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क्या आधार न होने पर नहीं मिलेंगी स्वास्थ्य सुविधाएँ : तेलंगाना हाईकोर्ट

हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से सवाल किया कि क्या अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले किसी रोगी का इलाज इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि उसका कोई सहायक नहीं है? क्या आधार कार्ड न होने पर भी मरीज को स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करवाने से इनकार किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि आधार कार्ड दिखाए बिना इलाज नहीं किया गया, तो मरीज के जीवन का क्या होगा।

अदालत ने राज्य सरकार के मुख्य सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव चिकित्सा शिक्षा निदेशक और महबूबाबाद ज़िलाधीश व सिविल अस्पताल के अधीक्षक को नोटिस जारी कर पूर्ण विवरण के साथ प्रतियाचिका दायर करने के आदेश दिए। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस जी.एम. मोहियुद्दीन की खण्डपीठ ने यह आदेश देते हुए मामले की सुनवाई तीन सप्ताह तक स्थगित कर दी।

महबूबाबाद ज़िले के चिन्नागुडूरु मंडल के जयराम ग्राम निवासी रवि के गुर्दा रोग से पीड़ित होने और सिविल अस्पताल में उनके सहायक और आधार कार्ड न होने के कारण इलाज से इनकार किए जाने की खबरों के आधार पर उच्च न्यायालय ने इस मामले को लेकर अधिवक्ता कोमरय्या द्वारा लिखे गए गए पत्र को स्वत संज्ञान के तहत जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर सुनवाई की।

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गरीब रवि को चिकित्सा सहायता से वंचित किए जाने पर ध्यान दें

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने दलील देते हुए कहा कि इलाज से इनकार करना क्रूरता है। उन्होंने आग्रह किया कि गरीब रवि को चिकित्सा सहायता से वंचित किए जाने के मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। अधिवक्ता ने कहा कि रवि के पास कोई और विकल्प नहीं था, इसीलिए उसे तीन दिन तक उसी अस्पताल के कैन्टीन के गलियारे में रहना पड़ा। उन्होंने बताया कि तीन दिन बाद रवि वहीं बेहोश हो गया और अस्पताल के कर्मचारी उसे मृत समझकर मुर्दाघर ले गए।

दूसरे दिन वहाँ के सफाई कर्मचारियों ने रवि के शरीर में हलचल देखी और तुरन्त पुलिस को सूचना दी। इसके बाद मौके पर पहुँची पुलिस रवि को इलाज के लिए अस्पताल ले गई। उन्होंने कहा कि आधार कार्ड न होने के कारण इलाज से इनकार करना एक नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। बहस के पश्चात खण्डपीठ ने इलाज के लिए आए मरीज के साथ कोई सहायक न होने और आधार कार्ड न होने पर उसका इलाज नहीं किया जाता है, इस मामले पर राज्य सरकार से अपनी नीति स्पष्ट करने के आदेश देते हुए मामले की सुनवाई 18 मार्च तक स्थगित कर दी।

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