डॉलर के विरुद्ध रुपये के गिरने पर हम आसमान सिर पर क्यों उठा लेते हैं?

रुपये का गिरना हमेशा बुरा नहीं होता और न ही यह देश की आर्थिक संरचना पर निर्भर करता है। यह बाजार की तात्कालिक स्थितियों का नतीजा होता है। इसलिए रुपये के गिरते ही अगर विपक्षी दल सरकार को घेरकर जिरह करने की कोशिश में लग जाएं, तो समझना यह महज राजनीति है। क्योंकि विपक्षी दल रुपया गिरने पर मौजूदा सरकार को कटघरे में खड़ा कर देता है। वह जानता है कि देश के लोग नहीं जानते कि रुपया गिरने का मतलब आर्थिक रूप से कमजोर होना नहीं है। यह सिर्फ बाजार की तात्कालिक परिस्थितियों का नतीजा है। मगर राजनीति को इसीलिए संभावनाओं का विज्ञान कहते हैं, क्योंकि वह हर नकारात्मक स्थिति में भी सकारात्मक मौके ढूंढ़ लेती है और सकारात्मकता के माहौल में भी नकारात्मकता की चादर चढ़ा देती है। यही कारण है कि जब रुपये की डॉलर के विरूद्ध गिरावट की खबर आती है तो यह सिर्फ खबरभर नहीं होती। यह एक संदेश होता है कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में देश कमजोर हो रहा है। क्योंकि रुपया गिरना देश की नजरों में कमजोरी का कारण है और देश के लोगों को यह समझ विपक्षी राजनेताओं ने ही दी है।

रुपया-डॉलर एक्सचेंज रेट में जब रुपया-डॉलर के विरुद्ध कमजोर होता है, तो यह सुनते ही हम ऐसी हाय तौबा क्यों मचाने लगते हैं, मानो रुपये के कमजोर होने से हम पर आसमान टूट पड़ा हो। जैसे ही रुपया-डॉलर के विरुद्ध थोड़ा कमजोर हुआ कि सुर्खियां आने लगती हैं, मानो अखाड़े में कुश्ती हो रही हो और मजबूत डॉलर से कमजोर रुपया हारकर मुंह छिपा रहा हो। दरअसल मुद्राओं के एक्सचेंज रेट के उतार-चढ़ाव को इस तरह से देखना समझदारी नहीं, नासमझी होती है।

वास्तव में एक्सचेंज रेट वह कीमत होती है, जिस पर एक मुद्रा, दूसरी मुद्रा से बदली जाती है। मसलन 3 दिसंबर 2025 को अमरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया, 90 रुपये 15 पैसे का हो गया और देश के ज्यादातर अखबारों ने यही हेडिंग लगाया कि रुपया-डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक धरातल पर। यही नहीं मीडिया विशेषज्ञों ने सरकार को चेतावनी दी कि वह जल्द से जल्द कुछ करे, जबकि देखने वाली बात यह है कि भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी.अनंत नागेश्वर ने कहा, सरकार को इस गिरावट की कोई चिंता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा अगले साल तक रुपये में सुधार की उम्मीद है।

रुपये की गिरावट आर्थिक कमजोरी नहीं, सिर्फ एक्सचेंज रेट असर

सवाल है यह एक समय पर इतनी दो विरोधाभासी बातें क्यों सुनाई पड़ रही है? एक तरफ जहां समूचा विपक्ष और कुछ तथाकथित मीडिया विशेषज्ञ रुपये की डॉलर के विरूद्ध ऐतिहासिक गिरावट को मोदी सरकार की घोर नाकामी करार दे रही हैं, वहीं सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार इसकी परवाह ही नहीं कर रहे। आखिर माजरा क्या है? दरअसल डॉलर या किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के विरुद्ध हम रुपये के कमजोर होने पर भले हाय-तौबा मचाते हों, पर इसका मतलब यह नहीं होता कि रुपया उन मुद्राओं के सामने ढह गया, कमजोर हो गया।

दरअसल जब रुपया कमजोर होता है, तो हमारे सामने कुछ आर्थिक परेशानियां तो आती हैं, लेकिन उनकी वजह रुपये के कमजोर होने के कारण नहीं होती, रुपये के एक्सचेंज रेट में आयी कमी के कारण होती हैं और यह कमी आमतौर पर डॉलर के विरुद्ध हमारे लिए कुछ मुश्किलें खड़ी करती हैं, क्योंकि हम अपना ज्यादातर विदेशी व्यापार अमेरिकी डॉलर के जरिये करते हैं।

इसलिए जब रुपये के विरुद्ध डॉलर चढ़ जाता है यानी मजबूत हो जाता है तो हमारे आयात उसी अनुपात में महंगे हो जाते हैं। अब चूंकि हम बड़े पैमाने पर कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक, मशीनें, दवाओं का कच्चा पदार्थ और उर्वरक आदि का आयात करते हैं। इस कारण ये आयात महंगे हो जाते हैं। देश में पेट्रोल, डीजल के भाव बढ़ जाते हैं। मोबाइल, लैपटॉप और टीवी जैसी चीजें जो आमतौर पर आयातित होती हैं, वे महंगी हो जाती हैं।

रुपये की गिरावट आर्थिक कमजोरी नहीं, सिर्फ डॉलर का उतार-चढ़ाव

सरकार ने जो विदेशों से डॉलर की वैल्यू पर कर्ज लिया होता है, उस कर्ज का आकार थोड़ा बढ़ जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि रुपया पूरी दुनिया में कमजोर हो गया। ठीक उसी समय दुनिया की कई मुद्राओं के विरुद्ध न सिर्फ रुपया मजबूत होता है बल्कि कईयों के विरुद्ध तो उस समय भी मजबूत होता है, जब डॉलर के खिलाफ यह कमजोर हो रहा होता है।

दरअसल समझने वाली बात यह है कि रुपये के डॉलर के खिलाफ कमजोर होने का मतलब सीधे-सीधे रुपये की कीमत या हमारी आर्थिक शक्ति से नहीं होता बल्कि इसका मतलब सिर्फ डॉलर के सामने रुपये के उतार-चढ़ाव के कारण होता है और हमेशा इसका हमें नुकसान ही नहीं होता कई बार अच्छा खासा फायदा भी होता है। मसलन रुपये के डॉलर के विरुद्ध कमजोर होने से हमें इन क्षेत्रों में फायदा मिलता है।

भारत की निर्यात कंपनियों का फायदा बढ़ जाता है। इसके साथ ही विदेशों से भेजा जाने वाला पैसा यानी रिमिटेंस भी बढ़ जाता है। लाखों की तादाद में भारतीय अमेरिका, खाड़ी देशों और यूरोप आदि में रहते हैं, जो नियमित तौरपर भारत में रह रहे अपने परिजनों को वहां से पैसे भेजते हैं। जब रुपये की कीमत डॉलर के विरूद्ध घटती है तो ऐसे विदेश गये भारतीयों द्वारा अपने घरों को भेजी गई धनराशि बढ़ जाती है।

एक्सचेंज रेट में उतार-चढ़ाव—कुछ को लाभ, कुछ को नुकसान

यही नहीं उस दौरान जो विदेशी पर्यटक भारत घूमने आये होते हैं, उनकी भी मौज लग जाती है। क्योंकि वो जितने पैसे लेकर घूमने आये होते हैं, वो पैसे अचानक बढ़ जाते हैं, जिसका मतलब होता है कि और ज्यादा खरीदारी कर सकते हैं और मजे कर सकते हैं। यही नहीं जो विदेशी भारत पर निवेश करते हैं, उन्हें भी रुपये के गिरने का जबर्दस्त फायदा होता है। वो 100 रुपये का निवेश करते हैं तो 110 या 120 रुपया माना जाता हैं।

लेकिन रुपये के डॉलर के विरूद्ध गिरने से जिनको नुकसान होता है, उसमें सबसे पहले तो भारत में बड़े पैमाने पर किये जाने वाले आयातों की कीमत हमें तय कीमत से ज्यादा चुकानी होती है। इसी तरह विदेश में जो भारतीय छात्र पढ़ने गये होते हैं, उनकी पढ़ाई की कीमत बढ़ जाती है क्योंकि रुपया कमजोर होने से उनकी फीस, किराये का उनका आवास और खाने पर खर्च किये जाने वाले पैसे बढ़ जाते हैं।

इससे सरकार पर जो विदेशी कर्ज होता है, उसकी कीमत भी बढ़ जाती है। इसलिए जहां डॉलर के विरूद्ध रुपये के कमजोर होने से कई लोगों को चिंताएं होती हैं, कई लोगों की समस्याएं बढ़ जाती हैं, तो वहीं कई लोगों को फायदा होता है और उनकी इनकम भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है। इसलिए अगर इस समूची प्रक्रिया को एक्सचेंज रेट के आईने में देखें तो इससे कुछ को फायदा होता है, कुछ का नुकसान।

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दुनिया की हर मुद्रा की तरह रुपया भी कभी ऊपर, कभी नीचे

ऐसे में रुपया गिरते ही बड़ी संख्या में जो भारतीय हाय-तौबा मचाने लगते हैं और जो विपक्षीय राजनीतिक दल सरकार से असफलता के नाम पर इस्तीफा मांगने लगते हैं, वे या तो इस बात को समझते नहीं कि इसका कमजोरी या मजबूती से कोई रिश्ता नहीं है या फिर वो इतने शातिर होते हैं कि इस भय के मनोविज्ञान को कि भारत की करंसी यानी रुपया गिर रहा है, का हल्ला मचाकर सरकार के विरूद्ध हवा बनाने की कोशिश करते हैं।

जबकि हकीकत यह है कि दुनिया की कोई ऐसी मुद्रा नहीं है, जो कुछ-कुछ समय बाद गिरती या उठती न रहती हो। लगभग सभी मुद्राएं कभी मजबूत हो जाती हैं, कभी कमजोर हो जाती हैं। इसलिए उन्हें इनकी निजी कमी के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा संसार है जहां कोई कभी तो कोई कभी ऊपर या नीचे होती रहती हैं। मसलन 2020-22 में जब रुपया डॉलर के विरूद्ध कमजोर हुआ तो देश के आईटी सेक्टर, फार्मा, टेस्टाइल आदि क्षेत्रों में एक्सपोर्ट के जरिये रिकॉर्ड कमाई की।

यही कारण है कि कोरोना के समय हमारी जीडीपी में जबर्दस्त रिकवरी देखी गई। साथ ही 2023-24 में भारत चीन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्यातक इसलिए बना, क्योंकि रुपये की कीमत डॉलर के विरूद्ध कम हो गई थी। कुल जमा सरल निष्कर्ष यह है कि इससे बहुत ब्लैक एंड व्हाइट निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। अगर रुपया कमजोर होने से हमारे आयात महंगे होते हैं, महंगाई बढ़ने की आशंका बनती है, तो निर्यातकों को फायदा होता है। विदेश कमाने गये लोगों के घरवालों को उनके परिजनों द्वारा भेजे गये पैसे ज्यादा बढ़कर उन्हें मिलते हैं और देश में पर्यटकों की संख्या बढ़ जाती है।

एक्सचेंज रेट को आर्थिक कमजोरी की तरह देखने की भूल

लब्बोलुआब यह है कि रुपये का गिरना हमेशा बुरा नहीं होता और न ही यह देश की आर्थिक संरचना पर निर्भर करता है। यह बाजार की तात्कालिक स्थितियों का नतीजा होता है। इसलिए रुपये के गिरते ही अगर विपक्षी दल सरकार को घेरकर जिरह करने की कोशिश में लग जाएं, तो समझना यह महज राजनीति है। क्योंकि विपक्षी दल रुपया गिरने पर मौजूदा सरकार को कटघरे में खड़ा कर देता है।

-लोकमित्र गौतम
-लोकमित्र गौतम

वह जानता है कि देश के लोग नहीं जानते कि रुपया गिरने का मतलब आर्थिक रूप से कमजोर होना नहीं है। यह सिर्फ बाजार की तात्कालिक परिस्थितियों का नतीजा है। मगर राजनीति को इसीलिए संभावनाओं का विज्ञान कहते हैं, क्योंकि वह हर नकारात्मक स्थिति में भी सकारात्मक मौके ढूंढ़ लेती है और सकारात्मकता के माहौल में भी नकारात्मकता की चादर चढ़ा देती है। यही कारण है कि जब रुपये की डॉलर के विरूद्ध गिरावट की खबर आती है तो यह सिर्फ खबरभर नहीं होती। यह एक संदेश होता है कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में देश कमजोर हो रहा है। क्योंकि रुपया गिरना देश की नजरों में कमजोरी का कारण है और देश के लोगों को यह समझ विपक्षी राजनेताओं ने ही दी है।

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