एक सफर का राही बनो

एको देव केशवो वा शिवो वा
एकं मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा।
एको वास पत्तने वा वने वा
एका नारी सुन्दरी वा दरी वा।। (भर्तृहरि नीति शतक 96)

इस श्लोक में प्राचीन भारत के महाराजा से योगिराज बने भर्तृहरि मानव को अपना सद् जीवन कैसे जीना चाहिए, बताते हैं। वह कहते हैं कि मनुष्य को संसार में रहकर भोग भोगने चाहिए या संसार को त्याग कर वन में जाकर बसना चाहिए। यदि मनुष्य संसार में रहे तो उसे भगवान कृष्ण की भक्ति करनी चाहिए, किसी राजा से मैत्री करनी चाहिए, नगर में बसना चाहिए और किसी सुंदर स्त्रा का पाणिग्रहण करके उसी से विलास करना चाहिए।

संतति उत्पन्न करके वंशवृद्धि करनी चाहिए। यदि मनुष्य संसार की असारता से विरक्त होना चाहता है तो उसे शिव की भक्ति और आराधना करनी चाहिए, किसी तपस्वी से मैत्री करनी चाहिए, वन में रहना चाहिए और कंदराओं एवं गुफाओं से विलास करना चाहिए। इस श्लोक में योगिराज भर्तृहरि ने बहुत ही गूढ़ बात कही है कि संसार में रहने वाले गृहस्थ के लिए कृष्ण की भक्ति, राजा की मैत्री, नगर का निवास और सुंदर नारी से विलास करना चाहिए।

गृहस्थी में भी भगवान कृष्ण की भक्ति और सर्वलोक सुख की प्राप्ति

यह चारों बातें बहुत ही उत्तम हैं। इस तरह का जीवन जीने से गृहस्थ को तीनों लोकों का सुख प्राप्त होता है। भगवान कृष्ण की अनन्य भक्ति करने से मनुष्य के सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं। कोई आपदा समीप नहीं आती है। यदि आती भी है तो भगवान की कृपा से हवा से बादलों की तरह उड़ जाती है। लाख-लाख दुर्जन शत्रु मिलकर भी कृष्ण के प्यारे का बाल भी बांका नहीं कर सकते हैं। कृष्ण की कृपा होने से लक्ष्मी की कृपा होती है। पति जिसे चाहता है, स्त्रा भी उसी से प्यार करती है।

भगवान कृष्ण की भक्ति का फल इस कलिकाल में भी हाथों-हाथ मिलता है, इसमें जरा भी संदेह नहीं है। अधिकांश लोग कहते हैं कि गृहस्थी के जनजाल में भगवान की भक्ति हो ही नहीं सकती तो यह सरासर अनुचित है। वो लोग नासमझ हैं, इसलिए ऐसा कहते हैं। मनुष्य गृहस्थी में रहकर भी परमात्मा की भक्ति कर सकता है। मनुष्य को व्यवसाय या नौकरी तथा संसारी काम करते हुए भी अपना मन प्यारे कृष्ण की भक्ति में लगाना चाहिए।

गृहस्थ और संन्यासी जीवन में धर्म, भक्ति और सही मित्रता का महत्व

शरीर से जगत के कामधंधे करने और मन को प्यारे कृष्ण की भक्ति में लगाए रखने से मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों की प्राप्ति होती है। जैसे एक महिला घर में भोजन बनाते हुए, रोते हुए बच्चे को दूध पीलाती है और उसी समय कोई अतिथि आ जाए तो उसका भी सत्कार करती है। कहने का अर्थ है कि वह अपने कई कर्तव्य एक साथ करती है, उसी तरह मनुष्य चाहे स्त्रा हो या पुरुष गृहस्थ हो तो अपने संसारी कर्त्तव्य पूर्ण करते हुए, उस प्यारे कृष्ण की भक्ति भी कर सकता है। विरक्त मनुष्य को शिव की आराधना करनी चाहिए।

एकांत में रहना चाहिए, साधु-संन्यासियों की संगत में ध्यान-जप आदि करना चाहिए अन्यथा उसका मन भटक सकता है और माया में रमा मन कोई उद्देश्य प्राप्त नहीं कर सकता है। अपने जीवन को एक सकारात्मक उद्देश्य की प्राप्ति में लगाना चाहिए। उपरोक्त श्लोक के अनुसार, अधिकाधिक मित्र भी नहीं बनाने चाहिए। चंद लोगों को ही मित्र बनाना चाहिए, जो आपके दुःख-सुख के साथी हों। आपको सदा सद् पथ पर चलने की राह दिखाते हों।

जीवन में स्थिरता और संतुलन : एक मित्र, एक घर, एक पत्नी

दिखावे के लिये कई मित्र बन जाते हैं, पर निभाने वाला कोई एक ही होता है। इसलिये अधिक लोगों से मित्रता करते समय भी सतर्क रहना चाहिए। अपने रहने के लिए एक ही घर बनाना चाहिए। अनेक लोग धन की अधिकता होने के कारण कई घर बनवा लेते हैं जिससे मानसिक संकट मोल लेते हैं। आप जिस घर में रहते हैं, उसे रोज देखकर चैन पा सकते हैं, लेकिन दूसरी जगह भी घर हो तो वहां की चिंता हमेशा बनी रहती है। घर के साथ-साथ किसी भी चीज के अति संग्रह से बचना चाहिए।

पत्नी भी एक होनी चाहिए। अधिक पत्नियां रखकर आदमी अपने लिये संकट मोल लेता है। ऐसे लोग कभी सुख नहीं पाते हैं। कहने का अभिप्राय है कि अपना इष्ट, घर, मित्र और भार्या एक ही होनी चाहिए। उपरोक्त श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मनुष्य को अपने जीवन में किसी एक उद्देश्य को अपनाना चाहिए या तो गृहस्थ बनकर रहना चाहिए अथवआ त्यागी। त्यागी का ढोंग नहीं करना चाहिए अन्यथा जब भी सच्चाई सामने आती है तो परिणाम बहुत भयानक होते हैं, भौतिक संसार में भी और अलौकिक जगत में भी। ऐसे मनुष्य ना घर के रह पाते हैं और ना ही घाट के।

-पवन गुरू

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