विश्व दिव्यांग दिवस : दिव्यांगों के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी

समाज में दिव्यांगता को एक सामाजिक कलंक के रूप में देखा जाता है। जिसे सुधारने की आवश्यकता है। विश्व विकलांग दिवस हर वर्ष 3 दिसंबर को मनाया जाता है और इस वर्ष इसका विषय है सामाजिक प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए विकलांगता समावेशी समाज को बढ़ावा देना। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1992 में हर वर्ष 3 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय विकलांग (दिव्यांग) दिवस के रूप में मनाने घोषणा की गयी।

सरकार द्वारा देश में दिव्यांगों के लिए कई नीतियां बनायी गयी है। उन्हें सरकारी नौकरियों, अस्पताल, रेल, बस सभी जगह आरक्षण प्राप्त है। दिव्यांगों के लिए सरकार ने पेंशन की योजना भी चला रखी है लेकिन ये सभी सरकारी योजनाएं उन दिव्यांगों के लिए महज एक मजाक बनकर रह गयी हैं जिनके पास इन सुविधाओं को हासिल करने के लिए दिव्यांगता का प्रमाणपत्र ही नहीं है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य समाज के सभी क्षेत्रों में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों को बढ़ावा देना और राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में दिव्यांग लोगों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है।

प्रधानमंत्री मोदी ने विकलांग शब्द की जगह दिव्यांग शब्द अपनाने की अपील की

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि शारीरिक रूप से अशक्त लोगों के पास एक दिव्य क्षमता है और उनके लिए विकलांग शब्द की जगह दिव्यांग शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने विकलांगों को दिव्यांग कहने की अपील की थी। जिसके पीछे उनका तर्क था कि शरीर के किसी अंग से लाचार व्यक्तियों में ईश्वर प्रदत्त कुछ खास विशेषताएं होती हैं। विकलांग शब्द उन्हें हतोत्साहित करता है। प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान पर देश के लोगों ने विकलांगों को दिव्यांग तो कहना शुरू कर दिया लेकिन लोगों का उनके प्रति नजरिया आज भी नहीं बदल पाया है। आज भी समाज के लोगों द्धारा दिव्यांगों को दयनीय दृष्टि से ही देखा जाता है, जो पूरी तरह गलत है।

दुनिया में ऐसे उदाहरण अनेक मिलेंगे जो बताते हैं कि सही राह मिल जाये तो अभाव एक विशेषता बनकर सबको चमत्कृत कर देती है। भारत में दिव्यांगों की मदद के लिए बहुत सी सरकारी योजनाएं संचालित हो रही हैं लेकिन इतने वर्षो बाद भी देश में आज तक आधे दिव्यांगों को ही दिव्यांगता प्रमाण पत्र मुहैया कराया जा सका है। ऐसे में दिव्यांगों के लिए सरकारी सुविधाएं हासिल करना महज मजाक बनकर रह गया हैं। दुनिया में बहुत से ऐसे दिव्यांग हुए हैं जिन्होंने अपने साहस संकल्प और उत्साह से विश्व के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अपना नाम लिखवाया है।

2016 संशोधित आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम से पीड़ितों को मदद मिली

यह डेटा दर्शाता है कि भारत में लगभग 6 करोड़ 32 लाख 80 हजार लोग किसी न किसी प्रकार की विकलांगता के साथ जीवन यापन करते हैं। लोकोमोटर (गतिशील) विकलांगता सभी विकलांगताओं में सबसे आम है, इसके बाद मानसिक और वाक् (बोलने से संबंधित) विकलांगताएँ हैं। यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारत में दिव्यांग आज भी अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर आश्रित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार विश्व स्तर पर 15 प्रतिशत आबादी किसी न किसी प्रकार की विकलांगता के साथ रहती है।

जबकि उसमें से 80 प्रतिशत से अधिक लोग निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। जबकि भारत में 140 करोड़ से अधिक लोग है। इस आबादी का 2.2 प्रतिशत से अधिक लोग किसी न किसी रूप में गंभीर मानसिक या शारीरिक विकलांगता से पीड़ित हैं। आज के प्रगतिशील युग में जहाँ सभी लोगों के एकीकरण और समावेशन पर सतत विकास के प्रवेश द्वार के रूप में जोर दिया जाता है। भारत में विकलांग लोगों को वर्गीकृत करने वाले मानदंडों की सूची को 2016 में नया रूप दिया गया था। 2016 के आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम पर आधारित संशोधित परिभाषा में एसिड हमलों से संबंधित शारीरिक विकृति और चोटों को विकलांगता के रूप में मान्यता देना भी शामिल है। जो इन पीड़ितों को विभिन्न प्रकार की सरकारी सहायता और समर्थन का हकदार बनाता है ।

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केंद्र सरकार ने दिव्यांग युवाओं के लिए सकारात्मक कदम उठाया

भारत में आज भी दिव्यांगता प्रमाण पत्र हासिल करना किसी चुनौती से कम नहीं है। सरकारी कार्यालयों और अस्पतालों के कई दिनों तक चक्कर लगाने के बाद भी लोगों को मायूस होना पड़ता है। हालांकि सरकारी दावे कहते हैं कि इस प्रािढया को काफी सरल बनाया गया है, लेकिन हकीकत इससे काफी दूर नजर आती है। दिव्यांगता का प्रमाणपत्र जारी करने के सरकार ने जो मापदण्ड बनाये हैं। अधिकांश सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक उनके अनुसार दिव्यांगों को दिव्यांग होने का प्रमाण पत्र जारी ही नहीं करते है। जिसके चलते दिव्यांग व्यक्ति सरकारी सुविधायें पाने से वचिंत रह जाते हैं।

देश में दिव्यांगों को दी जाने वाली सुविधाएं कागजों तक सिमटी हुई हैं। अन्य देशों की तुलना में हमारे यहां दिव्यांगों को एक चौथाई सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही है। केंद्र सरकार ने देशभर के दिव्यांग युवाओं को केंद्र सरकार में सीधी भर्ती वाली सेवाओं के मामले में दृष्टि बाधित, बधिर और चलने-फिरने में दिव्यांगता या सेरेब्रल पल्सी के शिकार लोगों को उम्र में 10 साल की छूट देकर एक सकारात्मक कदम उठाया है।

रमेश सर्राफ धमोरा
रमेश सर्राफ धमोरा

दिव्यांगता शारीरिक अथवा मानसिक हो सकती है किन्तु सबसे बड़ी दिव्यांगता हमारे समाज की उस सोच में है जो दिव्यांग जनों से हीन भाव रखती है। जिसके कारण एक असक्षम व्यक्ति असहज महसूस करता है। अब दिव्यांग लोगों के प्रति अपनी सोच को बदलने का समय आ गया है। दिव्यांगों को समाज की मुख्यधारा में तभी शामिल किया जा सकता है जब समाज इन्हें अपना हिस्सा समझे। इसके लिए एक व्यापक जागरूकता अभियान की जरूरत है।

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