खेल परिदृश्य में महिलाएं कर रही हैं नेतृत्व
आज शहर छोटा हो या बड़ा। सुबह-सुबह पार्कों और खेल के मैदानों में नई पीढ़ी की लड़कियां खेलों का अभ्यास करती दिखती हैं। यह दृश्यभर खेलों में महिलाओं की उपस्थिति, उनकी भागीदारी और एक नये भारत की पहचान है। कुछ सालों पहले तक ये दृश्य बहुत आम नहीं होते थे। हालांकि तब भी लड़कियां खेलों की दुनिया में मौजूद थीं, लेकिन उन्हें यह साबित करना पड़ता था कि वे खेल सकती हैं। अब तस्वीर बदल गई है।
अब खेलों में लड़कियां सिर्फ हिस्साभर नहीं ले रहीं बल्कि वो नेतृत्व कर रही हैं, खेल की दिशा तय कर रही हैं और एक शब्द में कहें तो भारत में खेलों का भविष्य गढ़ रही हैं। ये परिवर्तन अचानक नहीं आया, पिछले कई दशकों के संघर्ष, निरंतर होने वाले सामाजिक बदलाव और संस्थागत समर्थन व उनके असाधारण प्रतिभा दर्शाने का परिणाम है। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर यह तस्वीर और ज्यादा प्रासंगिक हो जाती है।
उपलब्धियों ने बदली पहचान
हाल के वर्षों में भारतीय महिला खिलाड़ियों ने अपने व्यक्तिगत प्रदर्शनों से न केवल खुद की पहचान हासिल की है, बल्कि उपलब्धियों के मायने भी बदल दिए हैं। आज कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां महिला खिलाड़ियों ने अपना वर्चस्व स्थापित न किया हो। बॉक्सिंग में निकहत जरीन, बैडमिंटन में सायना नेहवाल, पीवी सिंधु आदि ने इतिहास रचते हुए महिलाओं के लिए नायकत्व गढ़ा है।
छोटे शहरों में बड़े सपने
भारतीय खेलों में महिलाओं के नेतृत्व की सबसे प्रेरक कहानियां अब छोटे शहरों और गांवों से निकल रही हैं। चाहे वह हरियाणा के छोटे गांव हों या उत्तर पूर्व के सुविधाओं से दूर पहाड़ी गांव या उड़िसा और बंगाल के पिछड़े गांव हर जगह से लड़कियां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी खेल प्रतिभा बिखेर रही हैं।
आर्थिक स्वतंत्रता और पेशेवर पहचान
महिला खिलाड़ियों के नेतृत्व का एक महत्वपूर्ण पहलू उनकी आर्थिक स्वतंत्रता है। महिलाएं भी खिलाड़ी के रूप में पुरुषों जैसी आर्थिक स्वतंत्रता और पेशेवर पहचान हासिल कर रही हैं। आज महिला खिलाड़ी तमाम महत्वपूर्ण कारपोरेट ब्रांड की अंबेस्डर बनी हैं। विज्ञापनों में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। इस आर्थिक सशक्तिकरण का फायदा अपने आत्मविश्वास को बढ़ाकर हासिल कर रही हैं।
मानसिकता में बदलाव
आज हिंदुस्तानी माता-पिता लड़कों की तरह अपनी लड़कियों को भी खेल में कॅरियर बनाने के लिए न सिर्फ इजाजत दे रहे हैं, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित भी कर रहे हैं। स्कूल और कॉलेज भी लड़कियों के खेल कार्पामों में पूरी तरह से रूचि दिखा रहे हैं।
खेल नीतियों का प्रभाव
हाल के सालों में खेलो इंडिया, टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम जैसी कुछ खेल नीतियों और योजनाओं ने देश में महिला खिलाड़ियों की एक ठोस और परिपक्व दुनिया खड़ी की है। आज भारतीय महिला खिलाड़ी सिर्फ पदक जीतने वाली खिलाड़ी नहीं हैं बल्कि ये समाज के लिए प्रेरणा और नेतृत्व का प्रतीक बन चुकी हैं।
कुल मिलाकर आज भारत में महिला खिलाड़ी पुरुषों की तरह ही एक से बढ़कर एक संभावनाओं को व्यवहारिक धरातल उपलब्ध करा रही हैं और आने वाले वर्षों में भारत को एक खेल-महाशक्ति बनाने के लिए मजबूती से आगे बढ़ रही हैं। साल 2026-2028 और फिर साल 2032 अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों में भारतीय महिला खिलाड़ियों के लिए बड़ी उम्मीदें जगा रहे हैं। भारतीय महिलाएं भी अब न सिर्फ बड़ी से बड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खेलों का नेतृत्व करने में सक्षम हैं बल्कि अपनी सफलताओं के चलते वे अपनी खुशियों और लाइफस्टाइल को भी नई ऊंचाइयां दे रही हैं।
-साशा
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