छात्र नाचते गाते हुए प्रेम में गिरफ्तार हो जाते हैं और यह बात परम्परा का सख्ती से पालन करने वाले गुरुकुल के प्रधानाचार्य नारायण शंकर (अमिताभ बच्चन) को पसंद नहीं आती है। लेकिन तब तक होली की वजह से गुरुकुल में विद्रोह का बिगुल बज चुका होता है। गोलियों की रासलीला राम-लीला फिल्म ने साबित किया है कि प्रेम में पड़ने के लिए होली से बढ़कर कोई अवसर नहीं है। जब राम (रणवीर सिंह) और लीला (दीपिका पादुकोण) रंगों के बादलों में फ्लर्ट करते हैं, तो उनमें प्यार के फूलों को खिलने का अवसर मिल जाता है। लहू मुंह लग गया की धुन न केवल होंठों पर मुस्कान ले आती है, बल्कि पैरों को थिरकने के लिए भी प्रेरित करती है।

-कैलाश सिंह

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button