विदेशी छात्रों पर वीजा प्रतिबंध लगाकर, अमेरिकी खूबियों को नष्ट क्यों कर रहे हैं ट्रंप?

आज अगर अमेरिका दुनिया में सुपरपावर है, तो सिर्फ अपनी मिलिट्री की बदौलत नहीं है, वह अमेरिका की लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्रेस की स्वतंत्रता और विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती व नागरिक अधिकारों की रक्षा के कारण है। यही अमेरिका की ताकत है। ये वही मूल्य हैं, जिनके दम पर अमेरिका दशकों से दुनिया की मॉरल अथॉरिटी बना हुआ है। लेकिन प्रेसिडेंट ट्रंप लगता है अपने सनकभरे स्वभाव के कारण इन अमेरिकी खूबियों को नष्ट करने पर तुल गये हैं।

हाल के अपने तमाम सनकभरे फैसलों की तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने दुनियाभर में फैले अपने दूतावासों को नये छात्र वीजा इंटरव्यू पर तुरंत प्रतिबंध लगाने का मनमाना आदेश जारी किया है। इससे लाखों विदेशी छात्रों की तरह हजारों भारतीय छात्रों का भी स्टडी इन अमेरिका का सपना अधर में लटक गया है। एक अनुमान के मुताबिक इस साल लगभग 2 लाख 60 हजार के आसपास भारतीय छात्रों ने अमेरिका में स्टडी वीजा के लिए अप्लायी किया था।

अमेरिकी शैक्षिक संस्थानों पर दो बार दाखिले होते हैं पहला- दाखिला समर सीजन में होता है, जो मई से अगस्त तक होता है और दूसरा फॉल सीजन में जोकि सितंबर से नवंबर तक चलता है। अनुमान है कि समर सीजन के लिए अब तक 50 फीसदी से ज्यादा एडमिशन शुरु हो चुके हैं। इन छात्रों के वीजा इंटरव्यू काफी हद तक हो चुके हैं। फॉल सीजन के लिए अभी बाकी हैं, लेकिन अब ट्रंप प्रशासन विदेशी छात्रों के सोशल मीडिया प्रोफाइल की गहन जांच पड़ताल के बाद ही उन्हें वीजा जारी करेगा।

विदेशी छात्रों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को संजीवनी

नये आदेशों से पहले शेड्यूल वीजा इंटरव्यू तो तय समय पर ही होंगे, लेकिन नये छात्रों के लिए वीजा तारीखें अब जल्द नहीं घोषित होने वाली। पिछले साल अमेरिका में लगभग 3 लाख भारतीय छात्र पढ़ने गये थे, जो करीब 11 लाख विदेशी छात्रों में किसी एक देश की सबसे बड़ी संख्या थे। भारत के बाद दूसरे नंबर पर 2 लाख 77 हजार चीनी छात्र, जबकि तीसरे नंबर पर दक्षिण कोरिया के लगभग 43 हजार छात्र अमेरिका पढ़ने गये थे।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में विदेशी कभी भी अमेरिका के लिए बोझ नहीं रहे बल्कि उल्टा संसाधन माने गये हैं। विदेशी छात्र हमेशा से अमेरिकी अर्थव्यवस्था और अमेरिकी समाज की बहुत बड़ी ताकत रहे हैं। ये न सिर्फ आर्थिक दृष्टि से बल्कि तकनीकी, सांस्कृतिक और अकादमिक नवाचार की दृष्टि से भी अमेरिका में अहम योगदान देते रहे हैं। 2023-24 में लगभग 11 लाख और 2022-23 में करीब 10 लाख विदेशी छात्र दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से अमेरिका में पढ़ने के लिए आये थे। इन छात्रों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 38 से 40 बिलियन डॉलर तक का सीधा आर्थिक योगदान दिया था।

इसमें इनकी ट्यूशन फीस, रहने-खाने का खर्च, यात्रा, बीमा और अन्य खर्च शामिल रहे हैं। इससे सिर्फ अमेरिका के शैक्षिक संस्थानों को ही नहीं बल्कि उन शहरों को भी जबर्दस्त आर्थिक फायदा होता रहा है, जहां ये शैक्षिक संस्थान स्थित हैं। विदेशी छात्र जिन अमेरिकी शहरों में पढ़ते हैं, वहां रीयल एस्टेट, ट्रांसपोर्ट, रेस्टोरेंट तथा रिटेल जैसे सभी क्षेत्रों में बाकी शहरों से मांग ज्यादा रहती है। अमेरिका के सरकारी विश्वविद्यालय और पब्लिक कॉलेज अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा विदेशी छात्रों द्वारा दी जाने वाली फीस से अर्जित करते हैं।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में विदेशी छात्रों की भूमिका

अमेरिकी शैक्षिक संस्थानों को विदेशी छात्रों से जो ट्यूशन फीस मिलती है, वह फीस अमेरिकी छात्रों के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती है। यह फीस अगर इन संस्थानों को न मिले, तो अमेरिका के छोटे या ग्रामीण कॉलेजों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगे। अपने मौजूदा टर्म के चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने खुद स्टेम छात्रों को अमेरिका के लिए एसेट्स कहा था।

वास्तव में ये स्टेम छात्र साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स जैसे विषयों में दाखिला लेने वाले विदेशी छात्र होते हैं। 2023 में कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में अमेरिका में जितनी पीएचडियां हुई थीं, उनमें 70 प्रतिशत से ज्यादा पीएचडी विदेशी छात्रों ने की थी। इससे अमेरिका की इनोवेशन और रिसर्च क्षमता को जबर्दस्त लाभ मिलता है। इससे अमेरिका के मेडिकल क्षेत्र को बेहतरीन रिसर्च हासिल हो जाती हैं, अमेरिका में इस समय जो दुनिया की टॉप टेक कंपनियां हैं जैसे-गूगल, माइक्रोसॉफ्ट ये सब इन्हीं विदेशी रिसर्च छात्रों की बदौलत हैं।

यही नहीं एआई, बायोटेक और ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में अगर आज अमेरिका दुनिया का नेतृत्व कर रहा है तो इसमें सबसे बड़ा योगदान विदेशी छात्रों का ही है। अमेरिका में एक तिहाई से ज्यादा स्टार्टअप और रोजगार का सृजन भी यही एच-1 बी वीजा या ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (ओपीटी) के तहत पढ़ाई के बाद काम करने वाले छात्रों द्वारा ही शुरु किये जाते हैं। अमेरिका की फॉर्च्यून फाइव हंड्रेड कंपनियों में 25 प्रतिशत से ज्यादा कंपनियों की स्थापना अप्रवासियों या उनके बच्चों ने की है। इससे पता चलता है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में विदेशी छात्रों का कितना अहम योगदान है।

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ट्रंप की राजनीति से अमेरिका की सॉफ्ट पावर पर खतरा

यही नहीं जो छात्र अमेरिका में पढ़कर अपने देश लौटते हैं, वे अपने साथ अमेरिकी संस्कृति और अनुभव को लेकर भी जाते हैं। इस तरह पूरी दुनिया में अमेरिका की सॉफ्ट पावर की कूटनीति भी कामयाबी से चलती है। अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्र अपने खुले विचारों, लोकतांत्रिक विशेषताओं और नवाचारी स्वभाव के कारण पूरी दुनिया में अमेरिका की सॉफ्ट पावर का डंका बजाते हैं।

इस तरह देखें तो विदेशी छात्र न सिर्फ अमेरिका की अर्थव्यवस्था के बहुत बड़े संसाधन हैं बल्कि अमेरिका के समूचे अस्तित्व की जान हैं। आज अगर अमेरिका दुनिया में सुपरपावर है, तो सिर्फ अपनी मिलिट्री की बदौलत नहीं है, वह अमेरिका की लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्रेस की स्वतंत्रता और विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती व नागरिक अधिकारों की रक्षा के कारण है। यही अमेरिका की ताकत है।

ये वही मूल्य हैं, जिनके दम पर अमेरिका दशकों से दुनिया की मॉरल अथॉरिटी बना हुआ है। लेकिन प्रेसिडेंट ट्रंप लगता है अपने सनकभरे स्वभाव के कारण इन अमेरिकी खूबियों को नष्ट करने पर तुल गये हैं। आज अमेरिका उन्हीं सब चीजों की विरोध की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जो एक जमाने में उसकी ताकत होती थी और यह सिर्फ ट्रंप के राजनीतिक स्वभाव के चलते हुआ है। ट्रंप की राजनीति लोकतंत्र के इन्हीं सिद्धांतों पर नहीं बल्कि लोकप्रियतावाद, संर्कीण राष्ट्रवाद और मैं ही देश हूं, जैसे अहंकारी सोच पर टिकी है।

लोकतंत्र के लिए ट्रंप की तानाशाही प्रवृत्ति का खतरा

ट्रंप आमतौर पर मीडिया को फेक न्यूज कहते हैं, अपने विरोधियों को देशद्रोही होने का तमगा देते हैं और चुनाव परिणामों को चोरी बताते हैं क्योंकि वे अमेरिका के लोकतंत्र को मजबूत करने वाली इन लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने नियंत्रण में लाना चाहते हैं। यही कारण है कि साल 2020 में जब वह चुनाव हार गये थे, तो हारने के नतीजे को मानने से इंकार कर दिया था और बड़े आक्रामक ढंग से यह झूठ फैलाया था कि उनका चुनाव चोरी हो गया।

ये लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बहुत बड़े खतरे का संकेत था और इस संकेत में इसका नतीजा भी दिखाया जब 6 जनवरी 2021 को ट्रंप समर्थकों ने अमेरिकी संसद कैपिटल पर हमला कर दिया। यह अमेरिका के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी धृष्टता थी। दरअसल ट्रंप सब कुछ अपनी मुट्ठी में कैद करने की इच्छा के शिकार हैं। वे अमेरिका के राजनीतिक इतिहास के सबसे स्ट्रांग मैन बनना चाहते हैं, इसलिए उनका स्वभाव रूस के राष्ट्रपति पुतिन और तुर्की के एर्दोगन से मिलता-जुलता है।

-लोकमित्र गौतम
-लोकमित्र गौतम

ट्रंप स्ट्रांग मैन की अपनी छवि हासिल करके अमेरिका की सत्ता पर पूरी तरह से कब्जा करना चाहते हैं ताकि उनकी मर्जी के बिना अमेरिका में पत्ता भी न हिले, इससे उनका अपना इगो तो संतुष्ट हो जायेगा, लेकिन अमेरिका की जो लोकतांत्रिक खूबियां रही हैं, जिनके कारण अमेरिका विश्व में सुपरपावर रहा है, वे सारी खूबियां नष्ट हो जाएंगी। अमेरिका के लोकतंत्र समर्थक नागरिकों को यह बात गंभीरता से समझनी चाहिए और इसके विरूद्ध सड़कों पर उतरना चाहिए नहीं तो जो अमेरिका सदियों में बना है, राष्ट्रपति ट्रंप उसकी खूबियां अगले महज कुछ सालों में चकनाचूर कर देंगे।

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