काले हो, मेरे लायक नहीं !

मध्य प्रदेश के धार जिले के गोंदीखेड़ा चारण गाँव में घटित हालिया हत्याकांड ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। 28 वर्षीय मसाला कारोबारी देवकृष्ण पुरोहित की निद्रावस्था में हत्या कर दी गई। पहली नज़र में यह लूट का मामला लगता था। पत्नी प्रियंका पुरोहित (27) ने पुलिस को बताया कि अज्ञात लुटेरों ने घर में घुसकर पति को मार डाला और गहने-नकदी लूट लिए। लेकिन पुलिस की त्वरित जाँच ने भयावह सच्चाई उजागर कर दी। प्रियंका ने ही अपने बचपन के प्रेमी कमलेश पुरोहित (33) के साथ मिलकर एक लाख रुपये की सुपारी देकर पति की हत्या का षड्यंत्र रचा था!

दरअसल, यह घटना केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि भारतीय समाज में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति का आईना है। नोवैज्ञानिक दृष्टि से यह मामला गहरी विकृति को उजागर करता है। बताया गया है कि प्रियंका पति को काले हो, मेरे लायक नहीं हो कहकर प्रायः अपमानित करती थी। प्रियंका का विवाह लगभग 15 वर्ष की अल्पायु में हुआ था। बाल-विवाह जो बाद में बंधन साबित हुआ! किशोरावस्था का प्रेम (कमलेश से नौ वर्ष पुराना रिश्ता) वैवाहिक जीवन में बाधक बन गया।

यह विवाह अवैध था, जिसे अदालत में चुनौती दी जा सकती थी। लेकिन आत्ममुग्धता व्यक्तित्व विकार से प्रेरित प्रियंका ने पति को रास्ते का रोड़ा मानकर हत्या का विकल्प चुना। इस विकार से ग्रस्त व्यक्ति अपनी इच्छाओं को नैतिकता से ऊपर रखता है न! यह क्रूरता दिखाती है कि कैसे भावनात्मक असंतोष, असुरक्षा और यौन-आकर्षण नैतिक संवेदनशीलता को कुचल देते हैं।

सोशल मीडिया के दबाव में बढ़ रही रिश्तों में हिंसा

आज के तनावपूर्ण जीवन में, जहाँ सोशल मीडिया प्रेम को परफेक्ट दिखाता है, वास्तविक रिश्तों की जटिलताओं को सहन करने के बजाय हिंसा का सहारा लेने के मामले बढ़ रहे हैं। इसे स्त्री-मुक्ति तक सीमित करना एक व्यापक सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्या से आँख फेरना होगा। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में यह घटना परिवार संरचना के विघटन की शोक-गाथा है। धार जैसे ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों में आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ रही है, लेकिन नैतिक शिक्षा और पारिवारिक संवाद की कमी बनी हुई है।

संयुक्त परिवारों का टूटना व्यक्तिवाद को बढ़ावा दे रहा है। महिलाओं में सशक्तिकरण की सकारात्मक दिशा के साथ ही कुछ मामलों में स्वतंत्रता का दुरुपयोग भी हो रहा है। आँकड़े बताते हैं कि पिछले दशक में पति-हत्या के ऐसे मामले बढ़े हैं! क्या यह बेवफाई की नई संस्कृति है, जहाँ प्रेमी के लिए पति को हटाना सामान्य मान लिया जाए? यह कहकर भला कैसे इस हिंसा को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए कि युगों से पुरुषों ने स्त्रियों पर अत्याचार ढाए हैं, तो अब अगर स्त्रियाँ आक्रामक और हिंसक हो रही हैं, तो इतना हंगामा किसलिए?

नहीं, यह इतना आसान नहीं। और इसे स्त्री तक भी सीमित नहीं किया जा सकता। (बल्कि इस अपराध में तो पुरुषों की संलिप्तता ज़्यादा है!) कहना न होगा कि ऐसी घटनाएँ सांस्कृतिक और मूल्यपरक स्तर पर भारतीय समाज के नैतिक पतन की प्रतीक हैं। विवाह एक संस्था के रूप में अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। बॉलीवुड, वेब सीरीज और पश्चिमी प्रभाव इश्क़ को रोमांटिक अपराध के रूप में ग्लैमराइज़ कर रहे हैं। मूल्यों का पतन स्पष्ट है।

लूट का झूठा नाटक, हत्या की साजिश का खुलासा

प्रियंका ने लूट का नाटक रचकर न केवल पति की हत्या कराई, बल्कि समाज को धोखा भी दिया। यह दिखाता है कि कैसे धूर्तता नैतिकता को पीछे धकेल देती है। इसके अलावा, कानूनी-प्रशासनिक पक्ष भी चिंताजनक है। सुपारी कल्चर का बढ़ना और व्हाट्सऐप चैट्स से षड्यंत्र की आसानी क्या कानून-व्यवस्था की असफलता नहीं! बाल-विवाह निषेध कानूनों का सख्ती से पालन होता, तो शायद इस विस्फोट तक पहुंचने से पहले ही प्रियंका को घुटन से मुक्ति मिल जाती!

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अंततः धार हत्याकांड सोचने पर मजबूर करता है कि, क्या हम एक ऐसे समाज की ओर नहीं बढ़ रहे जहाँ रिश्ते बोझ बन गए हैं? जहाँ विवाहेतर प्रेम हिंसा का बहाना बन गया है? इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए सामूहिक चिंतन, परिवारों में संवाद और युवाओं में मूल्यों का पुनर्निर्माण आवश्यक है। अन्यथा, ऐसे कांड समाज के ताने-बाने को चीरते रहेंगे। समय है कि हम प्रेम को हिंसा से मुक्त करें और रिश्तों को पुन पवित्र बनाएँ। और हाँ, विवाह का अर्थ जेल नहीं होना चाहिए!

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