फाल्गुन का पटविलासिनी रूप है होली
भारतीय पंचांग का अंतिम व बारहवां महीना फाल्गुन प्रेम, उमंग, रंगों और वसंत ऋतु का समय है, जो भक्ति, आराधना और ऋतु-परिवर्तन का प्रतीक है। फाल्गुन पूर्णिमा की चाँद का विशेष महत्व है। इस महीने से धीरे-धीरे गरमी की शुरुआत होती है और सर्दी कम होने लगती है। फाल्गुन मास की मादकता, सौंदर्य और प्रकृति के श्रृंगार को प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में फाल्गुन पटविलासिनी कहा गया है।
पट का अर्थ है- वस्त्र और विलासिनी का अर्थ है- क्रीड़ा करने वाली। पटविलासिनी का अर्थ है, वह जो सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हो या अपनी क्रीड़ाओं से सबको मोहित कर ले। फाल्गुन को पटविलासिनी कहने का तात्पर्य उस प्रकृति से है, जिसने रंगों के वस्त्र धारण किए हैं। फाल्गुन में प्रकृति स्वयं एक पटविलासिनी बन जाती है। पलाश के लाल फूल और सरसों के पीले फूल प्रकृति के रेशमी वस्त्रों जैसे लगते हैं। होलिका-दहन और पटविलासिनी का संबंध शिव और शक्ति के मिलन जैसा है। जहां होलिका-दहन वैराग्य और भस्म का प्रतीक है, वहीं पटविलासिनी अनुराग और रंगों का।
होली की अग्नि से प्रेम और जीवंतता का संदेश
बिना दहन के श्रृंगार संभव नहीं है। जब तक पतझड़ के पुराने पत्ते नहीं जलते या गिरते, तब तक फाल्गुन के नव-पल्लव प्रकट नहीं होते। पटविलासिनी शब्द का गहरा संबंध राधारानी से है। ब्रज के साहित्य में फाल्गुन पटविलासिनी स्वयं राधारानी का स्वरूप मानी जाती हैं। होली के उत्सव में जब वे रंगीन वस्त्र धारण कर श्रीकृष्ण के साथ विलास करती हैं, तो उन्हें इस सौंदर्यमयी रूप में देखा जाता है। यह राधा-श्रीकृष्ण का भौतिक विलास नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम का प्रतीक है। होली की अग्नि के बाद जब रंग और गुलाल उड़ते हैं, तो वह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा के साथ विलास है।
अबीर और गुलाल हवा में मिलकर अदृश्य को दृश्य बना देते हैं। ब्रज की कुंज गलियों में जब टेसू का रंग बरसता है, तो वह जड़ चेतन सबको पटविलासिनी के रंग में रंग देता है। फाल्गुन पटविलासिनी वह जीवंत ऊर्जा है, जो हमें सिखाती है कि जीवन केवल दुःखों का दहन नहीं है, बल्कि उस दहन के बाद खिलने वाला उत्सव भी है। होलिका की राख़ जहां हमें नश्वरता की याद दिलाती है, वहीं फाल्गुन के रंग हमें जीवंतता और प्रेम की अनंतता का संदेश देते हैं। जहां होलिका की ज्वाला बुराई के अंत का प्रतीक है, वहीं फाल्गुन पटविलासिनी प्रकृति के नवश्रृंगार का उत्सव है।
कवियों की दृष्टि से उल्लास और प्रकृति का नवजागरण
फाल्गुन अपनी नकारात्मकता को जलाने और प्रेम के रंगों से स्वयं को सजाने की सीख देता है। होलिका दहन की पावन अग्नि के गहरे दर्शन को भी समझने की आवश्यकता है। फाल्गुन की सुंदरता पर अनेक प्रसिद्ध कवियों ने भी काव्य-रचना की है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता अट नहीं रही है फाल्गुन की मादकता और सुंदरता का सबसे सजीव वर्णन करती है। रीतिकालीन कवि पद्माकर ने कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में जैसे सवैयों के माध्यम से ब्रज के कुंजों और फाल्गुन के उल्लास का चित्रण किया है।
दरअसल, होलिका-दहन और फाल्गुन पटविलासिनी के बीच का संबंध विनाश और सृजन का एक सुंदर संगम है। दहन के पश्चात अगली सुबह धुलेंडी अर्थात रंगों की होली के साथ प्रकृति अपने सबसे सुंदर पट यानी रंगों और फूलों से सजती है। भारतीय काल-गणना में फाल्गुन केवल एक मास नहीं, बल्कि एक मनोदशा है। यह वह समय है, जब प्रकृति अपनी पुरानी कंचुकी (छाल और सूखे पत्ते) त्याग कर नव-यौवन को प्राप्त होती है।
होलिका दहन से आत्मशुद्धि और प्रेम का महीना
फाल्गुन के पटविलासिनी का रूप जो होलिका दहन की पवित्र अग्नि से निखर कर सामने आता है। फाल्गुन की पूर्णिमा की वह रात, जब ऊंची लपटें आकाश को छूती हैं, केवल लकड़ियों का ढेर नहीं जलता। वह प्रतीक है हमारे भीतर की ईर्ष्या, अहंकार और जड़ता के दहन का। पौराणिक मान्यताएं भी कहती हैं- प्रह्लाद (अटूट विश्वास) बच जाता है और होलिका (वरदान का अहंकार) जल जाती है।
यह संदेश है कि जब तक पुराना और नकारात्मक दहन नहीं होगा, तब तक नया और सुंदर नर्तन नहीं कर पाएगा। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह अग्नि वातावरण के कीटाणुओं का नाश करती है और वसंत के स्वागत के लिए धरती को शुद्ध करती है। ब्रज में फाल्गुन की शुरुआत के साथ ही होली के रसिया गाए जाते हैं, जो राधा-कृष्ण के प्रेम को समर्पित है। इस महीने शीतल जल से स्नान और दान करने का विशेष महत्व है। फाल्गुन का महीना मानसिक शांति और प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए उत्तम माना जाता है।
-अशोक प्रवृद्ध
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