2026 की सोशल मीडिया में क्यों छाया है 2016?
यह हर क्षेत्र की नॉस्टैलजिया साइकोलॉजी है। मनोविज्ञान कहता है कि इंसान तनाव के दौर में अकसर उस दौर को याद करता है, जब वह खुशी और सुरक्षा महसूस करता था। 2016 कहीं ज्यादा सरल, कम चिंतित करने वाला और उम्मीदों से भरपूर दौर था। इसलिए 2016 को याद करना सिर्फ वादों का खेल नहीं है बल्कि मेंटल एस्केप मैकेनिज्म भी है।
गर इन दिनों आप इंस्टाग्राम, यू-ट्यूब और जहां टिक-टॉक हैं, वहां टिक-टॉक खोलेंगे तो पाएंगे कि लोग 2016 के गाने, मीम्स, फैशन, यू-ट्यूर्ब्स और उस दौर के इंटरनेट वाइप को बड़े जोशो-खरोश से याद कर रहे हैं। अकसर इस तरह की ट्रेंड खूब देखने को मिल रहे हैं- # 2016 वाइप्स, क्ष् ब्रिंग बैक 2016, # 2016 कोर और # वी मिस 2016। ऐसे # इन दिनों करोड़ों व्यूज बटोर रहे हैं। लेकिन सवाल है, 2016 ही क्यों, 2012 या 2018 क्यों नहीं? वास्तव में इसका कारण है 2026 में उस सोशल दुनिया का एक दशक पूरा हो रहा है, जो वास्तव में अपने दौर में सबसे स्मार्ट दुनिया के रूप में उभरी थी।
बावजूद इसके 2016 का इंटरनेट आज के मुकाबले कम कमर्शियल, कम एल्गोरिद्म ड्रिवन और ज्यादा एक्सप्रेशन फ्रेंडली था। सोशल मीडिया पर दोस्त ज्यादा थे, तब ब्रांड कम दिखते थे। कंटेंट परफेक्ट होने से ज्यादा ईमानदार और मासूम था तथा मीम्स और वीडियो अचानक वायरल होते थे, रणनीति बनाकर उन्हें वायरल नहीं किया जाता था। लब्बोलुआब यह कि अत्यधिक क्यूरेटिड डिजिटल दुनिया के सामने 2016 एक डिजिटल फ्रीडम के दौर की तरह याद किया जा रहा है।
दिमाग क्यों लौटता है पीछे की ओर
यह सिर्फ सोशल मीडिया के बारे में सच नहीं है। वास्तव में यह हर क्षेत्र की नॉस्टैलजिया साइकोलॉजी है। मनोविज्ञान कहता है कि इंसान तनाव के दौर में अकसर उस दौर को याद करता है, जब वह खुशी और सुरक्षा महसूस करता था। 2020 के बाद दुनिया ने महामारी, आर्थिक अनिश्चितता, युद्ध, जॉब के प्रेशर और एआई डिप्रेशन जैसे बड़े-बड़े मसले देखे और सहे हैं। इसके मुकाबले 2016 कहीं ज्यादा सरल, कम चिंतित करने वाला और उम्मीदों से भरपूर दौर था। इसलिए 2016 को याद करना सिर्फ वादों का खेल नहीं है बल्कि मेंटल एस्केप मैकेनिज्म भी है।

पॉप कल्चर का गोल्ड फील्ड
2016 में पॉप, इडीएम और इंडी म्यूजिक में युवाओं ने खूब अपनी पहचान बनायी थी। उस दौर का पार्टी म्यूजिक कहीं ज्यादा एनर्जेटिक था, गानों के बोल सुंदर, सरल और समझ में आने वाले थे। यही नहीं ये ज्यादा फील गुड का एहसास कराते थे। जबकि आज का गाना बेहद मैकेनिक और एल्गोरिद्मिक हो चुके हैं।
ऐसे में आज के लोगों को भी ज्यादा रीयल और ज्यादा परफेक्ट सिर्फ म्यूजिक ही नहीं फैशन के मामले में भी यही निष्कर्ष है। साल 2016 में फैशन ट्रेंड नई पहचान हुआ करता था। स्किनी जींस, लान्ग टी-शर्ट, डेनिम जैकेट, स्नीकर्स और सिंपल स्ट्रीट वियर खूब आकर्षित करते थे और देर तक साथ निभाते थे। आज का फैशन बहुत तेजी से बदलता है।
मशीन का नियंत्रण
आज इंसान पर उसका खुद का नियंत्रण कम और मशीन का ज्यादा है। आज सोशल मीडिया में कोई क्या देखेगा, यह वह नहीं तय करता, एल्गोरिदम तय करता है। क्या वायरल होगा, यह भी लोगों के हाथ में नहीं है, एलोरिदम का ही मायाजाल है और क्या अच्छी से अच्छी चीज दब जायेगी, इस पर भी एल्गोरिदम का ही बस चलता है। शुरु में तो यह स्वचालन आकर्षक लगता था, लेकिन अब यह आटोमेशन खूब पैदा कर रहा है।
यही ऊब और थकान है, जो 2026 में लोगों को 2016 की तरफ खींच रहा है। इसमें एक कसक जेन जेड का सेकेंड हैंड नॉस्टैलजिया भी है। दरअसल, आज जिन युवकों की उम्र 18 से 22 साल के बीच है, वह 2016 से गुजरकर तो आए हैं, लेकिन उसे अच्छी तरह जी नहीं पाए। शायद इसलिए भी इस पीढ़ी की एक कसक है, जिसके पछतावे में वह साल 2016 को आइडियल टाइम मान रहे हैं।
ट्रेंड साइकिल
इस सबके साथ इस आकर्षण को ट्रेंड साइकिल थ्योरी भी माना जा रहा है, जिससे एक समय के बाद अतीत का फैशन ज्यादा लुभाने लगता है। अतीत की जीवनशैली ज्यादा बेफा और खुशमिजाज लगने लगती है। उसी तरह आज जो लोग 2016 के उस अतीत को अच्छी तरह से जी नहीं पाए, जब सोशल मीडिया पर पहली बार यौवन की तरफ कदम बढ़ाया था। इसलिए भी 2016 का नॉस्टैलजिया लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है, लेकिन अगर वाकई सवाल किया जाए कि क्या 2016 सच में इतना बेहतर था कि उसे 2026 पर तरजीह दी जा सकती है, तो वैज्ञानिक निष्कर्ष यही है कि नहीं।
उस समय भी समस्याएं थीं बल्कि आज से कुछ ज्यादा ही थीं। डिजिटल टॉक्सिसिटी भले आज जितनी न रही हो, लेकिन तब भी थी और जिंदगी की भागदौड़ और हाय-तौबा तब भी इतनी ही थी बल्कि इससे ज्यादा ही। लेकिन हर वर्तमान को अतीत लुभाता है। क्योंकि हम अतीत से समस्याएं हटा देते हैं, दुख अलग कर देते हैं, उसकी परेशानियां गायब कर देते हैं और उसके आगोश में मनचाही नींद लेने की कोशिश करते हैं।
-अपराजिता
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