क्यों जल्द नाकाम हो जाते हैं लिव-इन रिश्ते? इलाहाबाद H.C का बड़ा फैसला

प्रयागराज: युवाओं में लिव-इन रिलेशनशिप अपनाने की बढ़ती प्रवृत्ति “पश्चिमी विचारों” से प्रभावित है और ऐसे संबंध टूटने पर अक्सर दुष्कर्म के आरोपों के साथ एफआईआर दर्ज कराई जाती हैं। यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस मामले में की, जिसमें एक व्यक्ति को अपहरण और यौन उत्पीड़न के आरोप में दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया गया।

न्यायालय ने पाया कि पीड़िता घटना के समय बालिग थी और उसने सहमति से संबंध बनाए थे। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा की खंडपीठ ने चंद्रेश नामक व्यक्ति द्वारा दायर आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया।

अदालत ने कहा कि वर्तमान कानून महिलाओं के पक्ष में हैं और पुरुषों को उन कानूनों के आधार पर दोषी ठहराया जा रहा है, जो उस समय बनाए गए थे जब लिव-इन संबंधों की अवधारणा अस्तित्व में ही नहीं थी।

संबंध टूटने पर दर्ज होती हैं एफआईआर

खंडपीठ ने कहा कि जब इस प्रकार के संबंध विफल हो जाते हैं, तो अक्सर दुष्कर्म के आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई जाती है। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में साक्ष्यों की सावधानीपूर्वक जांच आवश्यक है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने शिकायतकर्ता की नाबालिग बेटी को शादी का झांसा देकर बहला-फुसलाकर बेंगलुरु ले गया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 (अपहरण), 366 (विवाह के लिए अपहरण), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 (गंभीर लैंगिक अपराध) और एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(2)(V) के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट का रुख किया।

पीड़िता की उम्र को लेकर ट्रायल कोर्ट से हुई चूक

मामले के रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि घटना के समय पीड़िता बालिग थी। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने ऑसिफिकेशन टेस्ट रिपोर्ट पर सही ढंग से विचार नहीं किया, जिससे पीड़िता की उम्र लगभग 20 वर्ष प्रमाणित होती है।

खंडपीठ ने पीड़िता की मां की गवाही में भी विरोधाभासों की ओर इशारा किया। एफआईआर में जहां लड़की की उम्र 18 वर्ष 6 माह बताई गई थी, वहीं अदालत में बयान के दौरान मां ने उसकी उम्र 17 वर्ष बताई, जिसे अदालत ने “कानूनी सलाह” का परिणाम बताया।

सहमति से संबंध और स्वेच्छा से साथ जाना

हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता आरोपी के साथ सरकारी बस और ट्रेन से सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करते हुए गोरखपुर और फिर बेंगलुरु गई, और इस दौरान उसने कोई शोर नहीं मचाया। अदालत ने कहा कि वह बेंगलुरु में छह महीने तक अन्य मकानों से घिरी बस्ती में आरोपी के साथ रही और सहमति से शारीरिक संबंध बनाए।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पीड़िता ने 6 अगस्त 2021 को शिकारपुर क्रॉसिंग पर आरोपी द्वारा छोड़े जाने के बाद ही अपने परिवार से संपर्क किया।

अपहरण और दुष्कर्म की सजा ‘अनुचित’ करार

हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि पीड़िता बालिग थी और अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी, इसलिए अपहरण और बहला-फुसलाकर ले जाने की सजा “पूरी तरह से अनुचित” है।

दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम के तहत दी गई सजा पर भी अदालत ने कहा कि पीड़िता बालिग थी और आरोपी के साथ सहमति से संबंध में थी, इसलिए ट्रायल कोर्ट का फैसला न्यायोचित नहीं है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषसिद्धि भी उचित नहीं है, क्योंकि दोनों के बीच सहमति से संबंध थे।

8 जनवरी को दिए गए अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया। इसके चलते अदालत ने आरोपी की दोषसिद्धि को रद्द करते हुए उसकी अपील स्वीकार कर ली।

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