डोनल्ड ट्रंप को गुस्सा क्यों आता है ?

अठ्ठाईस फरवरी, 2026 को ईरान के साथ अमेरिका-इजराइल का युद्ध शुरू हुआ, तो दुनिया ने सोचा कि यह ट्रंप 2.0 का कमाल है। लेकिन एक महीना बीतते-न-बीतते दुनिया ने देखा कि राष्ट्रपति ट्रंप का सबसे बड़ा दुश्मन ईरान नहीं, बल्कि उनका अपना गुस्सा है और यह गुस्सा अब सबसे ज्यादा उन सहयोगियों पर उतर रहा है, जिन्हें उन्होंने खुद महानतम मित्र कहा था। (यह बात अलग है कि महाबली ट्रंप कब किसे क्या कह डालें, शायद खुद भी नहीं जानते!)

सबसे पहले 16-17 मार्च को ट्रंप का गुस्सा फूट पड़ा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से खोलने के लिए नाटो से मदद माँगी। जवाब मिला – नहीं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिख दिया, वी डू नॉट नीड द हेल्प ऑफ एनीवन! नाटो को कागजी शेर और कायर घोषित दे दिया। सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने माना कि उन्होंने ट्रंप को कभी इतना नाराज़ नहीं देखा। नतीजा? अमेरिका ने अकेले ही ईरान को तबाह करने का ऐलान कर दिया। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल रही है, लेकिन ट्रंप का गुस्सा शांत नहीं हुआ।

नाटो की असहयोगिता पर ट्रंप ने चेतावनी दी

27 मार्च को फिर वही कहानी दोहराई गई। नाटो के मदद न देने पर ट्रंप ने साफ कह दिया- अगर इन देशों पर हमला हुआ तो अमेरिका कोई मदद नहीं करेगा। यानी, अब तुम खुद लड़ो, हम तमाशा देखेंगे। जो देश दशकों से अमेरिका की छत्रछाया में आराम से बैठे थे, उन्हें अचानक खुद लड़ो का उपदेश दिया जा रहा है। अमेरिका फर्स्ट अब अमेरिका अकेला में बदल चुका है।

30-31 मार्च को ट्रंप महाशय फिर भड़के। ब्रिटेन और फ्रांस को बहुत असहयोगी बताया। पोस्ट में लिखा- गो गेट योर ऑन ऑयल! यू विल हैव टू स्टार्ट लर्निंग हाउ टु फाइट फॉर योरसेल्फ। ईरान को भी चेतावनी दे डाली- पावर प्लांट, ऑयल वेल्स, खार्ग द्वीप और दिसेलिनेशन प्लांट तक मिटा देंगे। गुस्सा इस कदर कि सहयोगी देशों को तेल चुराने वाला चोर बताकर खुद को तेल का रक्षक घोषित कर दिया।

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ट्रंप का गुस्सा सहयोगियों पर तबाही की तरह फूट पड़ा

सवाल उठता है, ट्रंप को गुस्सा क्यों आता है? क्योंकि हकीकत उनकी इच्छा के मुताबिक नहीं चल रही। यों वे खिसियानी बिल्ली बनकर खंबा न नोचें तो क्या करें! वे सोचते थे कि ईरान 48 घंटे में झुक जाएगा, नाटो तुरंत कूद पड़ेगा और दुनिया ट्रंप, द सुपरहीरो का जय-जयकार करेगी। लेकिन ईरान नहीं झुका, नाटो नहीं कूदा और चीन ने भी मुँह फेर लिया। अब गुस्सा अपने ही सहयोगियों पर निकल रहा है। जैसे कोई बच्चा खिलौना न मिलने पर दोस्तों पर हाथ उठाने लगे। फर्क सिर्फ इतना कि इस बच्चे के पास दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य बजट है।

जगज़ाहिर है कि यह ट्रंप का गुस्सा ही है, जो युद्ध को लंबा खींच रहा है और अमेरिका को और अलग-थलग कर रहा है। जो देश लीडर ऑफ द फ्री वर्ल्ड बनकर घूमता था, आज खुद को अकेली महाशक्ति कहकर गर्व कर रहा है। भारत जैसे देश इस पूरे ड्रामे को चुपचाप देख रहे हैं। फिलहाल कुछ और कर भी नहीं सकते न!

वैसे कहना गलत न होगा कि ट्रंप का गुस्सा ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है; और सबसे बड़ी कमजोरी भी! यह उन्हें वोट दिलाता है। लेकिन कूटनीति को तो बर्बाद कर देता है! ईरान युद्ध में अब तक तीन बड़े गुस्से के मौके आए और हर बार परिणाम एक ही। अमेरिका और अलग-थलग, दुनिया और महंगाई की चपेट में। अगर ट्रंप सच में ईरान को सबक सिखाना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने गुस्से को काबू में करें। वरना कहीं ऐसा न हो कि इतिहास उन्हें ऐसे राष्ट्रपति के रूप में याद रखे जिन्हें अपना ही स्वभाव हरा गया, न कि जिन्होंने ईरान को हराया!

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