सीएपीएफ विधेयक 2026 : आखिर इसे लेकर विवाद क्यों गहराता जा रहा है?
ऐसा प्रतीत नहीं होता कि संसद के दोनों सदनों में पारित सीएपीएफ विधेयक को सरकार हाल-िफलहाल में वापस लेगी। इसलिए प्रबल अनुमान यही है कि अवकाश प्राप्त सीएपीएफ अधिकारी अपने क़ानूनी संघर्ष को जारी रखते हुए इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे और ऐसे भी संकेत मिले हैं कि वह सड़कों पर उतरकर धरना-प्रदर्शन भी कर सकते हैं। दरअसल, यूनिफार्म सेवाओं में पदानुक्रम म को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है। एक अधिकारी के लिए यह अपमानजनक है कि रैंक में उससे जूनियर या समकक्ष अधिकारी को उसका सीनियर बना दिया जाये और वह उससे आर्डर ले। इसलिए सरकार को सीएपीएफ विधेयक पर पुनर्विचार करना चाहिए।
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 (सीएपीएफ विधेयक) को 2 अप्रैल 2026 को दोनों सदनों ने ध्वनि मत से पारित कर दिया, जबकि सबसे पहले यह राज्यसभा में 25 मार्च 2026 को पेश किया गया था। इस विवादित विधेयक में कहा गया है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में इंस्पेक्टर जनरल की रैंक के कुल 50 प्रतिशत पद, अतिरिक्त महानिदेशक (एडिशनल डायरेक्टर जनरल) रैंक के कम से कम 67 प्रतिशत पद और विशेष महानिदेशक (स्पेशल डायरेक्टर जनरल) व महानिदेशक (डायरेक्टर जनरल) की रैंक के 100 प्रतिशत पद भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के उन अधिकारियों से भरे जायेंगे जो प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर हैं।
विपक्ष के नेताओं व अवकाश प्राप्त सीएपीएफ अधिकारियों ने इस विधेयक की आलोचना की है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस विधेयक पर केंद्र सरकार को घेरते हुए कहा है कि अर्द्धसैनिक बल पर नियंत्रण के लिए किसी को भी ऊपर नहीं बैठाया जा सकता; आज तक भारत में किसी भी अर्द्धसैनिक बल का नेतृत्व ऐसे अधिकारी ने नहीं किया है, जो अपने ही अर्द्धसैनिक बलों में निचले पदों से ऊपर उठा हो। राहुल गांधी के अनुसार यह विधेयक हमारे सुरक्षा जवानों के लिए अन्यायपूर्ण है, जिसे अपनी सरकार बनने पर वह निरस्त करने को कह रहे हैं। इस विधेयक के ज़रिये जो व्यवस्था बनाने का प्रयास किया गया है, सुप्रीम कोर्ट भी उसके पक्ष में नहीं था।
भर्ती प्रक्रिया तेज करने का सरकार का दावा
गौरतलब है कि यह विधेयक सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी के प्रबंधन, भर्ती और सेवा शर्तों को विनियमित करता है। सरकार का तर्क है कि भर्ती प्रक्रिया पूरी होने में डेढ़ से दो साल का वक़्त लग जाता था, जो कि अब 11 महीने में पूरी हो जायेगी। सवाल यह है कि यह विधेयक क्यों लाया गया?
न्यायाधीश एएस ओका व न्यायाधीश उज्जल भुयन की सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने 23 मई 2025 को आदेश दिया था कि वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड में आईपीएस अधिकारियों के जो प्रतिनियुक्ति पद हैं या सीएपीएफ में जो महानिरीक्षक (इंस्पेक्टर जनरल) तक की रैंक के जो पद हैं उन्हें समय के साथ निरंतरता के साथ कम कर देने चाहिए, मसलन दो वर्ष की बाहरी सीमा के भीतर। अदालत ने यह भी कहा था कि सीएपीएफ के ग्रुप ए अधिकारी सभी उद्देश्यों के लिए संगठित सेवाएं हैं।
एक संगठित ग्रुप ए सेवा (ओजीएएस) परिभाषित पदानुक्रम, पदोन्नति मार्गों व कैडर नियंत्रण में संरचनात्मक, कैडर-आधारित सिविल सेवा है, जोकि एकाकी या जनरल सिविल पोस्ट्स से भिन्न है। आईपीएस, आईएएस और आईएफएस सभी ओजीएएस हैं। इस आदेश के विरोध में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दाखिल की, जिसे 28 अक्तूबर 2025 को निरस्त कर दिया गया। इस निर्णय के बावजूद गृह मंत्रालय आईपीएस अधिकारियों को सीएपीएफ में इंस्पेक्टर जनरल व डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल के पदों पर नियुक्त करता रहा।
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गृह सचिव के खिलाफ अवमानना याचिका दायर
नतीजतन अवकाश प्राप्त सीएपीएफ अधिकारियों ने गृह सचिव गोविंद मोहन के खिलाफ अदालत की अवमानना करने की याचिका दायर की कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू नहीं किया जा रहा है। गृह मंत्रालय ने 9 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वैधानिक हस्तक्षेप प्रस्तावित है। फिर 10 मार्च 2026 को केंद्रीय काबिना ने सीएपीएफ विधेयक 2026 को मंज़ूरी दे दी। सवाल यह है कि सीएपीएफ क्या है?
सीएपीएफ में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) है, जो पाकिस्तान व बांग्लादेश की सीमाओं पर तैनात है, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) है, जो एयरपोर्ट्स व महत्वपूर्ण संयत्रों की सुरक्षा करता है, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) है जिसे आंतरिक सुरक्षा आदि, क़ानून व्यवस्था जिम्मेदारियों व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात किया जाता है, सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) नेपाल व भूटान से लगी सीमाओं की सुरक्षा करता है और इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) है जो चीन से लगी सीमा पर तैनात की गई है।
वर्तमान में, एक एग्जीक्यूटिव आदेश के माध्यम से सीएपीएफ में 20 प्रतिशत पद डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल रैंक के और 50 प्रतिशत पद इंस्पेक्टर जनरल के आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं। सीएपीएफ में लगभग 13,000 ग्रुप ए अधिकारी हैं और तकरीबन दस लाख जवान हैं। गृह मंत्रालय सीएपीएफ और आईपीएस का कैडर को नियंत्रित करने वाला प्राधिकरण है। भर्ती केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के ज़रिये की जाती है।
विधेयक पर विवाद : सुप्रीम कोर्ट आदेश पर सवाल
सीएपीएफ में 9 मार्च 2026 तक 213 स्वीकृत आईपीएस पद थे, जिनमें से 35 रिक्त पड़े थे। देश में कुल 4,594 आईपीएस अधिकारी हैं और नियम यह है कि 40 प्रतिशत सीनियर ड्यूटी पद केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए आरक्षित हैं और शेष 60 प्रतिशत राज्यों के लिए। इस तथ्य को भी समझना ज़रूरी है कि विधेयक का विरोध क्यों हो रहा है? अवकाश प्राप्त सीएपीएफ अधिकारियों का कहना है कि यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अर्थहीन बनाने का लिए पारित किया गया है।
उनका तर्क है कि जो अधिकारी सीआरपीएफ में असिस्टेंट कमांडेंट की रैंक पर ज्वाइन करता है, उसे 16 वर्ष की सेवा के बाद भी पदोन्नति नहीं मिलती, जबकि इस अवधि के दौरान आईपीएस में उसके समकक्ष को तीन या चार पदोन्नति मिल जाती हैं। अब इस विधेयक के माध्यम से स्पेशल डायरेक्टर जनरल के 100 प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित कर दिये गये हैं, जबकि इससे पहले कुछ सीएपीएफ अधिकारी भी इन पदों पर पहुंच जाते थे।
इसके विपरीत केंद्र सरकार का तर्क यह है कि सीएपीएफ राज्य प्राधिकरणों के निकट समन्वय में राष्ट्रीय सुरक्षा का काम करते हैं और उनके प्रभावी कामकाज के लिए आईपीएस अधिकारी आवश्यक हैं, विशेषकर केंद्र-राज्यों के संबंधों के हित में। लेकिन सरकार के इस तर्क से न अवकाश प्राप्त सीएपीएफ अधिकारी सहमत हैं और न ही विपक्ष। विपक्षी दलों का कहना है कि संबंधित विधेयक न्यायपालिका के अधिकारों में हस्तक्षेप करता है व उनका उल्लंघन करता है।
पदोन्नति संकट से बढ़ती आत्महत्या और अवकाश प्रवृत्ति
माओवादियों का मुकाबला करने में सीएपीएफ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, फिर भी उनके अधिकारियों को पदोन्नत नहीं किया जा रहा है, जिसकी वजह से उनमें आत्महत्या के मामले बढ़ते जा रहे हैं और ऐच्छिक अवकाश ग्रहण में भी वृद्धि हो रही है। माकपा सांसदों का कहना है कि क़ानूनी आधार को संबोधित किये बिना प्रवर्ती न्यायिक आदेशों को निरस्त किया गया है, जोकि संसद के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। विपक्ष की मांग है कि इस विधेयक को वापस लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया जाये।

बहरहाल, ऐसा प्रतीत नहीं होता कि संसद के दोनों सदनों में पारित सीएपीएफ विधेयक को सरकार हाल-िफलहाल में वापस लेगी। इसलिए प्रबल अनुमान यही है कि अवकाश प्राप्त सीएपीएफ अधिकारी अपने क़ानूनी संघर्ष को जारी रखते हुए इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे और ऐसे भी संकेत मिले हैं कि वह सड़कों पर उतरकर धरना-प्रदर्शन भी कर सकते हैं। दरअसल, यूनिफार्म सेवाओं में पदानुक्रम को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है। एक अधिकारी के लिए यह अपमानजनक है कि रैंक में उससे जूनियर या समकक्ष अधिकारी को उसका सीनियर बना दिया जाये और वह उससे आर्डर ले। इसलिए सरकार को सीएपीएफ विधेयक पर पुनर्विचार करना चाहिए।
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