संकट में कौन आता है याद

‘मैं तो नास्तिक हूँ’, ‘मैं कोई भगवान को नहीं मानता हूँ’, मैं ऊर्जा के किसी उच्च स्रोत में विश्वास रखता हूँ’, ‘मैं जरा भी धार्मिक वृत्ति का नहीं हूँ’ आदि बातें हम अक्सर आधुनिक समाज में तर्कसंगत लोगों के मुख से सुनते हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से यही तर्क-संगत लोग सारे दिन सैकड़ों बार ‘ओह माय गॉड’, ‘हे भगवान’, ‘भगवान के लिए’ जैसे शब्द कहते हैं। यही हमारे समाज की बुनियादी हकीकत हैं, किन्तु बावजूद इसके हममें से अधिकांश लोग अपने गुरूरवश यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि हम प्रति दिन उस सर्वशक्तिमान को याद करते हैं।

भला ऐसा भी क्या अभिमान है, जो एक सरल बात को भी हम स्वीकार नहीं करते ? यदि हम अपने चित्त की गहराई में जाकर देखें तो पता चलेगा कि वास्तव में हम सभी संकट की घड़ी में किसी न किसी प्रकार के संरक्षण की तलाश में बड़े आक्रामक रूप से लग जाते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यह तो मनुष्य के स्वभाव की खासियत है कि जब कभी भी वो अपने आप को प्रतिकूल परिस्थिति में पाता है, तब उसका सुरक्षा-तंत्र बड़ी तेजी से काम करना शुरू करता है और ऐसे वक्त हमारी आँखें अपने आप ही आकाश की ओर देखने लगती हैं और हमारे हाथ अपने आप ही प्रार्थना की मुद्रा में जुड़ जाते हैं मानो जैसे हम उस सर्वोच्च शक्तिमान से मदद की गुहार कर रहे हैं।

प्रार्थना की मुद्रा और मानसिक शांति का वैज्ञानिक पक्ष

अनेक वर्षों में किये कई अनुसंधान के माध्यम से यह एक तथ्य सामने आया है कि कोई भी मनुष्य, चाहे वह नास्तिक हो या धार्मिक हरेक को प्रार्थना करने की मुद्रा में बिठाया जाता है, तब उन्हें बड़ी शांति और सुकून मिलता है, क्योंकि उन्हें तब ऐसा महसूस होता है मानो वे सर्वोच्च शक्तिमान परमात्मा की छत्रछाया में सुरक्षित बैठे हैं। अब असलियत यह है, तो फिर इससे इंकार करने की वजह क्या है? क्या यह हमारे भीतर अहसास की कोई कमी है या फिर साथियों का अनुसरण करने का कोई दबाव ?

यह भी पढ़े: मृत्यु से नजरें न चुरायें

-राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज

आजकल खुद को नास्तिक कहलाना स्टेटमेंट बन गया है, इसलिए अधिकांश युवा अपने घर पर माता-पिता के दबाव में पूजा-पाठ कर लेते हैं, लेकिन घर से बाहर निकलते ही नास्तिक बनने का मुखौटा पहन लेते हैं। कारण चाहे कितने भी क्यों न हों, परंतु हकीकत तो यही है कि हम चाहें या ना चाहें, ईश्वर से हम अलग नहीं हो सकते हैं। इसलिए यह निरर्थक है, जब कोई यह कहता है कि ‘मैं उस सर्वशक्तिमान को नहीं मानता हूँ।’ यदि ऐसा है, तो फिर ‘हे भगवान’ या ‘ओह माय गॉड’ कहने की क्या दरकार ?

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button